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Jharkhand : बिना साझा कार्यक्रम चल रही साझी सरकार, क्या हैं चुनौतियां

Jharkhand : बिना साझा कार्यक्रम चल रही साझी सरकार, क्या हैं चुनौतियां

न्यूज़ डेस्क / समाचार प्लस झारखंड -बिहार

Jharkhand : झारखंड (Jharkhand) विधानसभा चुनाव जीत कर हेमंत सोरेनने तीन दलों को मिलाकर सरकार का गठन किया. ऐसे में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में बनने वाली जेएमएम-कांग्रेस-आरजेडी गठबंधन सरकार कॉमन मिनिमम प्रोग्राम खाका खींच पांच साल का रोडमैप तैयार किया जाना था. झारखंड सरकार को चलाने के लिए 2019 में साझा न्यूनतम कार्यक्रम तैयार करने पर सहमति हुई थी,  जिसमें तीनों पार्टियों के घोषणा पत्र के किए गए वादों को तवज्जो देने की बात कही गई. कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते इस सरकार से चाहती है कि उसके विजन के राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य को भी समाहित किया जाए. वहीं, आरजेडी बिहार को ध्यान में रखकर अपने वादों को सरकार से पूरा कराना चाहती है, तो जेएमएम आदिवासियों को ध्यान में रखकर कार्य  करने की पक्षधर है.

 

सहयोगी दलों की हैं अपनी-अपनी प्राथमिकताएं

कांग्रेस-जेएमएम और आरजेडी की अपनी-अपनी प्राथमिकताएं हैं. छत्तीसगढ़ की तर्ज पर धान के लिए न्यूनतम सपोर्ट प्राइस 2500 रुपये प्रति क्विंटल करना, किसानों की दो लाख रुपये तक की कर्ज माफी, इसमें पिछड़े वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण और आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए सीएनटी -एसपीटी एक्ट में कोई भी बदलाव ना करने का जिक्र. हालांकि झारखंड में जेएमएम-कांग्रेस-आरजेडी ने मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन तीनों दलों ने अलग-अलग अपने चुनावी घोषणा पत्र जारी किया था. इसमें किसानों की कर्ज माफी से लेकर ओबीसी को आरक्षण देने और आदिवासी को लेकर काफी वादे किए गए थे.

गठबंधन सरकार के दो साल पूरे होने को हैं, सीएमपी की घोषणा नहीं हुई 

झारखंड में हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के दो साल पूरे होने को हैं. लेकिन कॉमन मिनिमम प्रोग्राम आज तक मूर्त रूप न ले सका. इसके पीछे की वजह कोरोना बताई जा रही है. हालांकि राज्य में तमाम गतिविधियां शुरु हो चुकी हैं पर सीएमपी पर अभी भी सहमति नहीं बनाई जा सकी है.कांग्रेस और राजद के नेता सीएमपी को लेकर बातें करते रहते हैं. पर आलाकमान के सामने खुलकर इस पर बात करने में कतराते हैं. हालांकि राजद इसकी दबी जुबान से मांग कर राजनीतिक लाभ की चटनी चाटने से पीछे हटना नहीं चाहता है. सरकार में अब तक ऐसी कोई तालमेल वाली बात कुछ नहीं दिख रही है.

कई बार आवाज उठा चुके हैं कांग्रेसी विधायक 

कॉमन मिनिमम प्रोग्राम को लेकर कांग्रेस के विधायकों दीपिका पांडेय, अंबा प्रसाद, पूर्णिमा नीरज सिंह व ममता देवी ने कई बार आवाज उठायी है. विधायक दल के नेता आलमगीर आलम, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे डॉ रामेश्वर उरांव के पास कई बार इस विषय को रखा. दिल्ली दरबार में भी इसकी चर्चा होती रही. लेकिन अब भी इस दिशा में प्रगति नहीं दिखती.

गठबंधन सरकार को अपने ही सहयोगी से मिल रही चुनौती

गठबंधन सरकार को अपने ही सहयोगी से चुनौती मिल रही है. कांग्रेस सरकार में शामिल सहयोगी पार्टी है. लेकिन सरकार बनने के थोड़े ही दिन बाद अधिकारियों के तबादले को लेकर मंत्रियों और विधायकों की ओर से दबाव बनने लगा. कांग्रेस के विधायकों पर मुकदमे को लेकर भी कांग्रेस विधायकों में असंतोष है. महिला विधायकों की नाराजगी ज्यादा है, लेकिन सोरेन अपनी राजनीतिक कुशलता से किसी तरह संतुलन साध रहे हैं. बोर्ड, निगम, आयोगों के रिक्त पदों पर अभी तक समायोजन नहीं हो सका है. बीस सूत्री समितियों में भी कार्यकर्ताओं को जगह नहीं मिल पाई है. न्यूनतम साझा कार्यक्रम तक तय नहीं हो सका है. कैबिनेट में भी एक सीट खाली है जिसे लेकर कांग्रेस का दबाव बढ़ रहा है.

विपक्ष भी कई मुद्दों पर है हमलावर 

विपक्ष भी कई मुद्दों पर हमलावर है. झारखंड में परीक्षाओं से हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत को बाहर किए जाने को पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास असंवैधानिक कहते हुए विरोध जाता चुके हैं. झारखंड में खाली पदों पर नियुक्ति से पहले नियोजन नीति को लेकर राजनीति गर्म है. प्रदेश की हेमंत सोरेन सरकार ने साल 2021 को रोजगार का वर्ष घोषित किया है. हालांकि रोजगार वर्ष के 6 माह बीतने के बावजूद ऐसा होता हुआ धरातल पर कहीं नहीं दिख रहा. वैसे सरकार के अंदरखाने परीक्षा संचालन नियामवाली को लेकर तैयारी जरूर चल रही है, लेकिन प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी इस मुद्दे पर सरकार पर निशाना साधती रही है और इस पर  हेमंत सरकार से अपनी नीति स्पष्ट करने की मांग करती रही है.

ये भी पढ़ें : Jharkhand: चार दिन में दूसरा ऐलान, झारखंड समेत 3 राज्यों में 23 से 25 नवंबर तक नक्सली बंद, पुलिस अलर्ट

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