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JHARKHAND: रांची नगर निगम के वर्षा-जल-संरक्षण पर ग्रहण, कम पैसों में कोई नहीं बनाना चाहता रिचार्ज पिट!

JHARKHAND: Eclipse on rain-water-conservation of Ranchi Municipal Corporation

रांची नगर निगम तीन बार जारी कर चुका है निविदा

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

जल-संकट झेल लेंगे, लेकिन अपने लिए पानी की बूंदों को सहेजने का प्रयास नहीं करेंगे। यह सोच झारखंड में साफ दिखती है। यही कारण है कि आज तक झारखंड जल-संग्रहण के उपाय में नाकाम ही रहा है। झारखंड में रेन वाटर हार्वेस्टिंग का कोई उपाय दिखता भी है तो वह सरकारी से ज्यादा व्यक्तिगत प्रयास के कारण दिखता है। जैसे नोवामुंडा का टाटा स्टील द्वारा तैयार किया गया रेन वाटर हार्वेटिंग, जिससे आस-पास के कई गांवों का वाटर रिचार्ज होता है।

वर्षा-जल-संरक्षण झारखंड की आवश्यकता

झारखंड में कुछ दिनों बाद मॉनसून की बारिश शुरू होने वाली है। लेकिन राज्य में जल-संग्रहण कैसे हो इसका सार्थक प्रयास नहीं किया जाता। बता दें, झारखंड की संरचना पठारी है। झारखंड जैसे पठारी संरचना वाले क्षेत्रों के लिए बारिश की बूंदें ही लाइफ लाइन हैं। पठारी क्षेत्रों की कटोरेनुमा संरचना में एकत्र बारिश का पानी ही सालभर काम आता है। पठारी क्षेत्रों की संरचना अगर थोड़ी विकट है तो यह वहां के लोगों के लिए बड़ा वरदान भी साबित हो सकती है। बस, थोड़ा सचेत हो जाने की जरूरत है। इसके लिए सरकार ही नहीं, लोगों को भी जागरूक होना होगा। जल-संरक्षण पर थोड़ा ध्यान-सा ध्यान देने से बढ़ती हुई आबादी के बाद भी जंल-संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है। पहाड़ों की ही तरह पठारों में भी बरसात का अधिकांश पानी बहकर नदियों के सहारे समुद्र में चला जाता है। बस, इसी बह जाने वाले पानी के एक हिस्से को ही संरक्षित करना है, वह भी अपने लिए। और इसका सबसे अच्छा उपाय है- वाटर हार्वेस्टिंग।

रेन हार्वेस्टिंग वह उपाय है जिससे भूगर्भ-जल को रिचार्ज किया जाता है। लेकिन झारखंड का दुर्भाग्य है कि संकट झेलने के बाद भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग की कारगर योजना नहीं बन पायी है। यहां के लोग भी सचेत नहीं हैं। नियम बनने के बाद भी इसकी अनदेखी हो रही है। झारखंड के कई शहरों में आज कंक्रीट के जंगल तो खड़े हो गये हैं, लेकिन नियमों की बाध्यता के बाद भी बड़ी-बड़ी इमारतों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था नहीं की गयी है। सरकारी योजनाएं भी धरी की धरी रह गयी हैं। ध्यान रहे, मॉनसून के बाद भी ग्राउंड वाटर लेवल तीन मीटर से ज्यादा नीचे रहता है। इतना ही नहीं लगातार 10 साल से औसतन 10 सेंटीमीटर से अधिक जल स्तर नीचे जा रहा है।

इस बार भी फेल होगा रांची नगर निगम

कुछ जिलों के ड्राई जोन घोषित किए जाने के बाद वहां के नगर निगम जागे हैं। रांची नगर निगम ने भी टेंडर निकाल कर थोड़ा प्रयास तो किया है, लेकिन बार-बार टेंडर निकालने के बाद भी रिचार्ज पिट बनाने के लिए कोई आगे नहीं आ  रहा है। रांची नगर निगम ने तीसरी बार टेंडर निकाला है, लेकिन अब देर हो चुकी है, क्योंकि अब तो मॉनसून ही सिर पर है। इसलिए ग्राउंड वाटर रिचार्ज करने का उपाय इस साल भी रांची में धरा का धरा रह जायेगा।

कहीं, निर्माण राशि का कम होना बड़ा कारण तो नहीं?

झारखंड सरकार ने रांची, गुमला, लोहरदगा और खूंटी में 63 रेन वाटर हार्वेस्टिंग रिचार्ज पिट बनाया जाना है। इसके लिए 55,45,163 रुपये की मंजूरी दी गयी है। ऐसा लगता है कि रिचार्ज पिट की निर्माण राशि कम होने के कारण कोई कंपनी काम करना नहीं चाह रही है। एक वाटर रिचार्ज पिट बनाने में खर्च 88018 रुपए अनुमानित है, जिसे शायद कम करके आंका गया है। सरकार के मास्टर प्लान में झारखंड के 28,748 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में ग्राउंड वाटर के स्तर को मेंटेन रखना है। शायद लाभ का प्रतिशत ज्यादा नहीं होने कारण भी निविदा देने में उदासीनता दिख रही है।

घरों में भी रेन वाटर हार्वेटिंग बनने से भी समस्या का समाधान

2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड के 24 जिला मुख्यालयों में मकानों की संख्या 15,25,412 थी। इसमें वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि हो रही है। 2021 तक 24 जिलों में मकानों की संख्या 22 लाख हो गयी होगी। अगर इनमें से 25 प्रतिशत मकान रेन वाटर हार्वेस्टिंग व्यवस्था अपना लें तब भी झारखंड में बड़ा काम हो जायेगा।

पूरे राज्य के लिए सरकार पर कितना आयेगा खर्च?

एक अनुमान के अनुसार, 300 वर्गमीटर के मकान पर रूफ टॉप वाटर हार्वेस्टिंग कराने पर 25 हजार रुपये जबकि 1000 वर्गमीटर मकान पर वाटर हार्वेस्टिंग कराने पर एक लाख रुपये खर्च आता है। ऐसे में राज्य को आर्टिफिशियल रिचार्ज की व्यवस्था कराने में 5,357.80 करोड़ रुपये का खर्च आयेगा। यह खर्च ग्रामीण इलाकों में 4,053.57 करोड़ व शहरी क्षेत्र में 1304.34 करोड़ रुपये खर्च होगा।

जिलों में आर्टिफिशियल रिचार्ज के लिए चिह्नित क्षेत्र

जिला                 क्षेत्र

  • बोकारो        1686.77
  • चतरा             545.82
  • देवघर           1922.16
  • धनबाद          1663.32
  • दुमका            1252. 34
  • पू सिंहभूम       1480.52
  • गढ़वा              441.66
  • गिरिडीह         2902.94
  • गोड्डा              1309.60
  • गुमला             3358.94
  • हजारीबाग      1843.79
  • जामताड़ा       1374.12
  • खूंटी              575.79
  • कोडरमा        757.75
  • लातेहार         593.79
  • लोहरदगा       299.30
  • पाकुड़            318.26
  • पलामू             431.17
  • रामगढ़           1039.00
  • रांची               1897.29
  • साहिबगंज       339.63
  • सरायकेला       869.82
  • सिमडेगा          181.73
  • प. सिंहभूम       1662.88

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