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JPSC Centre of Corruption? झारखंड लोक सेवा आयोग या ‘अयोग्य’! आखिर कब थमेगा विवादों का ये अंतहीन सिलसिला?

JPSC Centre of Corruption

न्यूज़ डेस्क/ समाचार प्लस झारखंड -बिहार
JPSC Centre of Corruption: झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC ) का विवादों से शुरू से ही नाता रहा है। राज्य की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित नियोजन संस्था झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC ) अपने प्रथम सिविल सेवा परीक्षा से ही विवादों में रहा है। जब भी जेपीएससी ने कोई परीक्षा का आयोजन किया है, तब – तब विवाद हुआ है। यह विवाद नियुक्ति के बाद भी जारी रहा है। चाहे वह संयुक्त सिविल सेवा की परीक्षा हो, या बाजार समिति पर्यवेक्षक, सहकारिता प्रसार पदाधिकारी की परीक्षा हो या फिर असिस्टेंट प्रोफेसर की, या इसके द्वारा संचालित अन्य साक्षात्कार या नियुक्ति परीक्षाएं, सभी में जमकर धांधली की गई, इसे बहुचर्चित व्यापम घोटाले से भी बड़ा माना गया।

अनियमितता से जुड़े कई मामले कोर्ट में चल रहे हैं

झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की 11 परीक्षाओं की सीबीआइ जांच चल रही है। ये परीक्षाएं शुरू से ही विवादित रही हैं। परीक्षाओं में नंबर बढ़ाकर अयोग्य अभ्यर्थियों को योग्य बनाया गया, कॉपी में छेड़छाड़ की गई, सूची बनाने में भी गड़बड़ी की गई और अपने चहेते को नौकरी दी गई। कुछ परीक्षाओं की जांच में सीबीआइ ने भी आरोपों को सही पाते हुए तत्कालीन अध्यक्ष, सचिव व सदस्यों के विरुद्ध कार्रवाई की। झारखंड हाई कोर्ट के आदेश पर जेपीएससी की इन सभी 11 परीक्षाओं की सीबीआइ से जांच कराई जा रही है। अनियमितता से जुड़े कई मामले कोर्ट में चल रहे हैं। परीक्षाओं में अनियमितता को लेकर तत्कालीन अध्यक्ष और सदस्य के अलावा सचिव के विरुद्ध भी कार्रवाई हुई है। सीबीआइ ने तो व्याख्याता नियुक्ति में गड़बड़ी की चार्जशीट भी दाखिल की थी, जिसकी सुनवाई जारी है।

सभी नियुक्ति परीक्षाएं रहीं हैं विवादित 

2003 में 64 पदों के लिए परीक्षा ली गई। इसमें सभी नियुक्ति में भ्रष्टाचार के आरोप लगे। ऐसे लोग भी अधिकारी बन गए जिनके आंसरशीट की जांच ही नहीं हुई थी। आंसरशीट में परीक्षक के हस्ताक्षर का न होना, ओवर राइटिंग आदि की बात भी सामने आई। इसकी जांच गुजरात स्थित एफएसएल टीम से कराई गई। 2005 में सेकेंड सिविल सर्विस परीक्षा ली गई। इस परीक्षा में 165 लोगों के चयन पर फर्जीवाड़े  का गंभीर आरोप लगा। सभी को बर्खास्त करने की अनुशंसा भी की गई। तीसरी सिविल सेवा परीक्षा में भी अनियमितता बरती गयी। नियुक्तियों पर आरोप लगे। लेकिन इस परीक्षा को किसी भी तरह के जांच के दायरे में नहीं लाया गया।चौथी जेपीएससी परीक्षा भी विवादों में रही। प्रारम्भिक परीक्षा में क्वेश्चन को लेकर सवाल उठे। आयोग के मॉडल उत्तर में भी कई खामियां रहीं। खुद आयोग के एग्जामिनेशन कंट्रोलर ने ही पीटी परीक्षा को रद्द करने की अनुशंसा की। अभ्यर्थियों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वहीं पांचवीं जेपीएससी में आरक्षण के मुद्दे पर आयोग पर सवाल उठाए गए। आयोग ने बिना सरकार से अनुमति लिए पीटी में आरक्षण समाप्त कर दिया था। छठी सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा भी विवादों के घेरे में रही। इस  परीक्षा के परिणाम तो तीन बार संशोधित कर जारी किए गए।

सीबीआइ के अनुसंधान में हो चुकी है धांधली की पुष्टि 

जेपीएससी में आयोजित प्रथम एवं द्वितीय सिविल सेवा परीक्षा के अलावा व्याख्याता नियुक्ति में बड़ी संख्या में नेताओं और अधिकारियों के रिश्तेदार नियुक्त हुए। यहां तक कि जेपीएससी के तत्कालीन अध्यक्ष दिलीप प्रसाद, सदस्य गोपाल सिंह, राधा गोविंद नागेश, शांति देवी के भी कई रिश्तेदार इन परीक्षाओं में चयनित हुए थे। सीबीआइ के अनुसंधान में भी इसकी पुष्टि हो चुकी है।

2003 में पहली सिविल सेवा परीक्षा आयोजित की गई थी 

2002 में आयोग के गठन के बाद 2003 में पहली जेपीएससी सिविल सेवा परीक्षा आयोजित की गई। 64 पदों की नियुक्ति के लिए यह परीक्षा ली गई थी। इसमें भी ऐच्छिक विषय इतिहास के प्रश्न एक विशेष गाइड से क्रमवार हूबहू उतार दी गई ।  जिससे आयोग की पारदर्शिता पर सवाल उठ खड़े हुए।

निकलती जा रही है अभ्यर्थियों की उम्र 

20 साल में जेपीएससी ने 1292 पदों के लिए  मात्र सात परीक्षाएं लीं हैं। अगर हर वर्ष जेपीएससी की परीक्षा नियमित रूप से आयोजित होती तो राज्य में बेरोजगारों की फौज खड़ा नहीं होती। समय पर परीक्षा न लिए जाने के कारण आज राज्य के अधिकांश अभ्यर्थी अपने उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंच कर अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं । गौरतलब है कि द्वितीय जेपीएससी परीक्षा के समय परीक्षा में अवसर की बाध्यता समाप्त कर दी गयी थी और इस कारण अभ्यर्थियों ने अवसरों की बाध्यता की परवाह नहीं की और लगातार जेपीएससी की परीक्षाओं  में सम्मिलित होते चले गये। अगर उम्मीदवारों को यह मालूम रहता कि आगे चलकर कट ऑफ़ डेट में बदलाव कर दिया जाएगा, तो वे अपना अवसर बचा कर रखते।

 कट ऑफ़ डेट पर सरकार ने भी गंभीरता से नहीं किया विचार

हालांकि वर्ष 2013 में पंचम जेपीएससी परीक्षा में प्रथम एवं द्वितीय परीक्षा में हुई धांधली को देखते हुए तत्कालीन सरकार ने परीक्षाओं में सम्मिलित होने वाले उम्मीदवारों को अवसर में छूट प्रदान की लेकिन, उस वक़्त की सरकार ने प्रथम एवं द्वितीय परीक्षा में सम्मिलित होने वाले उन उम्मीदवारों पर विचार नहीं किया जिनकी पंचम जेपीएससी परीक्षा में बैठने की आयु समाप्त हो गयी। यहां  न्यायसंगत तो  यह होता कि  जो भी उम्मीदवार प्रथम एवं द्वितीय परीक्षा में सफल नहीं हुए थे,  उन्हें बिना किसी उम्र बंधन के पंचम जेपीएससी परीक्षा में सम्मिलित होने का अवसर प्रदान किया जाता, लेकिन अभ्यर्थियों के लाख प्रयास करने के बाद भी हेमंत सरकार ने इस पर कोई विचार नहीं किया।

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