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‘सिंहासन खाली करो जनता आती है’ का नारा देने वाले लोकनायक जयप्रकाश की जयंती आज

लोकनायक जयप्रकाश की जयंती आज

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वतंत्र भारत की राजनीति में महान योगदान देने वाले महान नेताओं में एक हैं- लोकनायक जयप्रकाश नारायण। ब्रिटिश राज में सविनय अवज्ञा आंदोलन में अगर वह जेल गये, तो दशकों बाद आजाद भारत में सरकारी नीतियों का विरोध करने के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया। मगर देश और देश की जनता के उत्थान के लिए समर्पित जयप्रकाश ने लोकतांत्रिक मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। वह  जीवन भर अपने आदर्शों एवं भारत के लिए कुछ विलक्षण और अनूठा करने के लिए जिये।

कुछ समय के लिए सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बाद जब 1974 में ‘सिंहासन खाली करो जनता आती है’ के नारे के साथ वह मैदान में उतरे तो सारा देश उनके पीछे चल पड़ा था। 11 अक्टूबर, 1902 को जन्मे जयप्रकाश नारायण देश के सच्चे समाज-सेवक थे तभी उन्हें ‘लोकनायक’ के नाम से जाना जाता है। 1999 में उन्हें मरणोपरान्त ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें समाजसेवा के लिए 1965 में मैग्ससे पुरस्कार प्रदान किया गया था।

आजाद भारत में जेपी चाहते तो बड़े से बड़ा पद हासिल कर सकते थे, पर उन्होंने तो गांधीवादी आदर्शों के अनुरूप जीवन को जीने का लक्ष्य बनाया था। देश आजाद होने के बाद यहां की राजनीति में स्वार्थ, पदलोलुपता, जातीयता, साम्प्रदायिकता, लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास आदि विकृतियां पांव पसारने लगी थीं जिससे जेपी दुःखी थे। यह उनसे सहन नहीं हुआ। फिर क्या था, कूद पड़े एक और संघर्ष के लिए।

जयप्रकाश नारायण को 1970 में इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है। इन्दिरा गांधी के प्रशासनिक सिद्धांत जेपी को पसंद नहीं था। इसलिए उन्होंने उन्हें पदच्युत करने के लिए ‘सम्पूर्ण क्रांति’ नामक आन्दोलन चलाया।

छात्र-जीवन में ही कूद पड़े स्वतंत्रता आन्दोलन में

जयप्रकाश नारायण की राजनीतिक शुरुआत पटना में विद्यार्थी जीवन में ही स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बनकर हो गयी थी। अंग्रेजी शिक्षा का परित्याग कर जयप्रकाश नारायण ने बिहार विद्यापीठ में दाखिला ले लिया था। बिहार विद्यापीठ की स्थापना युवा प्रतिभाशाली युवाओं को प्रेरित करने के लिए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और सुप्रसिद्ध गांधीवादी डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा ने की थी। ये दोनों महान विभूतियां  गांधी जी की निकट सहयोगी रही हैं। जेपी 1922 में उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गये, जहां उन्होंने 1922-1929 के बीच कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय-बरकली, विसकांसन विश्वविद्यालय में समाज-शास्त्र का अध्ययन किया। वह मार्क्स के समाजवाद से प्रभावित थे। उन्होंने एम.ए. की डिग्री हासिल की। उनकी माताजी की तबीयत ठीक न होने के कारण वह भारत वापस आ गये और पीएच.डी. पूरी न कर सके।

स्वाधानता संग्राम में सक्रिय भागीदारी निभायी

बिहार के प्रसिद्ध गांधीवादी बृज किशोर प्रसाद की पुत्री प्रभावती के साथ इनका विवाह अक्टूबर, 1920 में हुआ। प्रभावती विवाह के उपरान्त कस्तूरबा गांधी के साथ गांधी आश्रम में रहीं। 1929 में जब वह अमेरिका से लौटे, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम तेजी पर था। उनका सम्पर्क गांधीजी के साथ काम कर रहे जवाहर लाल नेहरू से हुआ। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बने। 1932 में गांधी, नेहरू और अन्य महत्त्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओं के जेल जाने के बाद, उन्होंने भारत में अलग-अलग हिस्सों में संग्राम का नेतृत्व किया। अन्ततः उन्हें भी मद्रास में सितम्बर 1932 में गिरफ्तार कर लिया गया और नासिक के जेल में भेज दिया गया। यहां उनकी मुलाकात मीनू मसानी, अच्युत पटवर्धन, एन.सी. गोरे, अशोक मेहता, एम.एच. दांतवाला, चार्ल्स मास्कारेन्हास और सी.के. नारायण स्वामी जैसे उत्साही कांग्रेसी नेताओं से हुई। जेल में इनके द्वारा की गयी चर्चाओं ने कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी (सी.एस.पी.) को जन्म दिया। सी.एस.पी. समाजवाद में विश्वास रखती थी। जब कांग्रेस ने 1934 में चुनाव में हिस्सा लेने का फैसला किया तो जे.पी. और सी.एस.पी. ने इसका विरोध किया।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ राजस्व रोको अभियान

1939 में उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज सरकार के खिलाफ लोक आन्दोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने सरकार को किराया और राजस्व रोकने के अभियान चलाये। टाटा स्टील कम्पनी में हड़ताल कराके यह प्रयास किया कि अंग्रेजों को इस्पात न पहुंचे। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 9 महीने की कैद की सजा सुनाई गयी। जेल से छूटने के बाद उन्होंने गांधी और सुभाष चंद्र बोस के बीच सुलह का प्रयास किया। उन्हें बन्दी बनाकर मुम्बई की आर्थर जेल और दिल्ली की कैम्प जेल में रखा गया। 1942 भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान वह आर्थर जेल से फरार हो गये।

उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हथियारों के उपयोग को सही समझा। उन्होंने नेपाल जाकर आजाद दस्ते का गठन किया और उसे प्रशिक्षण दिया। उन्हें एक बार फिर पंजाब में चलती ट्रेन में सितम्बर 1943 में गिरफ्तार कर लिया गया। 16 महीने बाद जनवरी 1945 में उन्हें आगरा जेल में स्थान्तरित कर दिया गया। इसके उपरान्त गांधीजी ने यह साफ कर दिया था कि डॉ. लोहिया और जे.पी. की रिहाई के बिना अंग्रेज सरकार से कोई समझौता नामुमकिन है। दोनों को अपील पर 1946 को आजाद कर दिया गया।

इन्दिरा गांधी के आपातकाल के विरोध में जेल-यात्रा

जेपी इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों के विरुद्ध थे। गिरते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन किया। उनके नेतृत्व में पीपुल्स फ्रंट ने गुजरात राज्य का चुनाव जीता। 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की जिसके अन्तर्गत जे.पी. सहित 600 से भी अधिक विरोधी नेताओं को बन्दी बनाया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गयी। जेल में जे.पी. की तबीयत और भी खराब हुई। 7 महीने बाद उनको मुक्त कर दिया गया। 1977 जेपी के प्रयासों से एकजुट विरोध पक्ष ने इंदिरा गांधी को चुनाव में हरा दिया।

स्वाधीनता आन्दोलन और आजादी के बाद जेपी के महत्वपूर्ण पड़ाव
  • जयप्रकाश नारायण राष्ट्रवादी थे और उन्होंने जलियांवाला बाग नरसंहार के विरोध में ब्रिटिश शैली के स्कूलों को छोड़कर बिहार विद्यापीठ से अपनी उच्च शिक्षा पूरी की।
  • जयप्रकाश जी ने समाजशास्त्र से एम.ए. किया। उन्होंने अमेरिकी विश्वविद्यालय से आठ वर्ष तक अध्ययन किया।
  • अमेरिका से वापस आने के बाद उनका संपर्क गांधी जी के साथ काम कर रहे जवाहर लाल नेहरू से हुआ। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बने।
  • 1932 में गांधी, नेहरू और अन्य महत्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओं के जेल जाने के बाद, उन्होंने भारत में अलग-अलग हिस्सों में संग्राम का नेतृत्व किया. अन्ततः उन्हें भी मद्रास में सितम्बर 1932 में गिरफ्तार कर लिया गया और नासिक के जेल में भेज दिया गया।
  • 1939 में उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, अंग्रेज सरकार के खिलाफ लोक आन्दोलन का नेतृत्व किया। उन्होंने सरकार को किराया और राजस्व रोकने के अभियान चलाये। टाटा स्टील कम्पनी में हड़ताल कराके यह प्रयास किया कि अंग्रेजों को इस्पात न पहुंचे। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 9 महीने की कैद की सजा सुनाई गयी।
  • 1948 में उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी दल का नेतृत्व किया और बाद में गांधीवादी दल के साथ मिलकर समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की।
  • 19 अप्रैल, 1954 में गया, बिहार में उन्होंने विनोबा भावे के सर्वोदय आन्दोलन के लिए जीवन समर्पित करने की घोषणा की।
  • 1957 में उन्होंने लोकनीति के पक्ष में राजनीति छोड़ने का निर्णय लिया।
  • 1960 के दशक के अंतिम भाग में वह राजनीति में पुनः सक्रिय रहे।
  • 1974 में किसानों के बिहार आन्दोलन में उन्होंने तत्कालीन राज्य सरकार से इस्तीफे की मांग की।
  • 15 जून, 1975 को पटना के गांधी मैदान में छात्रों की विशाल समूह के समक्ष ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ का उद्घोष। सम्पूर्ण क्रान्ति के आह्वान उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए किया था।
  • 1975 में इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की जिसके अन्तर्गत जेपी सहित 600 से भी अधिक विरोधी नेताओं को बन्दी बनाया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गयी।
  • 1977 जेपी के प्रयासों से एकजुट विरोध पक्ष ने इंदिरा गांधी को चुनाव में हरा दिया।
  • 8 अक्टूबर 1979 को हृदय की बीमारी और मधुमेह के कारण जयप्रकाश नारायण का निधन उनके निवास स्थान पटना में हुआ।

लोकनायक जयप्रकाश की समस्त जीवन-यात्रा संघर्ष तथा साधना से भरपूर रही। उन्होंने भारतीय राजनीति को ही नहीं बल्कि आम जनजीवन को एक नयी दिशा दी और नये मानक गढ़े। जय प्रकाश नारायण जिनकी हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ता था। बिहार से उठी सम्पूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी। जेपी के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण घर-घर में क्रांति का पर्याय बन गये। बाद में देश के कई नेताओं ने खुद को जेपी आन्दोलन की उपज बताते हुए राजनीतिक रोटियां सेंकीं। लालमुनि चौबे, लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान या फिर सुशील मोदी ये सारे नेता जेपी की छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का हिस्सा थे।

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