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राष्ट्रीय खेल दिवसः झारखंड की खेल नीति के ग्रह-दोष, आखिर कहां रह जाती है कमी?

झारखंड की खेल नीति, आखिर कहां रह जाती है कमी?

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

जब भी कोई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता होती है झारखंड के खिलाड़ियों की उपस्थिति कम ही रहती है। उपस्थिति होती भी है तो उपलब्धि शून्य होती है। झारखंड एक आदिवासी बहुल राज्य है। खेलों की दृष्टि से यहां के लोगों की शारीरिक संरचना काफी सही है। शारीरिक रूप से यहां के लोग काफी मजबूत होते हैं जो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की स्पर्द्धाओं के लिए बिलकुल सही है। बावजूद इसके झारखंड राज्य खेलों में वह पहचान नहीं बना पाता जो कि देश के दूसरे राज्य बना रहे हैं। टोक्यो ओलंपिक 2020 में झारखंड की तीन महिला खिलाड़ी ही देश का प्रतिनिधित्व कर सकी थीं। हॉकी में तो चूंकि झारखंड की अपनी एक पहचान है, इसलिए झारखंड की दो महिला खिलाड़ियों का चयन उतना आश्चर्य पैदा नहीं करता, लेकिन पुरुष हॉकी से एक भी खिलाड़ी का चयन नहीं हो पाना आश्चर्य तो जरूर उत्पन्न करता है। झारखंड की स्टार तीरंदाज दीपिका कुमारी ने खुद के बूते अपनी पहचान बनायी है, उनका भी राष्ट्रीय टीम में चयन आश्चर्यजनक नहीं है। होना तो यह चाहिए था कि झारखंड एथलेटिक्स में अपनी पहचान बनाता। जो कि आदिवासी बहुल राज्य होने के नाते भी सही होता। परन्तु ऐसा नहीं है। खेलों में झारखंड की असली पहचान तभी बन पायेगी जब वह एथेलेटिक्स में अपनी छाप छोड़ने में कामयाब होगा। लेकिन फिलहाल ऐसा होता नहीं दीख रहा है।

खेलों के कारण नहीं, भ्रष्टाचार के कारण चर्चा में

याद होगा 2011 में रांची में 33वें राष्ट्रीय खेल हुए थे। इन खेलों में झारखंड ने 33 स्वर्ण, 26 रजत और 37 कांस्य पदक जीतकर 5वां स्थान प्राप्त किया था। लेकिन यह झारखंड की वास्तविक उपलब्धि नहीं थी। झारखंड ने यह उपलब्धि ‘आयातित’ खिलाड़ियों के बल पर हासिल की थी। इसका गवाही 2007 और 2015 के राष्ट्रीय खेल कर देंगे। 2011 राष्ट्रीय खेलों से पहले गुवाहाटी में 2007 के राष्ट्रीय खेल हुए थे, इसमें झारखंड 6 स्वर्ण, 9 रजत और 7 कांस्य पदकों के साथ 15वें स्थान पर था। जबकि 2011 के राष्ट्रीय खेलों के बाद केरल में हुए 2015 के राष्ट्रीय खेलों में झारखंड ने 8 स्वर्ण 14 रजत और 11 कांस्य पदक झटके थे, और पदक तालिका में वह 13वें स्थान पर था। 2020 का गोवा में होने वाला राष्ट्रीय खेल कोरोना महामारी की वजह से नहीं हो पाया। 2011 का राष्ट्रीय खेल झारखंड की उपलब्धियों से ज्यादा ‘भ्रष्टाचार’ के कारण चर्चा में रहा।

राष्ट्रीय खेलों में पिछले प्रदर्शन बताते हैं कि खेलों में झारखंड निचले पायदान पर ही है। जबकि यहां के खिलाड़ी क्षमता के मायने में कम नहीं है। तो फिर आखिर चूक कहां हो रही है। दूसरे राज्य कैसे झारखंड को पीछे छोड़ देते हैं या दूसरे राज्य ऐसा क्या करते हैं कि झारखंड से काफी आगे निकल जाते हैं।

देश के कई राज्य झारखंड से काफी बेहतर

झारखंड की खेल प्रतिभाओं का आकलन करने से पहले हमें अपने चारों ओर देख भी लेना चाहिए। उत्तर में हरियाणा, पंजाब और दिल्ली खेलों के इन्फ्रास्ट्रक्चर में काफी बेहतर हैं और इन राज्यों से ज्यादा खिलाड़ी भी निकलते हैं। याद होगा, टोक्यो ओलंपिक में सबसे ज्यादा 31 खिलाड़ी हरियाणा से गये थे। फिर दिल्ली और पंजाब के खिलाड़ियों का प्रतिनिधित्व भी सर्वाधिक होता है। दक्षिण में केरल और कर्नाटक के खिलाड़ियों का प्रदर्शन काफी बेहतर है। पश्चिम में महाराष्ट्र भी देश को खिलाड़ी देने में पीछे नहीं रहता है। पूर्व में पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर और असम उत्तर भारत के पंजाब और हरियाणा के खिलाड़ियों के लिए चुनौती बने रहते हैं। इनके बीच में झारखंड बेचारा बन कर रह गया है।

खिलाड़ी उगलने वाला राज्य है हरियाणा

देश में हरियाणा को खेलों की राजधानी कह सकते हैं। यहां के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्पर्द्धाओं में भी कमाल करते हैं। टोक्यो ओलंपिक इसका प्रमाण है। आजाद भारत में एथलेटिक्स का पहला गोल्ड मेडल दिलाने वाले नीरज चोपड़ा हरियाणा के ही है। रजत दिलाने वाले रवि दहिया और कांस्य दिलाने वाले बजरंग पूनिया भी हरियाणा के ही है। यानी टोक्यो ओलम्पिक में मिले 7 में से 6 व्यक्तिगत स्पर्द्धाओं के आधा पदक (3) हरियाणा ने दिये।

हरियाणा खेलों में बेहतर है, क्योंकि वहां की सरकार खिलाड़ियों को बेहतरीन सुविधाएं उपलब्ध करा रही है। और नतीजे भी सकारात्मक आ रहे हैं। हरियाणा में कुश्ती, मुक्केबाजी, हॉकी व कबड्डी के बाद अब निशानेबाजी, टेनिस, एथलेटिक्स के खिलाड़ियों की पौध तैयार की जा रही है। देश की कुल आबादी में हरियाणा की हिस्सेदारी महज दो फीसदी है। टोक्यो ओलंपिक में हरियाणा के 31 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। यह देश से टोक्यो पहुंचने वाले कुल खिलाड़ियों का 25 फीसदी हिस्सा है।

हरियाणा में करीब 440 खेल नर्सरियां हैं, इनमें से करीब 400 चल रही हैं। यहां एक ही जगह पर हर तरह की खेल की सुविधाएं मिलती हैं। राज्य में 232 मिनी स्टेडियम और 21 जिला स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और दो प्रदेश स्तरीय स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स हैं। ये अंतरराष्ट्रीय स्तर के कॉम्प्लेक्स हैं, यहां 350 से ज्यादा कोच तैनात हैं। इसके साथ ही साई के सबसे ज्यादा 22 सेंटर प्रदेश में हैं और उत्तर क्षेत्र का सेंटर भी यहां है।

यही नहीं, खिलाड़ियों की छोटी-छोटी उपलब्धियों पर उन्हें सम्मानित करने की परम्परा है। स्कूल स्तर पर भी अगर खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो उन्हें सम्मानित किया जाता है। इसी तरह ऊंचे स्तरों पर खिलाड़ियों के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें सम्मानित करने की नीति अपनायी गयी है। टोक्यो ओलंपिक के लिए जाने से पहले ही हरियाणा सरकार ने घोषणा कर रखी थी कि उसके राज्य का जो खिलाड़ी स्वर्ण जीतकर लायेगा उसे 6 करोड़ रुपये राज्य सरकार देगी। उसी तरह रजत और कांस्य पदक के लिए भी इनामों की घोषणा कर दी गयी थी।

झारखंड की खेल नीति खिलाड़ी पैदा करने में कितनी सहायक?

पिछले साल झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने ‘झारखंड खेल नीति-2020’ लॉन्च किया था। झारखंड की इस खेल नीति में खिलाड़ियों, प्रशिक्षकों, स्कूली स्तर पर खेल की अनिवार्यता, पदक जीतने पर खिलाड़ियों को कैश अवार्ड, पुराने खिलाड़ियों को प्रतिमाह पेंशन और दिव्यांग खिलाड़ियों को प्राथमिकता देने समेत कई बातें शामिल हैं। नयी खेल नीति में खिलाड़ियों और कोच को प्रोत्साहित करने के लिए ‘जयपाल सिंह मुंडा अवार्ड’ देने की बात कही गयी है।

स्कूलों, कॉलेजों से लेकर ग्रामीण स्तर पर खेल को बढ़ावा देने की योजना नयी खेल नीति का हिस्सा है। खेल अकादमी व खेल विश्वविद्यालयों की स्थापना कर राज्य में खेलों को बढ़ावा देने की भी नीति बनायी गयी है। खिलाड़ियों को मुफ्त आवास, बोर्डिंग, खेल किट, खेल उपकरण समेत कई सुविधाएं देने का भी जिक्र है। साथ ही, नयी खेल नीति में दिव्यांग खिलाड़ियों को समान अवसर प्रदान करने की बात कही गयी है। नयी खेल नीति में ओलंपिक, एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ, विश्व कप या विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतनेवाले या भाग लेनेवाले खिलाड़ियों के लिए पुरस्कार की राशि तय की गयी है। ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतनेवाले खिलाड़ियों को दो करोड़, रजत को एक करोड़ और कांस्य पदक जीतनेवाले को 75 लाख रुपये का पुरस्कार दिया जायेगा। विश्वकप या विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतने पर 20 लाख, रजत जीतने पर 15 लाख और कांस्य जीतने पर 10 लाख रुपये पुरस्कार में मिलेंगे। वहीं, ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतनेवाले खिलाड़ी के कोच को 10 लाख रुपये पुरस्कार में मिलेंगे।

नयी नीति खेलों को कितनी दे पायेगी ऊर्जा?

झारखंड की पुरानी खेल नीति झारखंड के खेलों का भला नहीं कर पा रही थी इसलिए नयी खेल नीति लॉन्च की गयी। लेकिन यह नयी खेल नीति झारखंड के खेलों को कितनी ऊर्जा दे पायेगी, यह समय बतायेगा। चूंकि पुरानी खेल नीति के कारगर नहीं हो पाने के कारण नयी खेल नीति लानी पड़ी है। इसलिए झारखंड के लिए इसे एक नयी शुरुआत ही माना जायेगा। इसके परिणाम आने में वर्षों भी लग सकते हैं। नयी खेल नीति का परिणाम क्या होगा और इसके परिणाम कब से आने लगेंगे यह कहना अभी सहज नहीं होगा, क्योंकि अभी तो यह पॉलिसी ठीक से लागू ही नहीं हो पायी है। क्योंकि जब यह नीति लॉन्च की गयी थी तब कोरोना महामारी का दौर चल रहा था यह दौर अभी खत्म भी नहीं हुआ है। खेलों की गतिविधियों अभी पूरी तरह से सुचारू भी नहीं हो पायीं हैं, तब नयी खेल नीति से परिणाम की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा। इसके लिए इंतजार ही करना होगा।

यह भी पढ़ेः PM Modi Mann Ki Baat : पीएम मोदी ने ध्यानचंद को किया याद, कहा-41 साल बाद हॉकी में जान आई

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