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जिनोम सिक्वेंसिंग मशीन क्यों नहीं खरीदना चाहती झारखंड सरकार? हाईकोर्ट की लग चुकी है फटकार

genome sequencing machine

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

पूरे देश में 3,044 ओमीक्रॉन संक्रमण के मामले आ चुके हैं और इस संक्रमण से एक मौत भी हो चुकी है। महाराष्ट्र, दिल्ली, पश्चिम बंगाल ओमीक्रॉन वेरिएंट से भयाक्रांत हैं, लेकिन आपको हैरानी होगी कि झारखंड में ओमीक्रॉन का एक भी केस सामने नहीं आया है। यह खबर झारखंडवासियों के लिए खुशखबरी नहीं  है। यह सिर्फ राज्य सरकार और स्वास्थ्य महकमे की सुस्त चाल का एक जीता जागता उदाहरण है।

झारखंड में कोरोना की टेस्टिंग जोरों से चल रही है। इस टेस्टिंग के बाद अब हजारों की संख्या में कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट आ रही है। राज्य में जो भी कोरोना टेस्टिंग हो रही है वह आरटी-पीसीआर के जरिये हो रही है। आरटी-पीसीआर तो कोविड के डेल्टा वेरिएंट का पता लगा ले रहा है, लेकिन ओमीक्रॉन वेरिएंट का पता लगाना इसके बस की बात नहीं, इसके लिए जिनोम सिक्वेंसिंग मशीन की जरूरत है। लेकिन झारखंड सरकार की सुस्ती देखिये कि राज्यवासियों को अरबों रुपयों की ‘सौगात’ बांटने वाली सरकार के पास एक-डेढ़ करोड़ रुपये खर्च कर राज्य के लिए एक जिनोम सिक्वेंसिंग मशीन खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं। वह भी झारखंड हाईकोर्ट की फटकार लगने के बाद कि ‘जब राज्य में लाशों के ढेर लग जायेंगे तक सरकार जिनोम सिक्वेंसिंग मशीन खरीदेगी।’

कितनी है जीनोम मशीन की कीमत

कोरोना वायरस के नये वेरिएंट ओमीक्रॉन की पहचान जीनोम सिक्वेंसिंग मशीन से ही हो सकती है। जीनोम सिक्वेंसिंग तकनीक से होने वाले टेस्ट की पूरी प्रक्रिया है। जीनोम सिक्वेंसिंग करने वाली मशीन में एक बार में 96 सैंपल को प्रोसेस किया जा सकता है और इस पर करीब 12 से 15 लाख का खर्च आता है यानी एक सैंपल पर करीब 12 से 15 हजार का खर्च आता है। कभी-कभी किसी वजह से टेस्ट रिपीट भी करना पड़ता है। ऐसे में कॉस्ट और बढ़ जाता है। जीनोम सिक्वेंसिंग मशीन भी काफी महंगी है। जीनोम सिक्वेंसिंग करने वाली मशीन की कीमत डेढ़ करोड़ के आसपास है। इसके साथ ही कुछ अन्य मशीनें भी आती हैं, जिनका इस्तेमाल वायरस के वेरिएंट को पहचानने की प्रक्रिया में होता है। जैसे- डीएनए को निकालना, आरएनए से डीएनए में कन्वर्ट करना, जीनोम के फ्रेक्शन करके लाइब्रेरी प्रिपरेशन करना। सभी के लिये अलग-अलग मशीनें हैं। फिर सबको इकठ्ठा करके डीप फ्रीज में डालकर एक साथ रन किया जाता है। रिपोर्ट आने में करीब 10 दिन का समय लग जाता है।  इसके बाद डाटा एनालिसिस किया जाता है।

ओमीक्रॉन का पता लगाने के लिए झारखंड क्या कर रहा है?

जाहिर है झारखंड के पास जीमोम सिक्वेंसिंग मशीन नहीं है। तो झारखंड इसके लिए क्या कर रहा है? झारखंड में कोरोना वायरस का नया वैरिएंट है या नहीं, यह पता चलने में महीनों लग रहे हैं। रिम्स समेत राज्य के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों और लैब से जीनोम सिक्वेंसिंग के लिए सैंपल आईएलएस लैब भुवनेश्वर भेजे जा रहे हैं। लेकिन, वहां सैंपल पहुंचने के 15 से 20 दिनों बाद उसे प्रोसेस कर जांच की जा रही है। इससे रिपोर्ट आने में काफी समय लग रहा है।

झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री मंत्री को केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने दिया आश्वासन

कुछ दिनों पहले स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक में झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री बन्‍ना गुप्‍ता ने केंद्र सरकार से यह मांग की क‍ि झारखंड को जीनोम  स‍िक्‍वेंसिंग मशीन उपलब्‍ध कराई जाये। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया से कहा कि जब रिम्स को रिसर्च सेंटर का दर्जा मिल गया है तो यहां जीनोम स‍िक्‍वेंस‍िंग मशीन जरूर मिलनी चाहिए। इस पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने आश्वासन देते हुए कहा कि इस पर जल्द प्रक्रिया के तहत झारखंड को मशीन उपलब्ध कराई जाएगी।

परिस्थितियां चाहे जो भी हों, झारखंड को हर हाल में जीनोम सिक्वेंसिंग मशीन की तत्काल आवश्यकता है। देर होना राज्य के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। अगर स्थिति बेकाबू हुई तो पछताने के सिवाय कोई चारा नहीं रहेगा।

यह भी पढ़ें: कोरोना का कहर जारी : भारत में 12.5 फीसदी बढ़े COVID-19 केस, झारखंड, बिहार में तेजी से बढ़ रहे कोरोना के नए मामले

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