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आदिवासी बनकर आरक्षण की मलाई पर कुर्मी समाज की नजर! क्या ‘अपना दाना’ चुगने देंगे आदिवासी?

Kurmi society's eyes on the cream of reservation by becoming tribal!

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

अंग्रेजी राज में 1913 के भारत सरकार के गजट ने कुर्मी या कुड़मी को आदिवासी माना गया था। 1931 में बिहार, उड़ीसा सरकार के गजट में भी इन्हें आदिवासी माना गया। इसके बाद देश में कोई जनजातीय जनगणना नहीं हुई। देश आजाद होने के बाद भी कुर्मी समाज ओबीसी में ही शामिल रहा। तब से लेकर अब तक वह अपने आप को आदिवासी घोषित किये जाने की मांग को लेकर संघर्षरत है। सड़क, न्यायालय से लेकर सदन तक उसका संघर्ष चल रहा है। इस समय भी कुर्मी समाज उग्र आन्दोलन पर उतारू है। क्या कुर्मी समाज का आन्दोलन और उसकी मांग वाकई जायज हैं ?

कौन है कुर्मी? क्या कहता है इतिहास?

कुर्मी मुख्य रूप से  उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश, पंजाब और असम राज्यों में व्यापक रूप से पायी जाने वाली जाति है। देश में इनकी जनसंख्या लगभग 2 करोड़ के आस-पास हैं। माना जाता है कि कुर्मी समाज का पूर्व का इतिहास काफी वैभवशाली था। 2020 में अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा सम्मेलन में एक वक्ता अखिलेश कुमार सिंह ने कहा था- ‘आज ही नहीं, सदियों से कूर्म (कुर्मी) वंश का गौरवशाली इतिहास रहा है। आदिकाल में राज, राजा चोलम, मिहिरभोज, संभाजी महाराज, छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे कई क्षत्रिय राजा-महाराजा हुए हैं। तब से लेकर आज तक आधुनिक भारत में भी कई ऐसे वीर क्रांतिकारी और राजनेता हुए जिन्होंने अपने पराकर्म के बल पर कुर्मी वंश की लाज रखी।‘

‘कुर्मी’ शब्द की व्युत्पत्ति कैसे हुई? बॉम्बे गजेटियर बेलगाम जिल्द-21 कहता है  कि कुनबी (कुर्मी) लोगों के कुल सम्बन्धी नाम 292 हैं। सम्पूर्ण संख्या में से 102 की उत्पत्ति चन्द्र वंश से, 78 की उत्पत्ति सूर्य वंश से तथा 81 की उत्पत्ति ब्रह्म वंश से मानी जाती है। शेष 31 कुलों के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उनका सम्बन्ध विविध वंशों से है। इस साक्ष्य के अनुसार कुर्मी समुदाय इतिहास के पन्नों में कुलीन वर्ग का माना जा सकता है।

फिर, आदि कृषकों के क्षत्रित्व/राजसी जीवन त्याग कर अपने कुटुम्ब परिवारों के साथ ग्राम बसाकर रहने का प्रमाण भी मिलता है। इन परिवारों को कुटुम्ब कहा गया और इसी शब्द से कुर्मी शब्द की उत्पत्ति मानी गयी है। परिवार के सदस्यों की जाति-बोधक संज्ञा कुटुम्बिन/कुटुम्बिक बना जो बाद में बोल चाल में कुटुम्बिक से कुम्बी,  कुरमी, कुणबी, कणवी आदि शब्द बनते गये। कुटुम्ब को कुल भी कहा जाता है, अतः कुल से कुलम्बी, कुलमी, कुरमी, कूर्मि क्षत्रिय, कुर्मी  आदि शब्द बने, ऐसा माना जाता है।

इतिहासाकर जोगेंद्र नाथ भट्टाचार्य (1896) का भी यही मानना है। यह शब्द एक भारतीय आदिवासी भाषा से लिया गया या संस्कृत यौगिक शब्द कृषि कृमि से लिया गया लगता है। गुस्ताव सालोमन ओपर्ट (1893) का भी यह मानना है कि यह शब्द क़ृषि से लिया गया लगता है। उनके अनुसार यह कोमी से व्युत्पन्न शब्द है, जिसका अर्थ है ‘हल चलाने वाला’ होता है।

इतिहास के पन्नों में दर्ज कुर्मी जाति को लेकर जो साक्ष्य हैं, उसके अनुसार, पश्चिमी बिहार के भीतर, कुर्मियों ने सत्तारूढ़ उज्जैनिया राजपूतों के साथ गठबंधन किया था। 1712 में मुगलों के खिलाफ विद्रोह में कुर्मी समुदाय के कई नेताओं ने उज्जैनिया राजा कुंवर धीर के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी थी। इनमें कुर्मी समुदाय के नेता नीमा सीमा रावत और ढाका रावत प्रमुख थे। फिर 18वीं शताब्दी की शुरुआत में मुगल शासन काल में इनके खानाबदोश और कृषकों के रूप में रहने के प्रमाण मिलते हैं।

कुर्मी क्यों बनना चाहते हैं आदिवासी?

अब सवाल है कि कुर्मी आदिवासी क्यों बनना चाहते हैं। इस पर इनका तर्क है कि 1913 के भारत सरकार के गजट में उनका नाम घोषित 13 अनुसूचित जातियों में शामिल था, लेकिन 1931 में उन्हें अनुसूचित जाति से हटा दिया गया। ओबीसी में डाल दिया गया। फिर देश आजाद होने के बाद 1950 के गजट में भी उन्हें आदिवासी के रूप में नहीं माना गया। कुड़मी विकास मोर्चा के अध्यक्ष शीतल ओहदार भी ऐसा ही कुछ कहते हैं कि 1931 से पहले वे प्रिमिटिव ट्राइब्स हुआ करते थे जिसमें झारखंड में कुल 13 जनजातियां शामिल थी, लेकिन 1950 में जो गजट प्रकाशित हुआ उसमें कुड़मी को छोड़कर सभी 12 जनजातियों को शामिल कर लिया गया है।

ऐसा लगता है कि 1913 में भारत सरकार का जो गजट आया था, उसमें इन्हें आदिवासी मान लिये जाने कारण ही आज तक यह स्थिति बनी हुई है कि यह समुदाय खुद को आदिवासी मान रहा है। 1931 में जो भारत सरकार का एक गजट आया था। उसमें अनुसूचित जाति की व्याख्या की गयी थी। शायद उस व्याख्या के कारण उन्हें तब आदिवासी    ब्रिटिश सरकार ने 1931 की जनगणना के आधार पर भारत सरकार द्वारा 1935 अधिनियम प्रख्यापित किया गया था। “अवसादग्रस्त वर्ग” के लिए आरक्षण को अधिनियम में शामिल किया गया था, जो 1937  में लागू हुआ था। बाद में इस “अवसादग्रस्त वर्ग” को अनुसूचित जाति के नाम से जाना जाने लगा।

इस गजट के अनुसार, मूल रूप से प्रारंभिक भारत में ‘टूटे हुए पुरुष’ या ‘आउट जातियों’ के रूप में जाना जाता है, ब्रिटिश भारत में ‘उदास वर्ग’, 1931 की जनगणना में बाहरी जातियों और गांधी द्वारा ‘हरिजन’, हिंदू समाज के अछूतों को 1935 में साइमन आयोग द्वारा “अनुसूचित जातियों” शब्दों के तहत कवर किया गया था।

झारखंड की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाला कुड़मी समुदाय पड़ोसी पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी अच्छी संख्या में है। यह समुदाय वर्षों से अपने राज्य में खुद को आदिवासी का दर्जा पाने के लिए संघर्षरत है, लेकिन सरकार की ओर से अब तक इस दिशा में कोई पहल नजर नहीं आ रही है। पिछले दिनों जब केंद्र सरकार की ओर से भोगता और पुरान जाति को अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) का दर्जा देने के लिए सदन में संविधान संशोधन बिल पेश किया गया तब कुर्मी समुदाय की उम्मीद जगी। लेकिन सरकार तक उसकी आवाज नहीं पहुंच पा रही है। भाजपा और आजसू जैसी पार्टियों के नेताओं ने पिछले दिनों राष्ट्रपति भवन पहुंचकर तत्कालीन राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को ज्ञापन देकर आदिवासी का दर्जा देने की मांग की थी। बता दें, आजसू पार्टी के सांसद चंद्रप्रकाश चौधरी, भाजपा के सांसद विद्युत वरण महतो, पुरुलिया के सांसद ज्योतिर्मय सिंह महतो तथा गोमिया के विधायक लंबोदर महतो ने मुखर होकर आदिवासी का दर्जा देने की मांग की थी।

ग़ौरतलब है कि झारखंड में कुर्मी/कुड़मी समुदाय की क़रीब सोलह फ़ीसदी आबादी है और राजनीतिक तथा सामाजिक तौर पर इनकी ताक़त भी रही है। जानकार मानते हैं कि यह बड़ी वजह हो सकती है कि सत्ता-विपक्ष के कुर्मी नेता इस मांग पर आवाज़ उठाने लगे हैं तथा रैलियों-सभाओं में शामिल होने लगे हैं। जनवरी में आयोजित रैली में कई बड़े कुर्मी नेताओं के शामिल होने के यही मतलब निकाले जाते रहे हैं। ग़ौरतलब है कि 81 सदस्यीय झारखंड विधानभा में 2014 के चुनाव में कुर्मी समुदाय के आठ विधायकों ने जीत दर्ज की थी जबकि लोकसभा की 14 सीटों में बीजेपी से दो सांसद क्रमशः रामटहल चौधरी तथा विद्युतवरण महतो चुनाव जीते थे। विधायकों में आजसू पार्टी के चंद्रप्रकाश चौधरी अभी सरकार में मंत्री हैं और वह भी कुर्मी को आदिवासी की सूची में शामिल करने की वकालत करते रहे हैं।

आदिवासियों के खड़े हुए कान?

खुद को आदिवासी घोषित किये जाने की मांग को लेकर कुर्मियों की रैली के बाद आदिवासी संगठनों के भी कान खड़े हो गए हैं। ‘आदिवासी युवा शक्ति’ तो पहले भी रांची में आक्रोश रैली निकाल चुका है। आदिवासी संगठनों का मानना है कि जनजातियों को मिले आरक्षण पर कुर्मियों की नज़र है। झारखंड मे आदिवासियों के लिए विधानसभा की 28 तथा लोकसभा की चार सीटें आरक्षित हैं। आदिवासियों को 26 फ़ीसदी आरक्षण हासिल है जबकि कुर्मी पिछड़ा वर्ग में शामिल हैं इस वर्ग को 14 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। आदिवासी इसे भी एक बड़ी वजह मान रहे हैं।

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