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Jharkhand Legislative Assembly foundation day 2021: दूसरी बार बिना नेता प्रतिपक्ष के मना झारखंड विधानसभा स्थापना दिवस

Jharkhand Legislative Assembly foundation day

न्यूज़ डेस्क/ समचार प्लस झारखंड- बिहार

Jharkhand Legislative Assembly foundation day 2021: झारखंड (Jharkhand) विधानसभा की 21वीं वर्षगांठ(Jharkhand Legislative Assembly foundation day) सोमवार को मनाई गई. मुख्य समारोह में बीजेपी के विधायक रामचंद्र चंद्रवंशी को राज्यपाल रमेश बैस ने उत्कृष्ट विधायक के सम्मान से सम्मानित किया. दूसरी बार विधानसभा का स्थापना दिवस नेता प्रतिपक्ष की अनुपस्थिति में मना. बीजेपी विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी को नेता प्रतिपक्ष का दर्जा अभी तक नहीं मिलने से समारोह में उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया. इसलिए एक बार फिर विधानसभा की वर्षगांठ बगैर नेता प्रतिपक्ष की अनुपस्थिति में ही मनाई गई .

क्या है मामला

2015 के विधानसभा चुनाव के बाद 81 विधानसभा सीटों में बीजेपी 37, जेएमएम 19, जेवीएम 8, कांग्रेस 6, आजसू 5, बीएसपी 1, माले 1, झारखंड पार्टी 1, जय भारत समानता पार्टी 1, नवजवान संघर्ष मोर्चा 1, मार्क्सिस्ट को-ऑर्डिनेशन को 1 सीट मिली थी. बहुमत के लिए 41 सीटों की जरूरत थी. बाबूलाल मरांडी के झारखंड विकास मोर्चा के छह विधायकों ने एक साथ बीजेपी का दामन थाम लिया. यहां से चला दल– बदल कानून के तहत मामला. तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष दिनेश उरांव को लेकर कोर्ट में मामला चलता रहा. चार साल के बाद दल-बदल को मंजूरी दी गई.

दसवीं अनुसूची के दल बदल कानून के प्रावधानों के तहत चल रहा मामला 

बाबूलाल मरांडी, प्रदीप यादव और बंधु तिर्की JVM के सिंबल पर विधानसभा चुनाव जीते थे. बाद में बाबूलाल मरांडी जहां BJP में शामिल हो गए थे. वहीं बंधु तिर्की और प्रदीप यादव कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. दोनों पक्ष JVM के विलय के अपने-अपने दावे करते रहें हैं . इसी मामले पर विधानसभा अध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो  दसवीं अनुसूची के दल बदल कानून के प्रावधानों के तहत सुओ मोटो संज्ञान लेते हुए मामले की सुनवाई कर रहे हैं. जबकि BJP इसके खिलाफ HC चली गई.

अभी तक नहीं सुलझा मामला 

गत विधानसभा चुनाव के बाद बदली राजनीतिक परिस्थिति में बाबूलाल मरांडी ने पहले अपने दो विधायकों को पार्टी से निकाला फिर झारखंड विकास मोर्चा को भंग किया और खुद बीजेपी में शामिल हो गए. उन्होंने उस वक़्त कहा था कि बीजेपी अगर पार्टी कार्यालय में झाड़ू लगाने को भी कहेगी, तो वह करेंगे. इसके बाद उनके दो विधायक प्रदीप यादव और बंधु तिर्की का कहना था कि इस कानून के तहत बाबूलाल की विधायिकी जाएगी या फिर उनके दो विधायकों की या फिर दोनों को ही मंजूरी मिल जाएगी. पिछली बार जहां स्पीकर बीजेपी के थे, तो इस बार जेएमएम के. हालांकि बीजेपी सरकार के कार्यकाल में भी यह मामला लंबित ही रहा.

नहीं मिल पायी है नेता प्रतिपक्ष के तौर पर स्वीकार्यता 

बाबूलाल मरांडी नेता प्रतिपक्षा का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर विधानसभा में सत्र के दौरान खूब हंगामा होता है. पर उन्हें अब तक नेता प्रतिपक्ष के तौर पर स्वीकार्यता नहीं मिल पायी है. इतना ही नहीं बीजेपी के नेता भी खुलकर उनके प्रनिधित्व को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. इसलिए यह लग रहा है राज्य में आदिवासी समाज का एक बड़ा नेता अपने अस्तित्व के लिए लड़ाई लड़ रहा है.

2006 में पार्टी से मनमुटाव के बाद झाविमो का किया था गठन 

कभी आरएसएस के निष्‍ठावान स्‍वयंसेवक और समर्पित भाजपाई रहे मरांडी ने 2006 में पार्टी से मनमुटाव के बाद झारखंड विकास मोर्चा (झाविमो) नाम से अपनी एक नई पार्टी बना ली थी.  जिससे वे लगातार दो बार कोडरमा लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर सांसद बने.

मरांडी से जुड़ी कुछ दिलचस्‍प बातें

बाबूलाल मरांडी ने शिक्षक की नौकरी से त्यागपत्र देकर झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त  किया था. बाबूलाल मरांडी का जन्‍म झारखंड के गिरीडीह के टिसरी ब्‍लॉक के अंतर्गत आने वाले कोडिया बैंक गांव में 11 जनवरी 1958 को हुआ. इन्‍होंने अपनी स्‍कूली शिक्षा गांव से प्राप्‍त करने के बाद गिरीडीह कॉलेज में दाखिला ले लिया. यहां से इन्‍होंने इंटरमीडिएट तथा स्‍नातक की पढ़ाई पूरी की. कॉलेज में पढ़ाई के दौरान मरांडी आरएसएस से जुड़ गए. मरांडी ने आरएसएस से पूरी तरह जुड़ने से पहले गांव के स्‍कूल में कुछ सालों तक कार्य किया. इसके बाद वे संघ परिवार से जुड़ गए। उन्‍हें झारखंड क्षेत्र के विश्‍व हिन्‍दू परिषद का संगठन सचिव बनाया गया.

नक्‍सली हमले में गई बेटे की जान

1989 में इनकी शादी शांतिदेवी से हुई. इनका बेटा अनूप मरांडी 2007 के झारखंड के गिरीडीह क्षेत्र में हुए नक्‍सली हमले में मारा गया था.

शिबू सोरेन से हारे पहला चुनाव

1991 में मरांडी ने भाजपा के टिकट पर दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, जिसमें उन्‍हें हार का मुंह देखना पड़ा था. 1996 में वे फिर शिबू सोरेन से हार गए. इसके बाद भाजपा ने 1998 में विधानसभा चुनाव के दौरान प्रदेश अध्‍यक्ष बना दिया. पार्टी ने इनके नेतृत्‍व में झारखंड क्षेत्र की 14 लोकसभा सीटों में से 12 पर कब्‍जा कर लिया.

केन्‍द्र की एनडीए सरकार में बने मंत्री

1998 के चुनाव में उन्होंने शिबू सोरेन को संथाल से हराकर चुनाव जीता था जिसके बाद एनडीए की सरकार में बिहार के 4 सांसदों को कैबिनेट में जगह दी गई जिसमें से एक बाबूलाल मरांडी भी थे.

राज्‍य के पहले मुख्‍यमंत्री बने

बिहार से 2000 में अलग होकर झारखंड राज्‍य बनने के बाद एनडीए के नेतृत्‍व में बाबूलाल मरांडी ने राज्‍य की पहली सरकार बनाई हालांकि बाद में जदयू के हस्‍तक्षेप के चलते उन्‍हें अर्जुन मुंडा को सत्‍ता सौंपनी पड़ी थी.

उपचुनाव में चुनाव गए निर्विरोध

इसके बाद उन्‍होंने 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्‍होंने कोडरमा सीट से चुनाव जीता जबकि पार्टी के अन्‍य उम्‍मीदवारों को हार का मुंह देखना पड़ा. मरांडी ने कोडरमा सीट सहित 2006 में भाजपा की सदस्‍यता से भी इस्तीफा देकर अपनी नई पार्टी झारखंड विकास मोर्चा बना ली, जिसमें भाजपा के 5 विधायक पार्टी छोड़ शामिल हो गए. इसके बाद कोडरमा उपचुनाव में वे निर्विरोध चुन लिए गए. कोडरमा सीट से 2009 का लोकसभा चुनाव जीत कर वह एक बार फिर संसद में पहुंच गए.

रिश्वत के कारण छोड़ी नौकरी

बाबूलाल मरांडी जब शिक्षक थे तब एक बार उन्‍हें शिक्षा विभाग में काम पड़ गया. जब वह काम कराने विभाग के कार्यालय में गए तो वहां के बड़े बाबू ने काम के एवज में उनसे रिश्वत देने की मांग की. इस बात को लेकर दोनों में काफी कहासुनी हुई और इसके बाद गुस्‍साए बाबूलाल ने शिक्षक की नौकरी से इस्‍तीफा दे दिया.

कार्यकाल पूरा न होने का है मलाल, अपने को मानते हैं अभागा  

बाबूलाल मरांडी को इस बात का मलाल अभी भी है कि उन्हें बतौर मुख्यमंत्री, विधायक, सांसद  कार्यकाल पूरा करने का मौका नहीं मिला. यहां तक की  उनकी  पार्टी भी नहीं टिक पाई और अन्ततः भाजपा में उसका विलय हो गया. इस कारण वह अपने को अभागा मानने से भी नहीं हिचकिचाते.

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