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Birthday Special: देश को हॉकी का पहला स्वर्ण पदक दिलाने वाला झारखंड का हीरा मरङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा

Jaipal Singh Munda

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

जयपाल सिंह मुंडा का नाम आते ही उनका भारतीय हॉकी कप्तान का ही रूप सामने आता है। लेकिन जयपाल सिंह मुंडा की पहचान इतनी भर नहीं है। वह महान हॉकी कप्तान तो थे ही, राजनीति में भी उनकी अलग पहचान रही है। उनकी सबसे बड़ी पहचान आदिवासियों के हितैषी के रूप में है। उन्होंने अपना सारा जीवन आदिवासियों की दशा सुधारने में गुजारा है।

देश को ओलिंपिक का स्वर्ण पदक दिलाने वाले पहले कप्तान

कौन भूल सकता है 1928 का एम्सटर्डम (नीदरलैंड) ओलिंपिक। इसी ओलिंपिक में भारत ने पहली बार हॉकी ही नहीं बल्कि ओलिंपिक का पहला स्वर्ण पदक जीता था। झारखंड का लाल मारङ गोमके जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में भारत ने यह स्वर्ण पदक जीता था। भारतीय टीम में उनके साथ हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले ध्यानचंद भी थे। 1928 में नीदरलैंड के एम्सटर्डम में हुए ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम पहली बार शामिल हुई थी। जयपाल मुंडा की टीम ने न केवल प्रतियोगिता में जीत हासिल की, बल्कि पांच मैचों में किसी भी टीम को एक भी गोल करने का मौका तक नहीं दिया।

हालांकि इसके बाद जयपाल सिंह मुंडा के लिए खेल ज्यादा रास नहीं आया। जमाना अंग्रेजों का था, इसलिए वह अंग्रेजों की राजनीति के शिकार हो गये। इसके बाद उन्होंने खेलों को दरकिनार कर भगवान बिरसा मुंडा से प्रेरणा लेकर आदिवासियों को अंग्रेजों के शोषण से मुक्त करने के राजनीति से जुड़ गये।

बचपन से ही प्रतिभाशाली थे जयपाल सिंह मुंडा

3 जनवरी, 1903 को खूंटी जिला के टकराहातू गांव में जन्मे जयपाल सिंह मुंडा बचपन से ही मेधावी थे। उनकी पढ़ाई रांची के संत पॉल्स स्कूल में हुई थी। उनकी प्रतिभा से तत्कालीन प्राचार्य रेव्ह कैनन कसग्रेवे काफी प्रभावित हुए और उन्हें उच्चतम शिक्षा हासिल करने के लिए इंग्लैंड भेजा। जयपाल सिंह ने 1920 में संत आगस्टाइन कॉलेज में दाखिला लेने के बाद 1922 में ऑक्सफोर्ड से एमए किया था। 1925 में उन्हें ‘आक्सफोर्ड ब्लू’ का सम्मान मिला। यह सम्मान हासिल करने वाले हॉकी के वह अकेले इंटरनेशनल प्लेयर थे।अपनी प्रतिभा उन्होंने सिविल सर्विसेज का एग्जाम क्लियर करके भी दिखलायी थी, हालांकि उन्होंने इसकी ट्रेनिंग नहीं ली थी।

आदिवासियों के कल्याण के लिए राजनीति से जुड़े

जयपाल सिंह मुंडा ने अपनी पूरी जिंदगी आदिवासियों की खराब हालत सुधारने में बितायी। इसी वजह से उन्हें मारङ गोमके’ (महान नेता) के रूप में याद किया जाता है। वह अखिल भारतीय आदिवासी महासभा में अध्यक्ष रहे थे। जयपाल सिंह मुंडा का भारतीय राजनीति में जो भी योगदान है, उनके कार्यों का मूल्यांकन होना अभी बाकी है। जयपाल सिंह मुंडा ने भगवान बिरसा मुंडा से ‘उलगुलान का मंत्र’ लेकर अंग्रेजों को नाको चने चबाने पर मजबूर कर दिया था।

पहली बार दिया आदिवासियों को राजनीति में आने का विकल्प

जयपाल सिंह मुंडा का राजनीतिक जीवन अंबेडकर के सापेक्ष रहा। वह लगातार आदिवासियों के अधिकारों को संविधान सभा में उठाते रहे। आदिवासियों के हक की लड़ाई के लिए उन्होंने 1938 में आदिवासी महासभा का गठन किया। बिहार से अलग झारखंड राज्य की मांग की। 1950 में झारखंड पार्टी का गठन किया और 1952 के चुनाव में 32 विधायकों के साथ कांग्रेस के सामने चुनौतियां पेश कर दी थीं। तब कांग्रेस को समझ आने लगा था कि झारखंड उनके लिए खतरा है। कालांतर में राजनीतिक षड्यंत्र का शिकार होकर झारखंड पार्टी का विकल कांग्रेस में हो गया।

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