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Karma Puja 2022: प्रकृति पर ‘करम’ भी जरूरी है, इसके बिना ‘जल-जंगल-जमीन’ की भावना निरर्थक

Karma Puja 2022

Karma Puja 2022: सनातन धर्म के तमाम पर्व प्रकृति संरक्षण से जुड़े हैं। भारत की आदिवासी संस्कृतियां चूंकि प्रकृति के बीच पनपी हैं, इसलिए उनके सभी पर्व और उत्सव भी प्रकृति के ही इर्द-गिर्द घूमते हैं। यही सत्य है, लेकिन एक सत्य है कि प्रकृति से जुड़े सभी पर्व मनाना सिर्फ परम्पराओं में जिन्दा हैं, इनकी मूल-भावना प्रकृति संरक्षण नदारद हो चुकी है। इसे ज्यादा दूर जाकर ढूंढने की जरूरत नहीं, आज झारखंड में प्रकृति का पर्व करमा मनाया जा रहा है। भाई-बहन के पवित्र रिश्ते के साथ इसका सीधा संबंध प्रकृति संरक्षण से जुड़ा है। इस पर्व में करम की डाल का विशेष महत्व है। कुछ वर्षों पहले तक जिस सरलता से यह करम डाल जंगलों में मिल जाया करती थी, क्या आज उतनी सरलता से यह डाल मिल पाती है? यह सवाल हर प्रकृति से प्रेम करने वालों और प्रकृति की उपासना करने वालों से है। प्रकृति की आराधना तभी सफल होगी जब उसके संरक्षण में हमारी सकारात्मक भागीदारी हो। यह आज के लिए भी जरूरी है, कल हमारी आने वाली संततियों के लिए भी जरूरी है। क्योंकि प्रकृति है, तभी हम हैं!

क्या हम नहीं जाते, जब हम एक पेड़ काटते हैं, अपने लिए सांसों की गिनती कम करते जाते हैं। अपने ही स्वार्थ में घिर कर हम जंगलों को अंधाधुंध काटते चले जा रहे हैं। शहरों का दायरा बढ़ता जा रहा और जंगल का दायरा सिमटता जा रहा है। सिर्फ झारखंड के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो यह राज्य ‘जल-जंगल-जमीन’ के सिद्धांत पर पर टिका हुआ है। लेकिन कितना, आज इसको बताने और छुपाने की जरूरत नहीं रह गयी है। जंगल घट गये हैं, जंगलों के घटने से जल का स्रोत रसातल में चला गया है, जमीन तो उतरनी ही है, लेकिन उसका स्वरूप बदल गया है। तो अब झारखंड के झंडा बरदार ही बतायें कि वह ‘जल-जंगल-जमीन’ की अर्थी लिये क्यों घूम रहे हैं।

चाहे सनातन धर्म हो या आदिवासी संस्कृति, इनके पर्वों ही नहीं, बल्कि इनकी दिनचर्या को अगर प्रकृति से जोड़ा गया है तो उसका तात्पर्य है। तात्पर्य यह कि जीव-जगत और प्रकृति में संतुलन स्थापित करना है। 83 करोड़ योनियों में मनुष्य को छोड़कर तमाम जीव प्रकृति द्वारा तय नियमों पर ही चलते हैं, सिर्फ एकलौता मनुष्य ही है, उसके लिए सारे नियम ताक पर हैं। उसने इन सारे संतुलनों को बिगाड़ कर रख दिया है। प्रकृति संरक्षण जरूरी है, उसे यह बात समझ में तो आती है, उस पर चर्चा भी करता है, लेकिन अपने स्वार्थ के कारण उसे प्रयोग में नहीं ला पाता। और चाहकर भी वह प्रकृति के साथ संतुलन नहीं बना पाता। हां, सिर्फ प्रकृति प्रेमी संस्कृतियों को मानने वालों को ही इसके लिए जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि प्रकृति संरक्षण की राह में एक परेशानी भी है और उसे नकारा भी नहीं जा सकता। यह निर्विवाद सत्य है कि प्रकृति संरक्षण की भावना भारत और भारतीय संस्कृतियों में ही मौजूद है। विश्व की तमाम संस्कृतियों में प्रकृति संरक्षण की भावना नदारद है। वैश्विक स्तर पर देखें तो यह एक बहुत बड़ा कारण है। अगर विश्व की तमाम संस्कृतियों मे प्रकृति संरक्षण की बातें मौजूद होतीं तो इसके प्रकृति संरक्षण के कुछ बेहतर परिणाम सामने होते। खैर…!

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Karma Puja 2022

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