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12वां अधिवेशन: JMM के अंदरखाने में जारी है घमासान, असंतोष दबाना होगी चुनौती!

JMM का 11वां अधिवेशन: जेएमएम अंदरखाने में जारी है घमासान

न्यूज़ डेस्क/ समाचार प्लस झारखंड- बिहार 
झारखण्ड में पंचायत चुनाव के निकट आने के साथ ही राजनीतिक गतिविधियां भी बढ़ गई हैं। सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा(JMM) के केंद्रीय अध्यक्ष शिबू सोरेन (Shibu Soren) की अध्यक्षता में पिछले दिनों हुई बैठक में लिए गए फैसले के तहत आगामी 18 दिसंबर को रांची में पार्टी का केंद्रीय अधिवेशन होने जा रहा है। इसको लेकर तैयारी तेज हो गई। संविधान संशोधन और राजनीतिक प्रतिवेदन के साथ-साथ संगठन के आगामी कार्यक्रम तय करने के लिए समितियों का गठन भी किया गया है। सभी समितियों के संयोजक कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन(Hemant Soren) होंगे। ये महाधिवेशन सीएम के निगरानी में होगा।

11  वें अधिवेशन के बाद पार्टी पर  गुरुजी एंड फैमिली का कब्जा

झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की स्थापना विनोद बिहारी महतो व शिबू सोरेन ने प्रसिद्ध मा‌र्क्सवादी चिंतक कॉमरेड एके राय के साथ मिलकर धनबाद में की थी। विनोद बिहारी महतो अध्यक्ष व शिबू सोरेन महासचिव बने थे। विनोद पार्टी के नंबर वन व शिबू नंबर टू नेता थे। शिबू विनोद को अपना धर्म पिता मानते थे, लेकिन कुछ साल बाद ही पार्टी पर कब्जे को लेकर राजनीतिक जंग छिड़ गई और धीरे-धीरे शिबू सोरेन पार्टी के शीर्ष पर बैठ गए। हालांकि पार्टी पर उनका कब्जा नहीं हुआ।

शिबू फैमिली का हर सदस्य केंद्रीय पदाधिकारी

महाधिवेशन में शिबू सोरेन अध्यक्ष एवं हेमंत सोरेन कार्यकारी अध्यक्ष चुने गए थे। बाकी कमेटी के लिए शिबू सोरेन व हेमंत सोरेन को अधिकृत कर दिया गया था। पार्टी की केंद्रीय कमेटी बना दी गई । शिबू सोरेन अध्यक्ष, उनकी पत्नी रूपी सोरेन केंद्रीय उपाध्यक्ष, बड़ी बहू व विधायक सीता सोरेन (हालांकि वो अभी पार्टी की कार्यशैली से नाराज चल रहीं हैं) केंद्रीय महासचिव, पुत्र हेमंत कार्यकारी अध्यक्ष तथा छोटा पुत्र बसंत सोरेन पार्टी की युवा इकाई झारखंड युवा मोर्चा के केंद्रीय अध्यक्ष बनाए गए थे। शिबू फैमिली का हर वो सदस्य जो राजनीति में थोड़ा बहुत भी सक्रिय है, पार्टी का केंद्रीय पदाधिकारी है। जबकि धनबाद व गिरिडीह जहां पार्टी का जन्म हुआ वहां के नेताओं को विशेष तवज्जो नहीं दी गई थी। धनबाद से पूर्व मंत्री मथुरा महतो को प्रोन्नति देते हुए उपाध्यक्ष जरूर बनाया गया था, लेकिन दूसरे किसी नेता को पदाधिकारी नहीं बनाया गया।

जेएमएम के अंदर कई बड़े चेहरे हैं उपेक्षित

जेएमएम के 12वें केंद्रीय अधिवेशन में पार्टी को मजबूत और सुसंगठित बनाने के लिए पार्टी के बड़े चेहरे जो दरकिनार कर दिए गए हैं, उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देकर साथ ले कर चलने की कोशिश होगी। आज चम्पई सोरेन को छोड़ दें तो जेएमएम में कई वरिष्ठ नेतागण हैं जिन्हें साइडलाइन कर दिया गया है, उनका पार्टी में कद घटा है। इन्हें पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी देकर उनके असंतोष को कम किया जा सकता है।

अंदरखाने में सबकुछ अच्छा नहीं चल रहा

झारखंड की सत्ता संभाल रहे झामुमो में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टी से नाराज चल रहीं सीएम की भाभी सीता सोरेन नाराज चल रही हैं, उनका कहना है कि पार्टी पर दलालों का कब्जा हो गया है. इसलिए सही बात हेमंत सोरेन तक नहीं पहुंच रही है, जिस भरोसे के साथ झारखंड के लोगों ने हेमंत सोरेन की सरकार बनाई, लेकिन उनकी उम्मीद पूरी नहीं हो रही है। हेमंत सरकार में उनकी उपेक्षा हुई है।

मथुरा प्रसाद महतो और रमेश टुडू विवाद 

झामुमो में विवाद की शुरुआत 2019 में हुए विधानसभा चुनाव से हुई। जब टुंडी विधानसभा सीट के लिए विधायक मथुरा प्रसाद महतो के साथ-साथ पार्टी के जिलाध्यक्ष रमेश टुडू ने भी अपनी दावेदारी पेश कर दी थी। पार्टी ने मथुरा महतो पर विश्वास जताते हुए उन्हें टिकट दिया। मथुरा महतो ने जीत दर्ज करते हुए यह सीट वापस पार्टी की झोली में डाल दी। लेकिन रमेश टुडू के साथ विवाद की नींव यहां से पड़ चुकी थी। इसके बाद दोनों ही नेता शायद ही किसी पार्टी कार्यक्रम में एक मंच पर दिखाई दिए। यहां भी असंतोष पनपता दिख रहा है।

दूसरी बार मंत्री बने गए हैं चंपई सोरेन

अगर झामुमो में वरीय और दिग्गज नेता की बात करें तो चंपई सोरेन को छोड़कर कोई दूसरे वरिष्ठ नेताओं को अहमियत नहीं दी गई जितनी चम्पई सोरेन को। इन्हें हेमंत सरकार में दूसरी बार मंत्री बनाया गया है। चंपई सोरेन झारखंड मुक्ति मोर्चा के वरिष्ठ नेता हैं। चंपई सोरेन झारखंड सरकार में पहले भी मंत्री रह चुके हैं। झारखंड टाइगर के नाम से वो जाने जाते हैं। 2019 में वो 6ठी बार विधायक बने हैं। पहली बार 1990 में सरायकेला सीट पर हुए उपचुनाव में चंपई सोरेन विधायक बने, तब वह निर्दलीय थे।

शिबू सोरेन के काफी करीबी माने जाते हैं चंपई

साल 2000 में हुए विधानसभा चुनाव में भी उन्हें पराजय मिली। 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में उन्हें जीत हासिल हुई. 2005 से अब तक वो सरायकेला सीट नहीं हारे। चंपई सोरेन झारखंड अलग राज्य के आंदोलनकारी भी रहे हैं। चंपई सोरेन शिबू सोरेन के काफी करीबी माने जाते हैं।

स्टीफन मरांडी पड़े अलग-थलग 

स्टीफन मरांडी 1978 से राजनीति कर रहे हैं, ये झारखंड मुक्ति मोर्चा के काफी वरिष्ठ और दिग्गज नेता माने जाते हैं, लेकिन अभी इन्हें पार्टी को से को बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई है। श्री मरांडी 1980 में झामुमो के टिकट पर दुमका सीट से पहली बार विधायक बने। स्टीफन मरांडी 1985, 1990, 1995 और 2000 के चुनाव में भी झामुमो के टिकट पर लगातार पांच बार चुने गए। 2005 में झामुमो ने मरांडी का टिकट काटकर हेमंत सोरेन को पहली बार इस क्षेत्र से मैदान में उतारा. 2005 में मरांडी निर्दलीय मैदान में उतरे और विजयी हुए। स्टीफन मरांडी झारखंड मुक्ति मोर्चा के लंबे समय से सदस्य रहे हैं। साल 2005 के झारखंड विधान सभा चुनाव में टिकट कट जाने पर उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी। दुमका सीट पर निर्दलीय चुनाव लड़ कर जेएमएम सुप्रीमो शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन को हरा दिया था।

हफीजुल हसन को दी गई तवज्जो

हफीजुल हसन को पिता हाजी हुसैन अंसारी के निधन के बाद बिना विधायक बनाए मंत्री बना दिया गया। झारखंड में 15 साल के बाद ऐसा हुआ। इससे पहले 2006 में मधु कोड़ा की सरकार में भानु प्रताप शाही के पिता हेमेंद्र प्रताप देहाती को बिना चुनाव लड़े मंत्री बनाया गया।

नलिन सोरेन जैसे कद्दावर नेता किसी भूमिका में नहीं  

सरकार और उसके अनुभवी विधायकों की बात करें तो झारखंड मुक्ति मोर्चा में प्रो. स्टीफन मरांडी, नलिन सोरेन जैसे कद्दावर नेता किसी भूमिका में अभी नहीं है, लेकिन इन सभी का अपना जनाधार व्यापक है साथ ही उनका राजनीतिक अनुभव भी कम नहीं है।

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