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Jharkhand: गरीबी की मार…मानव तस्कर हैं ‘तैयार’! आखिर कब मिटेगा मानव तस्करी का कलंक?

Jharkhand HumanTrafficking

Jharkhand HumanTrafficking: झारखंड (Jharkhand) में मानव तस्करी थमने का नाम नहीं ले रही है। आज ही यानी शुक्रवार को राज्य के पश्चिम सिंहभूम जिले की 10 बच्चियों, एक महिला एवं सिमडेगा जिले के एक बच्चे को दिल्ली से मुक्त कराया गया है। मानव तस्करी की शिकार हुईं ये बच्चियां पश्चिमी सिंहभूम जिले की हैं। इन बच्चियों में डेढ़ वर्ष की बच्ची भी शामिल है। मुक्त कराए गए बच्चों में एक बच्ची मात्र 8 साल की है। इस बच्ची के पिता की मृत्यु हो गई थी। उसके चार भाई-बहनों में दो भाई-बहनों का कुछ भी पता नहीं है। एक भाई अपने चाचा के साथ रहता है। इस बच्ची को दिल्ली में लगभग 1 साल पहले मानव तस्कर द्वारा बेच दिया गया था। मुक्त करायी गयी दो लड़कियों को मानव तस्करों के चंगुल से दूसरी बार छुड़ाया गया है। मानव तस्करी की ऐसी ही दिल को झकझोर देने वाली तस्वीरें  आए दिन सामने आती रहती हैं। लेकिन यहाँ सवाल उठता है कि आखिर क्यों यहाँ के भोले भाले आदिवासी मानव तस्करों के सॉफ्ट टार्गेट बनते आ रहे हैं। आदिवासी नामधारी राजनीतिक दल और आदिवासियों के हितों की बात करने वाले वर्षों से चलती आ रही इस शर्मनाक प्रथा पर रोक लगाने को लेकर दृढ इच्छा शक्ति क्यों नहीं दिखाते हैं।

कई तरह के कराए जाते हैं काम

झारखंड में मानव तस्करी (Human trafficking in Jharkhand) एक बड़ी समस्या है। झारखंड से ज्यादातर तस्करी आदिवासियों की घरेलू कामों के लिए महानगरों के लिए की जाती है, जहां इनसे कई तरह के काम करवाए जाते हैं। दिल्ली जैसे शहरों की एजेंसियां रोजगार दिलाने के नाम पर मासूम बच्चियों की तस्करी में शामिल रहते हैं। इन लड़कियों से घरों में काम करने के अलावा इनके साथ यौन शोषण भी किया जाता है। अक्सर मानव तस्कर गांव के भोले-भाले ग्रामीण आदिवासियों को नौकरी दिलाने का लालच देकर बड़े शहरों में ले जाते हैं और उन्हें बेच देते हैं।

गरीबी और अशिक्षा है मुख्य कारण

झारखण्ड में देखा जाए तो अशिक्षा ही मानव तस्करी का मुख्य कारण है। गरीबी के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के लोग दिहाड़ी मजदूरी व रोजगार के लिए पलायन कर दलालों की चंगुल में फंसकर मानव तस्कर का शिकार हो जाते हैं। किशोरी व महिलाएं यौन शोषण तथा मानसिक शोषण की शिकार हो जाती हैं। इसके अलावा राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव भी एक बहुत बड़ा कारण हैं जो राज्य में मानव तस्करी के धंधे को फलने फूलने से नहीं रोक पा रहा है। यहाँ अक्सर देखा गया है कि आदिवासी हितों की बात करने वाली पार्टियाँ मजदूरों के पलायन और भोले भाले आदिवासियों की तस्करी को सिर्फ मुद्दा बनाते हैं।

कोरोना संक्रमण के दौर में गायब हुए 148 बच्चे 

2019 में राज्य के अलग अलग हिस्सों से गायब हुए 148 बच्चों का सुराग नहीं मिल पाया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बीते साल 201 लड़के व 176 लड़कियों के गायब होने या अपहरण का मामला दर्ज कराया गया था। इस तरह कुल 377 बच्चों के गायब होने की शिकायत दर्ज की गई थी।

हेमंत सरकार मामले पर है सख्त 

झारखंड के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभालने के बाद से हेमंत सरकार का मानव तस्करी पर नकेल कसने को लेकर सख्त रूख रहा है। झारखंड से मानव तस्करी के कलंक को मिटाना को उन्होंने सरकार की प्राथमिकता पर रखा है। इस दिशा में उन्होंने कई सराहनीय प्रयास भी किये हैं। कई प्रवासियों की उन्होंने शोषकों के चंगुल से सुरक्षित वापसी करवायी है।

ये जिले हैं तस्करी से प्रभावित

तस्करी से प्रभावित जिलों में गुमला, गढ़वा, साहिबगंज, दुमका, पाकुड़, पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा), रांची, पलामू, हजारीबाग, धनबाद, बोकारो, गिरडीह, कोडरमा और लोहरदगा शामिल हैं। झारखंड के आदिवासी इलाकों से हजारों लड़कियां जिनकी तस्करी की गई है।

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