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International Tiger Day : देश का राष्ट्रीय प्रतीक बाघ प्रतीक बन कर न रह जाये

International Tiger Day
International Tiger Day : भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ देश में अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। विश्व की तरह भारत में भी हर वर्ष 29 जुलाई को ‘International Tiger Day’ मनाया जाता है। लेकिन इसके परिणाम निराशाजनक ही आये हैं। बाघ शक्ति, शान, सतर्कता, बुद्धि और धीरज का प्रतीक है, इसी कारण हमारे देश में इसे राष्ट्रीय पशु का दर्जा हासिल है। आंकड़ों की बात करें तो भारत में इस समय बाघों की कुल संख्या 2967 है जो विश्व की संख्या का लगभग 70% है। 2018 की बाघ गणना के बाद भारत में बाघों की संख्या पूरे विश्व में सबसे ज्यादा है। बाघ की गणना 2019 में जारी की गयी थी। ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ में दर्ज यह अब तक की सबसे बड़ी बाघों गणना है। वर्तमान में पूरे विश्व में 3900 टाइगर कुल बचे है, जिनमें से 2967 टाइगर भारत में हैं। टाइगर के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए ही ‘विश्व बाघ दिवस’ मनाया जाता है।
‘International Tiger Day’ की शुरुआत 2010 में
‘विश्व टाइगर दिवस’ की शुरुआत 2010 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हुए सम्मेलन की घोषणा के बाद हुई थी। विश्व में घटते बाघों की संख्या पर चिंता व्यक्त करते हुए यह कदम उठाया गया था। इस सम्मेलन में उपस्थित विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने 2022 तक बाघों की संख्या दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। बाघों की घटती संख्या का एक कारण बाघों के अंगों की तस्करी के लिए उनकी की जाने वाली हत्या है। सम्मेलन में कहा गया था कि अगर इसी प्रकार बाघों के अंगों की तस्करी के लिए उनकी हत्या होती रही तो आने वाले एक या दो दशकों में यह पशु बिलकुल विलुप्त हो जायेगा। अर्थात बाघों को ‘रेड लिस्ट’ में रखा गया है।

‘International Tiger Day प्रतिवर्ष’
‘International Tiger Day प्रतिवर्ष’ इसी थीम के साथ विश्व बाघ दिवस मनाया जाता है। बाघ दिवस मनाना इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि, विश्व वन्यजीव कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के अनुसार, पूरे विश्व में बाघों की संख्या मात्र 3900 है। जिसमें 2967 भारत में है। भारत ने पिछले 7 वर्षों (बाघ गणना के समय) में बाघों की संख्या में दोगुनी वृद्धि दर्ज की है।
भारत में बाघों की स्थिति
वर्ष 2010 में रूस के सेंट पिटर्सबर्ग में हुए सम्मेलन में भारत ने भाग लिया था। इसी सम्मेलन में बाघों की संख्या दोगुनी करने का लक्ष्य रखा गया था। भारत ने इस लक्ष्य को चार वर्षों से पहले ही 2018 में पूरा कर लिया। 2019 में आयी बाघ गणना ने भारत में बाघों की संख्या 2967 बतायी गयी।
भारत ने टाइगर की घटती संख्या को देखते हुए 1973 में एक अधिनियम पारित किया था जिसका नाम प्रोजेक्ट टाइगर है। 1973 में टाइगर रिजर्व क्षेत्रों की संख्या 9 थी, किन्तु वर्तमान में इसकी संख्या बढ़कर 50 हो चुकी है। 2010 की बात करें तो भारत में कुछ 752 टाइगर थे। भारत में सबसे ज्यादा टाइगर मध्य प्रदेश (526), कर्नाटक (524), उत्तराखंड (442) में हैं। अगर इन तीनों राज्य को मिला दिया जाये तो 50% टाइगर इन्हीं राज्यों में हैं।
नाम ‘पलामू टाइगर रिजर्व’, टाइगर नदारद
झारखंड का पलामू टाइगर प्रोजेक्ट 1,026 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है । इसका कोर एरिया करीब 226 वर्ग किलोमीटर का है। 2017-18 के आंकड़ों पर विश्वास करें तो पलामू टाइगर प्रोजेक्ट में 5 बाघ थे। लेकिन इस टाइगर प्रोजेक्ट में बाघों की संख्या को लेकर हमेशा विवाद रहा है। 2012 की गणना में बाघों की संख्या शून्य थी। बाघों की गणना के लिए टीम में शामिल कर्मियों ने बाघों के स्कैट्स तथा फुटमार्क्स एकत्रित करने का प्रयास किया था, मगर उन्हें इस काम में सफलता नहीं मिली थी। इसी आधार पर टीम ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पलामू टाइगर प्रोजेक्ट में बाघ नहीं हैं।
पलामू टाइगर प्रोजेक्ट में उत्तरोत्तर घटते रहे हैं बाघ
देश में पहली बार 1932 में बाघों की गिनती पलामू टाइगर प्रोजेक्ट से ही शुरू हुई थी। 1974 में पूरे देश में बाघों को संरक्षित करने के लिए नौ इलाकों में टाइगर प्रोजेक्ट योजना की शुरुआत की गयी थी। 1974 में पलामू टाइगर रिजर्व की स्थापना के समय पहले बाघों की संख्या 22 थी। जो 1975 में 26 हो गयी। बाघों की सर्वाधिक संख्या 1982 में थी। तब यहां 68 बाघ पाये गये थे। 1999 आते-आते बाघों की संख्या नगण्य हो गयी। हालांकि 2005 के आंकड़ों में बाघों की संख्या 38 बतायी गयी थी। 2007 की गिनती पाया गया कि यहां 17 बाघ हैं। 2009 में वैज्ञानिक तरीके से बाघों की गिनती शुरू हुई। तब सिर्फ आठ बाघ बचे हुए थे। 2011 में इनकी संख्या 14 और 2012 में सिर्फ दो बतायी गयी। 2017-18 में पलामू टाइगर प्रोजेक्ट में 5 बाघ होने की बात कही गयी। लेकिन इस आंकड़े पर संदेह है।
45 वर्षों में करीब 400 करोड़ खर्च, संरक्षण दूर की कौड़ी
बाघों की घटती संख्या को लेकर राज्य और केंद्र सरकारें चिंतित हैं। बाघों को बचाने के लिए पिछले 45 वर्षों में करीब 400 करोड़ रुपये खर्च भी किया जा चुके हैं, लेकिन बाघों की संख्या में इजाफा नहीं हो रहा है। बता दें, प्रत्येक वर्ष केंद्र सरकार इको-टूरिज्म के तहत राशि का आवंटन करती है। इससे गांवों के विकास के साथ-साथ बाघों के प्रवास के कार्यों पर भी खर्च किये जाते हैं। फिलहाल दूसरे टाइगर प्रोजेक्ट से बाघ लाकर इनकी संख्या बढ़ाने की दिशा में कोई कार्रवाई भी नहीं की जा रही है। 2018 की गणना रिपोर्ट में पलामू टाइगर रिजर्व में एक भी बाघ नहीं बताया गया था, लेकिन पलामू टाइगर रिजर्व में फरवरी 2020 में एक बाघिन मृत मिली थी।

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