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Kalyan Singh: 1992 का हीरो जिसने राम मंदिर का किया ‘कल्याण’, राजनीति भी लगायी दांव पर

1992 का हीरो जिसने राम मंदिर का किया ‘कल्याण’

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

भाजपा के एक बड़े नेता से ज्यादा अयोध्या के राम मंदिर के लिए समर्पित कल्याण सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और राजस्थान व हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल रह चुके कल्याण सिंह ने शनिवार को लखनऊ के संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसजीपीजीआई) में अंतिम सांस ली। कल्याण सिंह बीते चार जुलाई से अस्पताल में भर्ती थे। सेप्सिस और मल्टी ऑर्गन फेल्योर के कारण उनका निधन हुआ है। वह 89 वर्ष के थे।

कल्याण सिंह की पहचान सिर्फ इतनी नहीं थी कि वह एक भाजपा नेता थे, बल्कि उन्हें एक प्रखर राष्ट्रवादी और हिन्दुत्ववादी नेता के रूप में जाना जाता है। उनका राजनीतिक सफर संघर्षपूर्ण रहा है। अपने राजनीतिक जीवन में वह कई विवादों में भी घिरे। कल्याण सिंह का जाना भारतीय राजनीति के लिए एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।

भले ही कल्याण सिंह ऐसी छवि वाले नेता थे जिनकी विचारधारा कई लोगों को पसंद नहीं आती थी, फिर भी, उनके विरोधी भी उन्हें एक दिग्गज नेता के रूप में सम्मान करते थे। हां, कल्याण सिंह ने अपने राजनीतिक करियर में एक भूल की थी, जिसका खमिजाया भी उन्हें भुगतना पड़ा था। भाजपा से नाराज होकर उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी। इसी भूल ने उनका राजनीतिक कद भी गिराया। अन्यथा आज अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के बाद भाजपा के बड़े नेताओं में उनकी गिनती होती। खैर, राम मंदिर आन्दोलन में वह जो एक बड़ी लकीर खींच गये हैं, उसको पार करना भी भाजपा के ही बड़े नेताओं के लिए सम्भव न होगा। राम मंदिर आंदोलन में तो उनकी ऐसी सक्रियता रही कि उन्हें अपनी सीएम कुर्सी तक कुर्बान करनी पड़ी थी। राम मंदिर के लिए यह त्याग भी देश हमेशा याद रखेगा।

राम मंदिर आंदोलन के असली सूत्रधार

90 के दशक में जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था, कल्याण सिंह इस आन्दोलन के सूत्रधार बन गये। उनके ही नेतृत्व में राम मंदिर आंदोलन यूपी से निकल कर पूरे देश में फैल गया था। उन्होंने हिंदुत्व की अपनी छवि जनता के सामने रखी। इसके साथ ही उन्हे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भी साथ मिला जिससे आंदोलन ने और जोर पकड़ लिया। कल्याण सिंह शुरू से आरएसएस के जुझारू कार्यकर्ता थे। यूपी में इसका लाभ भाजपा को मिला और 1991 में यूपी में भाजपा की सरकार बनी थी।

कल्याण के शासन काल में राम मंदिर आन्दोलन पहुंचा चरम पर

1991 में उत्तर प्रदेश में भाजपा ने कल्याण सिंह के नेतृत्व में सरकार बनायी थी। यह पहली बार था जब भाजपा ने यूपी में इतने प्रचंड बहुमत से सरकार बनायी थी। कहना न होगा, जिस आंदोलन की बदौलत भाजपा ने यूपी में सत्ता पायी उसके सूत्रधार कल्याण सिंह ही थे, इसलिए मुख्यमंत्री पद के लिए और कोई नेता दावेदार था ही नहीं। उन्हें ही मुख्यमंत्री का ताज दिया गया। कल्याण सिंह के कार्यकाल में सबकुछ ठीक-ठाक चलता रहा। कल्याण सिंह के शासन में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर पहुंच रहा था। इसका नतीजा यह हुआ कि वर्ष 1992 में बाबरी विध्वंस हो गया।

बाबरी विध्वंस की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए दिया था इस्तीफा

भारत की राजनीति में बाबरी विध्वंस की घटना अपना एक अलग ही स्थान रखती है। सच कहा जाये तो यह घटना राजनीति में भाजपा का भाग्योदय करने वाली घटना साबित हुई। हालांकि तब केंद्र से लेकर यूपी तक की सरकार की जड़ें हिल गयी थीं। कल्याण सिंह ने इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए और 6 दिसंबर 1992 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद उनका कद और सुदृढ़ और नामचीन हो गया। उनके प्रधानमंत्री तक बनाए जाने की चर्चा चलने लगी थीं।

1997 में दोबारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद कल्याण सिंह 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अत्रौली और कासगंज से विधायक निर्वाचित हुए। चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरा, लेकिन मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी-बहुजन समाज पार्टी ने गठबंधन सरकार बनायी। विधान सभा में कल्याण सिंह विपक्ष के नेता बने। कल्याण सिंह सितम्बर 1997 से नवम्बर 1999 तक दोबारा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

1999 में कल्याण सिंह ने छोड़ दी भाजपा

दिसम्बर 1999 में कल्याण सिंह ने पार्टी छोड़ दी और जनवरी 2004 में दोबारा भारतीय जनता पार्टी से जुड़े। साल 2004 के आम चुनावों में कल्याण सिंह ने बुलन्दशहर से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ा। साल 2009 में कल्याण सिंह दोबारा भारतीय जनता पार्टी को छोड़ दिया और एटा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय सांसद चुने गये।

दो राज्यों के राज्यपाल बने

कल्याण सिंह ने राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का पद भी सम्भाला। 4 सितम्बर 2014 को राजस्थान के राज्यपाल पद की शपथ ली। जनवरी 2015 में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया था।

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