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Maharashtra: देश में पहली बार सरकार गिरने का कारण बना ‘धर्म’, छोड़ा धर्म, सरकार धड़ाम

Maharashtra: 'Religion' became the reason for the fall of the government for the first time

स्वार्थ सब कुछ नहीं, थोड़ा सबक कांग्रेस-राकांपा भी लें

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

देश में पहली बार धर्म (हिन्दुत्व) के मुद्दे पर सरकार गिरी है। एक ऐसी पार्टी की सरकार जिसे हिन्दुत्व मुद्दे पर भाजपा से ज्यादा कट्टर माना जाता है और बाबरी मस्जिद के विध्वंस में सबसे बड़े योगदान का उसका दावा भी है। शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे जब तक जिन्दा थे, वह हिन्दुत्व के मुद्दे से टस से मस नहीं हुए। इसके बाद शिवसेना का सिद्धांत शायद दम तोड़ने लगा। शिवसेना सिद्धांतों के बजाय अवसर की राजनीति को ज्यादा तरजीह देने लगी। इसका जीता-जागता उदाहरण है 2019 में महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठजोड़ से चुनाव में मिला जनादेश जिसकी अवहेलना कर विपरीत ध्रुवों वाली पार्टियों से गठबंधन कर सरकार गठन।

उद्धव ठाकरे की ‘बची-खुची शिवसेना’ भले ही गला फाड़ ले कि उसके साथ धोखा हुआ, लेकिन वह खुद अपने गिरेबान में झांक कर जवाब दें कि धोखा किसने, किसको दिया। महाराष्ट्र की जनता ने 288 सीटों वाली विधानसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना को 106 + 55 = 161 (145 के बहुमत से कहीं ज्यादा) का स्पष्ट जनादेश दिया था। लेकिन मात्र 55 सीटें लाने वाले उद्धव ठाकरे को यह मंजूर नहीं था कि मुख्यमंत्री शिवसेना का नहीं बने। उसके बाद उन्होंने जो किया वह सबको पता है। इसलिए उद्धव ठाकरे और संजय राऊत जैसे नेता इस बात को लेक चिल्ल-पों तो न करें कि उनके साथ धोखा हुआ है। सच तो यह है कि आज उनकी ही बहुत बड़ी गलती को सुधारा जा रहा है।

हिन्दुत्व मुद्दा छोड़ने का दुष्परिणाम

हिंदुत्व ही शिवसेना की पहचान रही है। उसे अपना पुराना चोला छोड़ने का दुष्परिणाम भुगतना भी पड़ा है। हाल में राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव तो शिवसेना के विधायकों ने ही उद्धव को झटका देते हुए बीजेपी के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर उसके एक्स्ट्रा उम्मीदवारों की जीत तय कर दी। उद्धव ने जब इस पर नाराजगी जताई, तो उनके करीबी एकनाथ शिंदे ने हिंदुत्व की बात कहते हुए सबसे पहले बगावत की और फिर इसी मुद्दे पर अपने साथ 39 शिवसेना विधायकों समेत करीब 50 विधायक जोड़ लिए। इसके साथ ही 9 दिन में हिंदुत्व ने आखिरकार उद्धव सरकार की बलि ले ली। यही नहीं, बागी गुट के मुखिया एकनाथ शिंदे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह कोई नई पार्टी बनाने नहीं जा रहे, न ही उनकी पार्टी का किसी भी पार्टी में विलय होगा। उनका गुट ही असली शिवसेना रहेगा और उद्धव ठाकरे के एमएलए को उनका व्हीप मानना होगा।

कांग्रेस और राकांपा से गठबंधन करने वाली शिवसेना इनके प्रभाव में इसके जैसी ही हो गयी थी। याद होगा जब महाराष्ट्र में पालघर में दो साधुओं की पीटकर हत्या की गई, तब उद्धव ठाकरे का हिन्दुत्व क्यों सो गया था? इतना ही नहीं, देश में दूसरा कोई हिन्दुत्व का मुद्दा उठा तक भी उनके बयानों में उनसे सहयोगियों का ही प्रभाव दिखा। और आज दावा करते हैं कि हम बाबा साहेब के मार्ग पर चलते हैं, हमने हिन्दुत्व का मुद्दा नहीं छोड़ा है।

शिवसेना, कांग्रेस, राकांपा के लिए सबक

हिंदुत्व के मसले पर पहली बार भारत में कोई सरकार गिरी है। यह सिर्फ शिवसेना के लिए ही बड़ा सबक नहीं है, बल्कि कांग्रेस, राकांपा जैसी तमाम पार्टियों के लिए भी सबक है कि महज सत्ता लिप्सा में किसी पार्टी से गठबंधन कर लेना जनता और खुद को भी धोखा देना है। क्योंकि इसका असर इनकी पार्टियों के राजनीतिक भविष्य पर भी पड़ता है।

भाजपा-शिवसेना का पुराना साथ

बीजेपी और शिवसेना के बीच करीब 25 वर्षों से ज्यादा वक्त का साथ रहे हैं। शिवसेना सुप्रीमो बालासाहेब ठाकरे अपने उग्र हिंदुत्व और भगवा रंग की वजह से देश के साथ विदेश तक पहचान रखते थे। बालासाहेब ने तो ये भी दावा किया था कि 1992 की 6 दिसंबर को अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ढांचे को शिवसैनिकों ने ही मटियामेट किया था। जब तक बालासाहेब जिंदा रहे, बीजेपी के साथ शिवसेना बनी रही। इसके बाद गठबंधन में राजनीतिक लिप्सा होने लगी।

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