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Labour Day 2022: ‘खून- पसीने की जो मिलेगी तो खाएंगे… नहीं तो यारों हम भूखे ही सो जाएंगे…,’ आज भी मजदूरों के नहीं बदले हैं हालात

Labour Day

Labour Day: हर साल मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस (Labour Day)  मनाया जाता है। इसे श्रम दिवस, श्रमिक दिवस या मई दिवस भी कहा जाता है। मजदूर दिवस के दिन इनके हक और समाज में इनकी भागीदारी पर बात की जाती है। इस  दिन दुनिया भर में मजदूरों के हक के लिए आवाज उठाई जाती है। वैसे तो मजदूर दिवस पहली बार 1 मई को 1886 में मनाया गया था। हालांकि भारत में श्रमिक दिवस पहली बार 1 मई 1923 को मनाया गया था।

आज भी  पुराने ढर्रे पर  जीवन यापन करने को मजबूर है मजदूर 

विकास का ढांचा खड़ा करने वाले मजदूरों को राहत देने के लिए भले ही सरकारी स्तर पर तमाम योजनाएं चलाई जा रही हों, लेकिन आज भी ऐसे असंगठित मजदूरों की बड़ी तादाद है जो हर रोज बाजार में खुद को बिकने के लिए तैयार नजर आते हैं। मजदूरों के लिए सरकारों ने आयोग से लेकर अनेक योजनाएं बनाई, लेकिन मजदूर आज भी वहीं के वहीं है। समय के साथ सबकुछ बदला लेकिन नहीं बदले तो मजदूरों के हालात। वर्षों बाद भी मजदूर वर्ग आज भी उसी पुराने ढर्रे पर अपना जीवन यापन करने को मजबूर है। योजनाएं तो ढेरों बनी, दावें भी मजदूरों को रिझाने के लिए खूब हुए, लेकिन सिर्फ मजदूरों की संख्या बढ़ी, हालात अभी भी वहीं के वहीं है। यहां तक की परिवार को पालने के लिए काम की तलाश में यह मजदूर वर्ग परिवार के सहित आज भी सुबह होने के साथ शहरों की और कूच कर जाता है।

असंगठित क्षेत्र के मजदूर झेल रहे हैं परेशानी 

दो वक्त की रोटी के लिए मजदूर आज भी भटक रहे हैं। इसमें सबसे अधिक परेशानी में असंगठित क्षेत्र के मजदूर हैं। योजनाएं भी कई संचालित की जा रही हैं मगर उन तक पहुंच नहीं पाती हैं। श्रमिकों का कहना है कि केंद्र और प्रदेश सरकार योजनाएं तो अच्छी बनाती हैं लेकिन बिचौलिए इन तक विकास की किरण पहुंचने नहीं देते।

चिलचिलाती धूप में महिलाएं भी नहीं पीछे

इसी भीषण गर्मी केदौर में चिलचिलाती धूप में परिवार का सहारा बनने के लिए मजदूरी के काम में महिलाएं भी पीछे नहीं है। उपज मंडी हो या सब्जी मंडी या फिरअन्य जगहों पर विभिन्न कामों को पूरा कर रही है। हर जगह पुरुषों के साथ खड़े होकर महिलाएं भी मजदूरी का काम कर रही हैं । यहां तक की नन्हे मासूमों को गोद में उठाकर सिर पर वजन लेकर काम करने में भी पीछे नहीं हैं । दो जून की रोटी की जुगाड़ में श्रमिक वर्ग कभी यहां तो कभी वहां भटकता रहता है।

कोरोना का असर

कोरोना के कहर का साइड इफेक्ट आज भी मजदूरों का पीछा नहीं छोड़ रहा। उनका काम धंधा एकदम चैपट होता जा रहा है। उनके परिवार के समक्ष गुजर-बसर करने की समस्या पैदा हो रही है। हालांकि सरकार ने देश के गरीब लोगों को कुछ राहत देने की घोषणा की है। मगर सरकार द्वारा प्रदान की जा रही सहायता भी मजदूरों तक सही ढंग से नहीं पहुंच पा रही है। इस कारण बहुत से लोगों के समक्ष रोजी रोटी का संकट व्याप्त हो रहा है। उद्योगपतियों व ठेकेदारों के यहां अस्थाई रूप से काम करने वाले श्रमिकों को ना तो उनका मालिक कुछ दे रहा है ना ही ठेकेदार। इस विकट परिस्थिति में श्रमिक अन्य कहीं काम भी नहीं कर सकते हैं। उनकी आय के सभी रास्ते बंद हो रहे हैं।

मजदूरों का होता है शोषण

कई कारखानों में तो मजदूरों से खतरनाक काम करवाया जाता है जिस कारण उनको कई प्रकार की बीमारियां लग जाती है। कारखानों में मजदूरो को पर्याप्त चिकित्सा सुविधा, पीने का साफ पानी, विश्राम की सुविधा तक उपलब्ध नहीं करवायी जाती है। मालिकों द्वारा निरंतर मजदूरों का शोषण किया जाता है मगर मजदूरों के हितों की रक्षा के लिये बनी मजदूर यूनियनों को मजदूरों  की बजाय मालिकों की ज्यादा चिंता रहती है। हालांकि, कुछ मजदूर यूनियन अपना फर्ज भी निभाते हैं, मगर उनकी संख्या कम है। इससे हमारे देश में मजदूरों की स्थिति सबसे भयावह होती जा रही है।

क्या होगा बाल मजदूरी का अंत?

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट की मानें तो आज दुनियाभर में 15 करोड़ से ज्यादा बच्चे बाल मजदूरी करने को मजबूर हैं। चौंकाने बाली बात तो ये है कि इन 15 करोड़ में से एक करोड़ से ज्यादा बाल मजदूर भारत में हैं। हैरान होने वाली बात तो यह है कि यह आंकड़ा 2011 की जनगणना का है। 2011 से लेकर आज तक हालात बिगड़ ही रहे हैं, यानी बाल मजदूरों की संख्या घटने के बजाय इसमें साल दर साल लगातार बढ़ोतरी ही होती जा रही है। हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, दुनिया तरक्की के पथ पर अग्रसर है, लेकिन देश और दुनिया से बाल मजदूरी का अंत पता नहीं कब होगा।

नहीं होता है न्यूनतम वेतन का पालन 

न्यूनतम वेतन का पालन अब तक नहीं हो पा रहा है। आठ घंटे की जगह 12 से 14 घंटे तक काम कराया जा रहा है। सरकारें गंभीर नहीं होंगी तब तक श्रमिकों को उनका हक नहीं मिलेगा।मजदूरों को सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।

नहीं लेता है कोई इनकी सुध 

आज मजदूर दिवस है, ऐसे में फिर बड़े राजनीतिक मंचों से योजनाओं के साथ इनके लिए कई बड़ी बातें होगी, लेकिन सालभर में कभी कोई इनकी सुध नहीं लेता। शासन स्तर पर श्रमिकों से जुड़े मामलों के लिए श्रमिक विभाग बनें तो हैं , लेकिन श्रमिकों की जानकारी और योजनाओं के लिए वह अन्य विभागों पर निर्भर है।

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