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झारखंड को फिल्म उद्योग से ‘प्रेम’ नहीं, तब क्या करेगा बेचारा ‘रांची रोमियो’, राज्य में रेंग भी नहीं रहा फिल्म उद्योग

Jharkhand Film Industry

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

शुक्रवार को ‘मिलन फिल्म क्रिएशन’ के बैनर तले रांची में बनी नागपुरी फिल्म “रांची रोमियो” पॉपकॉर्न सिनेमा गैलेक्सी में रिलीज हुई। फिल्म में झारखंड के कलाकारों ने मेहनत की है। फिल्म को झारखंड के ही लोकेशन में शूट किया गया है। फिल्म के निर्माता और लेखक दीपक लोहार हैं| दीपक लोहार ने फिल्म में अभिनय भी किया है। फिल्म मेकर्स ने फिल्म को बेहतर बनाने का जो भी प्रयास हो सकता है, किया है। लेकिन फिल्म का बन जाना और फिल्म का रिलीज हो जाना सबकुछ नहीं है। झारखंड में फिल्म बनाने का ऐसा प्रयास एकल प्रयास ही कहा जा सकता है। सरकार का योगदान तो यहां शून्य है। वैसे, अगर झारखंड फिल्म उद्योग की बात करें तो झारखंड यहां ‘शून्य’ पर ही खड़ा नजर आयेगा, लेकिन क्यों, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। ऐसा तब है जब झारखंड की अपनी फिल्म नीति भी है।

झारखंड की अपनी फिल्म नीति, नतीजे का अंतहीन इंतजार

याद होगा, 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने झारखंड के लिए फिल्म नीति बनायी थी। झारखंड में फिल्म उद्योग को बढ़ावा देने और झारखंड राज्य पर आधारित बनने वाली फिल्मों के चयन के लिए तकनीकी सलाहकार समिति का गठन भी किया गया था। पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित बॉलीवुड  महान फिल्म हस्ती अनुपम खेर को इसका अध्यक्ष मनोनीत किया गया था। बस, उसके बाद सारा कुछ टांय-टांय फिस्स। अनुपम खेर और विद्या बालन में कुछ समय झारखंड में कुछ देर रुचि दिखाई, करोड़ों बटोरे, फिर मुड़कर नहीं देखा।

हमने अपने पड़ोसी राज्यों से भी कुछ नहीं सीखा

लोग अपने आस-पड़ोस से भी बहुत कुछ सीखते हैं। हमारे आस-पड़ोस में फिल्मी उपलब्धियों का जखीरा है। सिर्फ देख भी लें तब भी कुछ न कुछ हासिल हो जाये। मगर इतनी भी फुरसत हमारे राज्य के कर्णधारों के पास कहां। पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल फिल्म उद्योग के शुरुआत से ही अपनी पहचान बनाये हुए है। बंगाली फिल्में, बंगाली कलाकार और बंगाली फिल्म मेकर्स ने फिल्म जगत पर राज किया है, इसको नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। यहां कई नाम गिनाये जा सकते हैं, लेकिन विषय यह नहीं। झारखंड का एक और पड़ोसी राज्य है ओडिशा। ओड़िया फिल्में भी राष्ट्रीय पटल पर अपनी पहचान रखती हैं और पहचान छोड़ती हैं। मध्य प्रदेश का भी फिल्म उद्योग में थोड़ा-बहुत दखल है। झारखंड के साथ अस्तित्व में आया छत्तीसगढ़ भी फिल्म उद्योग में आगे बढ़ चुका है। छत्तीसगढ़ ने भी अपने राज्य के लिए न सिर्फ फिल्म नीति बनायी है, बल्कि उस पर अमल भी कर रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने फिल्म उद्योग के विकास के लिए 115 एकड़ जमीन भी दे रखी है।

उत्तर प्रदेश तो आने वाले दिनों में कमाल करने जा रहा

अब थोड़ा बात कर लें उत्तर प्रदेश की। उत्तर प्रदेश भी झारखंड से ज्यादा दूर नहीं है। बिहार और उत्तर प्रदेश वर्षों से भोजपुरी फिल्म निर्माण के लिए जाने जाते रहे हैं। इन क्षेत्रों ने भोजपुरी की कई चर्चित फिल्में देश को दी हैं। अगर आपके जेहन में बॉलिवुड की पुरानी फिल्में होंगी तो आपको याद होगा कि कई हिन्दी फिल्मों के डायलॉग और गानों में भोजपुरी शब्दों का बहुतायत प्रयोग हुआ है। जैसे – ‘नदिया किनारे हेराई आयी कंगना’, ‘नैन लड़ जइहैं तो मनवा मां कटक होइबे करी’। ये तो उदाहरण मात्र हैं, हिन्दी फिल्मों में ऐसे हजारों उदाहरण मिल जायेंगे। ये उदाहरण बिहार और यूपी के उस दखल को दर्शाता है जिसके बल पर हिन्दी बेल्ट में राज्य करने का प्रयास किया गया था।

खैर, अब तो उत्तर प्रदेश फिल्म उद्योग में एक नया आयाम गढ़ने जा रहा है। उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर में देश की सबसे बड़ी फिल्म नगरी बनने वाली है। इसके बन जाने के बाद सिर्फ हिन्दी ही नहीं, बल्कि देश के दूसरे राज्यों की फिल्में भी यहां बनेंगी। यूपी में फिल्म इंडस्ट्री स्थापना में अभी समय है, लेकिन यूपी सरकार ने फिल्म उद्योग की बेहतरी के लिए जो प्रयास किये हैं, उसका नतीजा है कि यूपी के कई शहरों, दर्शनीय स्थलों, पर्यटन स्थलों पर कई फिल्मों की शूटिंग चल रही है। भले ही मुम्बई को Mother Land of Film कहा जाता है, हो सकता है, आने वाले समय में शायद मुम्बई का यह रुतबा उससे छिन जाये। ऐसा होगा या नहीं, यह तो वक्त बतायेगा, लेकिन यूपी में फिल्म उद्योग को बढ़ावा देने के लिए जो हो रहा है, वह सकारात्मक सोच का ही परिणाम है।

आखिर उदासीन क्यों हैं झारखंड की सरकार और अधिकारी?

इसमें कोई दो राय नहीं है कि झारखंड के कई क्षेत्र आज भी विकास की बाट जोह रहे हैं, उनमें सरकार की और राज्य के अधिकारियों की उदासीनता बड़ी वजह है। अधिकांशतः देखा गया है किसी प्रोजेक्ट में राज्य के अधिकारियों को जब तक कोई ‘लाभ’ नजर नहीं आता, वहां वे ‘हाथ नहीं डालते’। मोमेन्टम झारखंड जैसा आयोजन हो, विदेश में रैली करनी हो, या दूसरे बड़े आयोजन, लाभ देखने के बाद ही यहां के अधिकारियों के हाथ-पांव में गति आती है। याद होगा जब झारखंड का निर्माण हुआ था तब रांची शहर के विकास की योजनाएं तैयार करने से पहले यहां के अधिकारियों ने सिंगापुर का दौरा किया था। ताकि रांची को सिंगापुर जैसा डेवलप किया जा सके। आज राज्य गठन के 21 साल पूरे हो चुके हैं, सिंगापुर तो छोड़िये, रांची को अपने पड़ोसी राज्य बिहार की राजधानी पटना जैसा भी नहीं बनाया जा सका है। शायद यहां की सरकारों और यहां के अधिकारियों को झारखंड से प्रेम ही नहीं है। प्रेम होता तो विकास की राह अपने आप बन जाती। हाल में रांची में हुए अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के दौरान झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस ने शायद इसी उदासीनता के कारण कहा होगा- अगर आप अपने राज्य से सच्चा प्रेम करते हैं तभी आप राज्य के सच्चे अधिकारी कहे जायेंगे, क्योंकि आपकी सच्चाई ही राज्य विकास करेगा। यह बात हमारे राज्य की सरकारों और अधिकारियों को समझ क्यों नहीं आयी कि राज्य में फिल्म उद्योग के विकसित होने से रोजगार ही नहीं व्यापार के अवसर भी बनेंगे। पर्यटन का तो स्वतः ही विकास हो जायेगा। मगर इसके लिए सही नीति और सच्ची भावना के साथ काम करना होगा।

आज झारखंड का फिल्म उद्योग जो भी बना या बचा है, वह यहां के कला को समर्पित लोगों की वजह से है। ये कला को समर्पित व्यक्ति हर साल फिल्में बनाने के लिए कुछ न कुछ करते रहते हैं। फिल्मों से इन्हें कोई लाभ नहीं होता, फिर भी इनका समर्पण इन्हें फिल्म निर्माण से जोड़े हुए है। बात ‘रांची रोमियो’ से शुरू हुई थी, तो खत्म भी इसी फिल्म के जिक्र से करते हैं। ‘रांची रोमियो’ दीपक लोहार की फिल्म है। इन्होंने फिल्म का लेखन और निर्माण तो किया ही है, फिल्म में अभिनय भी किया है। फिल्म का जो भी बजट था, फिल्म बनाने में खर्च हो गया। स्थिति यह हो गयी कि फिल्म के प्रोमोशन के लिए पैसे तक नहीं बचे। फिल्म के निर्माता और कलाकारों ने ही जगह-जगह फिल्म के पोस्टर लगाकर खुद ही प्रोमोशन किया। फिल्म को पर्दे पर दिखाने के लिए पॉपकॉर्न सिनेमा गैलेक्सी हॉल का भी धन्यवाद दिया जाना चाहिए। जिसने झारखंड के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुए फिल्म प्रदर्शित करने की अनुमति दे दी। उन्होंने झारखंड की सरकार और अधिकारियों की तरह अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ा।

‘रांची रोमियो’ की टीम का एक परिचय

  • गायक: पवन रॉय, विष्णु नायक,मोनिका मुंडू, ज्योति साहू ,विवेक नायक, जीतू नायक और जितेंद्र मिश्रा।
  • म्यूजिक: सिद्धार्थ (दुबई रॉय), पिंटू पाल,बैक ग्राउंड म्यूजिक: धीरज डेनियल,
  • कोरियोग्राफर: अनमोल खलखो और राकेश नायक।
  • कलाकार: दीपक लोहार, प्रभा सरकार ,काजल मुंडा, करमा उरांव, पायल सहाय, सिकंदर ठाकुर, शिव कुमार ठाकुर, धर्मेंद्र ओझा, कमलेश गोप, राजू मीणा, निक्की गुप्ता, देव पूजन ठाकुर, दीपक चौधरी, धर्मेंद्र गिरी, चांदनी प्रिया बड़ाईक, लखन दास, हाबिल, शक्ति कुमार, सुंदर टूटी, ओमी, फरीद, अरमान अंसारी, नितेश कच्छप,आशीष मुंडा, ललिता देवी।
  • असिस्टेंट डायरेक्टर: देव पूजन ठाकुर अमित वर्मा सिकंदर ठाकुर शिव कुमार ठाकुर।
  • कॉस्टयूम: मिलन कुमारी।
  • मेकअप: अलीशा सुमित दास।
  • आर्ट डायरेक्टर: शिवनंदन लोहार।
  • एक्शन: पंकज गुरुंग।
  • फिल्म प्रोड्यूसर: दीपक लोहार।
  • को प्रोड्यूसर: शिवनंदन लोहार, सुरेश लोहार।
  • लाइन प्रोड्यूसर: पलाश प्रोटीन मेक।
  • कैमरामैन : शिव कुमार ठाकुर, सोनू इंदवार ,पुरुषोत्तम कुमार, हैरी, विकास आर्यन।
  • एडिटिंग : सुदीप भेंगरा।
  • ट्रेलर पोस्टर बीजीएम: धीरज डेनियल।
  • टाइटल इन: विपिन अनीश।
  • स्पेशल थैंक्स: हबिल, करमा उरांव।
  • प्रोडक्शन: मिलन फिल्म क्रिएशन।
यह है वह झारखंड की फिल्म नीति-2015 जो अब तक लापता है

चलते-चलते झारखंड की फिल्म नीति पर भी एक नजर दौड़ा लीजिये। जो है भी और नहीं भी है।

  1. झारखण्ड फिल्म विकास निगम का गठन:-
  2. फिल्म सिटी का निर्माण:-

– फिल्म सिटी हेतु निवेश को प्रोत्साहन

– संभाव्यताओं का अध्ययन एवं मूल्यांकन

– औद्योगिक दरों पर भूमि की उपलब्धता

  1. फिल्म की अधिसंरचना का निर्माण:-

– ऋण की उपलब्धता

– अनुदान की योजना

  1. छविगृहों का उन्नयन:-

– छविगृहों के लिए उच्च मानकों का निर्धारण

  1. मनोरंजन कर में छूट:-

– उदारीकरण

– समय-समय पर दरों की समीक्षा

  1. मल्टीप्लेक्सेज को प्रोत्साहन:-

– प्रथम वर्ष    -100%

– द्वितीय एवं तृतीय वर्ष – 75%

– चतुर्थ एवं पंचम वर्ष  – 50%

  1. बंद छविगृहों को पुर्नजीवित करना:-

– छोटे सिनेमाघरों को प्रोत्साहन

  1. वत्र्तमान छविगृहों का आधुनिकीकरण

– डिजिटल प्रोजेक्शन सिस्टम को बढ़ावा।

– सौर ऊर्जा संचालित छविगृहों को निवेश की धनराशि पर 50% अनुदान।

  1. छविगृह परिसर का अनुरक्षण

– सिनेमा मालिक मनोरंजन-कर को छोड़ प्रति टिकट 6.00 रुपये एवं 3.00 रुपये का उपयोग एसी एवं अन्य सुविधाओं के लिए कर सकेंगे।

  1. भूमि

– प्रमुख स्थलों पर नगर प्राधिकारों द्वारा सिनेमा-हॉल के लिए भूमि के आवंटन का प्रावधान

– 30% भूमि का उपयोग वाणिज्यिक कार्यों के लिए किया जा सकेगा।

  1. कैप्टिव पावर

– सिनेमाघरों/मल्टीप्लेक्सों में कैप्टिव पावर प्लांट जेनेरेटर की स्थापना को प्रोत्साहन।

– 3 वर्षों तक विद्युत ड्यूटी से छूट

  1. छविगृहों को उद्योग का दर्जा।
  2. फिल्म विकास निधि:-

– फिल्म-सिटी/फिल्म लैब की स्थापना के उपरांत सिनेमा निर्माण से संबंधित उपकरणों को किराए पर सुलभ कराए जाने का प्रावधान।

  1. शूटिंग-स्थलों के विकास का प्रावधान।
  2. झारखण्ड में फिल्म विकास निगम की शाखा खोलने हेतु भारत सरकार से अनुरोध।
  3. ‘राज्य फिल्म तथा टेलीविजन संस्थान‘ के रूप में संगीत-नाट्य अकादमी का विकास।
  4. राज्य के तकनीकी संस्थानों में सिनेमाई तकनीक के प्रशिक्षण की व्यवस्था।
  5. फिल्मों का वित्त-पोषण:-

– केन्द्र सरकार के द्वारा फिल्मों को उद्योग का दर्जा दिए जाने के उपरांत राज्य में तदनुरूप वित्त-पोषण।

  1. तत्काल “फिल्म विकास निधि“ द्वारा 75 प्रतिशत राज्य में निर्मित फिल्मों के वित्तपोषण का प्रावधान।
  2. फिल्म विकास निधि के लिए सिनेमा-टिकटों पर 2 प्रतिशत अधिभार का प्रावधान।
  3. व्यापार-कर से छूट
  4. मनोरंजन कर रियायत:-

– झारखण्ड में 50 प्रतिशत शूट हुई फिल्मों को 6 माह के लिए मनोरंजन कर में 50 प्रतिशत रियायत।

– झारखण्ड में 75 प्रतिशत शूट हुई फिल्मों को 6 माह के लिए मनोरंजन कर में 75 प्रतिशत रियायत के प्रावधान।

  1. क्षेत्रीय फिल्में:-

*अनुदान/प्रोत्साहन

  • पूर्ण रूप से राज्य की क्षेत्रीय भाषाओं में बनने वाली फिल्मों को 50 प्रतिशत एवं हिन्दी सहित अन्य भाषाओं की क्षेत्रीय फिल्मों को 25 प्रतिशत तक अनुदान।
  • दो तिहाई राज्य में शूट हुई फिल्मों को अधिकम 2.00 करोड़ आधे शूट झारखण्ड में होने पर 1.00 करोड़ रुपये अनुदान की व्यवस्था।
  • अनुदानित फिल्मकार के द्वारा दूसरी/तीसरी फिल्म बनाए जाने पर वृहत्तर अनुदान का प्रावधान।
  1. झारखण्ड के कलाकारों/लैब्स इत्यादि को फिल्म में शामिल किए जाने पर उनके पारिश्रमिक में/प्रोसेसिंग व्यय में अनुदान की व्यवस्था।
  2. राज्य की बोलियों/स्थानीय भाषाओं में फिल्म निर्माण हेतु अनुदान के लिए प्रति वर्ष 10.00 करोड़ रुपये की निधि का उपबंध।
  3. राज्य के पर्यटन स्थल को विशेष रूप से प्रसारित करने वाली फिल्मों को 50.00 लाख तक का अनुदान।
  4. राज्य स्तरीय फिल्म विकास परिषद् की स्थापना।
  5. झारखण्ड राज्य को पृथक वितरण क्षेत्र के रूप में स्थापित किए जाने के प्रयास।
  6. एकल खिड़की प्रणाली
  7. फिल्म निर्माताओं को आवश्यक सुरक्षा व्यवस्था निःशुल्क राज्य की ओर से/अतिरिक्त/विशिष्ट सुरक्षा हेतु निर्धारित दर पर भुगतान के प्रावधान।
  8. जनसाधारण में फिल्मों को लोकप्रिय बनाए जाने के प्रयास।
  • फिल्मोत्सव का आयोजन
  • पुरस्कारों का आयोजन-
  • फिल्म सोसाइटीज को समर्थ बनाने का प्रावधान।

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