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Jharkhand Political Crisis: झारखंड में “कल्पना” की उड़ान, जानिए राह में हैं कितने रोड़े

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Jharkhand Political Crisis:झारखंड में सियासी पारा चढ़ा हुआ है। राज्यपाल रमेश बैस ने सीएम हेमंत सोरेन (Hemant Soren) को विधायकी से आयोग्य करने संबंधित अपना आदेश शनिवार को निर्वाचन आयोग के पास नहीं भेजा है। हालांकि, उम्मीद जताई जा रही है कि यह आदेश 29 अगस्त तक आयोग के पास भेज दिया जाएगा। झारखंड में सियासी हलचल के बीच हर कोई यह जानना चाहता है कि अगर सीएम की सदस्यता रद्द होती है तो अगला मुख्यमंत्री कौन होगा। वैसे मुख्यमंत्री के लिए सीएम की पत्नी कल्पना सोरेन के नाम की चर्चा जोरों पर है। हालांकि झामुमो के भीतर वैसे तो तीन नामों की खूब चर्चा हो रही है, लेकिन एक नाम मुख्यमंत्री के रेस में जो सबसे आगे है वो है हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन का। इनके अलावा जिन दो नामों की चर्चा हो रही है उनमें शिबू सोरेन औरचंपई सोरेन के भी नाम शामिल हैं।

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 कल्पना सोरेन को सीएम बनाने पर आएंगी ये अड़चनें 

कल्पना सोरेन को मुख्यमंत्री बनाने के लिए हेमंत सोरेन के सामने कई समस्याएँ आएंगी। यदि वह मुख्यमंत्री बनती हैं  तो उन्हें विधानसभा सदस्यता के लिए किसी आदिवासी आरक्षित सीट से चुनाव लड़ना होगा। लेकिन वो ऐसा नहीं कर सकती, क्योंकि इसके लिए झारखंड का निवासी होना जरूरी है। जबकि कल्पना सोरेन ओडिशा के मयूरभंज की रहने वाली हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें किसी अनारक्षित सीट से चुनाव लड़ना होगा। अनारक्षित सीट से यदि वह चुनाव लड़ती हैं तो भाजपा सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आ सकती है, क्योंकि अनाराक्षित सीटों में भाजपा की अच्छी पकड़ है और मतदाताओं को अपने पक्ष में मोड़ना आसान काम नहीं है। साथ ही किसी दूसरे विधायक को भी सीट छोड़नी होगी, जो की मुश्किल लग रहा है।

इन नामों पर भी हो रहा विचार 

अगर शिबू सोरेन मुख्यमंत्री बनते हैं तो उन्हें राज्यसभा की सदस्यता छोड़नी होगी और उन्हें फिर से विधायक का चुनाव लड़ना पड़ेगा। जोकि उनकी उम्र और स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं होगा। वहीँ भाभी सीता सोरेन पूर्व में ही अपनी ही सरकार के कामकाज पर सवाल उठाती रही हैं।

29 को बसंत सोरेन की विधायकी पर भी आना है फैसला

वहीँ 29 सितंबर को CM हेमंत सोरेन के छोटे भाई बसंत सोरेन की विधायकी को लेकर फैसला आना है। इसकी सुनवाई लगभग पूरी कर ली गई है। अब माना जा रहा है कि दोनों भाइयों की सदस्यता पर फैसला एक साथ सुनाया जा सकता है।

पार्टी के अंदर बढ़ सकता है विवाद 

वैसे तो झारखंड मुक्ति मोर्चा पर सोरेन परिवार का ही वर्चस्व है। पार्टी के अंदर शिबू सोरेन का कद जितन ऊँचा है उतना हेमंत सोरेन का नहीं। ऐसे में अगर हेमंत सोरेन अपनी पत्नी कल्पना सोरेन की सीएम बनाते हैं, तो पार्टी के अंदर सालों से काम करने वाले बड़े बड़े नेताओं के बीच शायद ही सहमति बने। क्योंकि लोबिन हेंब्रम, चंपई सोरेन, स्टीफन मरांडी जैसे बुजुर्ग नेता सालों से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं।

विधायकों के पलटने का डर 

सूत्रों की मानें तो CM हेमंत सोरेन और कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व को इस बात की आशंका है कि उनके कुछ विधायक उन्हें धोखा दे सकते हैं। क्योंकि CM बनने के पद फ्लोर टेस्ट तो देना ही होगा, ऐसे में उन्हें डर है कि कहीं बीजेपी उनके विधायकों को अपने पक्ष में ना ले आएं।

हेमंत सोरेन की सरकार को 51 विधायकों का समर्थन

राज्य में गठबंधन वाली सरकार के पास बहुमत के पर्याप्त आकड़ें हैं। फिलहाल हेमंत सोरेन की सरकार को 51 विधायकों का समर्थन हासिल है। अगर सारे विधायकों की एकजुटता बनी रहती है तो, विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, हेमंत सोरेन सरकार को कोई खतरा नहीं है। दरअसल साल 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में जेएमएम को 30, कांग्रेस को 16, आरजेडी को एक, भाकपा-माले और एनसीपी को एक-एक और निर्दलीय सरयू राय को मिलाकर उनके गठबंधन को 51 सीटें मिली थी। ऐसे में अगर बीजेपी यहां सरकार बनाने की कोशिश करती है तो जानकारों के अनुसार उसे कांग्रेस -जेएमएम के बागी रुख अख्तियार किए विधायकों को अपने पक्ष में करना होगा।

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गठबंधन सरकार के पास 51 विधायक

2019 के चुनाव में बीजेपी 24 विधायकों पर सिमट गयी थी। कुछ ही दिनों बाद जेवीएम प्रमुख बाबूलाल मरांडी ने अपनी पार्टी का बीजेपी में विलय कर दिया, जबकि जेवीएम के दो अन्य विधायक प्रदीप यादव और बंधु तिर्की कांग्रेस में शामिल हो गए थे। बंधु तिर्की की विधानसभा की सदस्यता जाने के बाद राज्य में कांग्रेस विधायकों की संख्या 17 रह गई थी. यानी बहुमत के लिये जरूरी 41 के मुकाबले गठबंधन वाली सरकार के पास 51 विधायकों का आंकड़ा साफ – साफ दिखता है।

नये नेता का चुनाव अहम मुद्दा होगा

इसके उलट बीजेपी के पास बाबूलाल मरांडी को जोड़ते हुए 26 विधायक हैं, जबकि उसकी सहयोगी आजसू के पास 2 विधायक हैं. सदन में 2 निर्दलीय विधायक और 1 एनसीपी के विधायक भी हैं. इन सभी को मिला दें तो आंकड़ा 31 तक पहुंचता है, लेकिन हेमंत सोरेन की सदस्यता जाने के साथ सबसे पहले गठबंधन के अंदर नये नेता का चुनाव एक अहम मुद्दा होगा. उस नेता के नाम पर सबकी सहमति भी सबसे बड़ी चुनौती होगी.

दलीय स्थिति 

सत्ताधारी दल

जेएमएम- 30 सीट
कांग्रेस- 18 सीट
राजद- 01 सीट
माले- 01 सीट
एनसीपी- 01 सीट
विपक्ष

बीजेपी- 26 सीट
आजसू पार्टी- 02 सीट
निर्दलीय- 02 सीट

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