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Hemant Soren Jharkhand: हेमंत सोरेन के विश्वास मत पर क्यों है राजनीतिक विशेषज्ञों में अलग-अलग राय?

Hemant Soren Jharkhand:

Hemant Soren Jharkhand: संवैधानिक व्यवस्था में किसी सरकार को चार प्रकार से बहुमत सिद्ध करना होता है। सरकार गठन के लिए विश्वास मत, विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास मत, काम रोको प्रस्ताव और सभापति-उपसभापति के लिए बहुमत। इसलिए सामान्य जानकारी रखने वाले लोग यह जानना चाहते हैं कि हेमंत सोरेन आखिर क्यों बहुमत सिद्ध करना चाहते हैं। क्योंकि बहुमत सिद्ध करने के बाद उनकी सरकार चल रही है और विपक्ष द्वारा कोई अविश्वास प्रस्ताव लाया भी नहीं गया है। इस विषय पर राज्य के राजनैतिक संवैधानिक विशेषज्ञों इस पर खुल मंतव्य दे पा रहे। कुछ विशेषज्ञ अपनी राय दे भी रहे हैं तो उसमें उनके मत एक नहीं हैं। दूसरी ओर, विपक्षी दल भाजपा भी इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही है। हां, भाजपा अंदर ही अंदर अपनी तैयारी में लगी हुई जरूर है।

अभी तक की प्राप्त खबरों के अनुसार हेमंत सरकार विधानसभा में विश्वास मत हासिल करेगी। विश्वास मत के सहारे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सरकार के समक्ष उत्पन्न राजनीतिक स्थितियों से निबटना चाहते हैं। ताकि आने वाले समय में जो भी परिस्थिति उत्पन्न हो, उसका सामना सुगमता से किया जा सके। साथ ही विश्वास मत हासिल करके विपक्ष को कड़ा संदेश देना चाहते हैं। हेमंत सरकार सदन में विश्वास मत लाती है तो उसे हासिल करने में उसे किसी तरह की परेशानी फिलहाल नहीं दिखाई दे रही है। राजनीतिक हलचलों के बीच सत्ताधारी दल के विधायक जो रायपुर शिफ्ट किये गये थे, रांची लौट आए हैं। ऐसे उम्मीद की जा रही है कि सोमवार को सदन में हेमंत सरकार आसानी से बहुमत साबित कर लेगी।

अभी तक बनी हुई है ऊहोपोह की स्थिति!

जहां तक राजनीतक विश्लेषकों की बात है तो वे राज्य सरकार के इस कदम पर एक मत नहीं दिखते हैं। कुछ विश्लेषकों यह जरूर कह रहे हैं कि बहुमत हासिल कर हेमंत सोरेन लाभ की स्थिति मे रहेंगे। यदि ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल निर्णय आता है तो भी उपजी हुई नयी परिस्थिति में वह चुनौतियों का सामना बेहतर तरीके से कर पाएंगे।

सभी जानते हैं कि ‘लाभ के पद’ मामले में राज्यपाल रमेश बैस के पास चुनाव आयोग के मंतव्य का एक पत्र आया हुआ है। जिस पर राज्यपाल अभी तक संवैधानिक विश्लेषकों की राय ले रहे हैं और उन्होंने अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है। इसी सिलसिले में राज्यपाल गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात करने दिल्ली गये हुए हैं और अभी तक वापस नहीं लौटे हैं। यानी कि अभी तक झारखंड में ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। राज्यपाल का फैसला आने के बाद कुछ भी हो सकता है। पहला, हेमंत की विधानसभा की सदस्यता रद्द हो सकती है, दूसरा, सदस्यता रद्द होने के साथ चुनाव से डिबार किये जा सकते हैं, तीसरा राज्यपाल धारा 356 का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा करें। बहुमत साबित करने से हेमंत सोरेन को यह लाभ होगा कि वह जनता के बीच जाकर कह सकते हैं कि लोकतांत्रिक बहुमत वाली सरकार को बीजेपी अस्थिर करने का प्रयास कर रही है। यदि उन्हें इस्तीफा देकर फिर चुनाव में जाना पड़े तो वह अपने वोटर के बीच मजबूती से जा सकते हैं। धारा 356 की परिस्थिति में भी वह अपने वोटरों को अपनी ओर लुभा पाने में कामयाब हो सकते हैं।

प्रतिकूल निर्णय आने पर फिर से सिद्ध करना होगा बहुमत!

ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में यदि हेमंत सोरेन के खिलाफ प्रतिकूल निर्णय आता है तो यूपीए सरकार को फिर से सदन  में बहुमत हासिल करना होगा। यानी सोमवार के विश्वास मत का फिर कोई औचित्य नहीं रहेगा। ऐसा कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है।

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