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अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस: ‘जवानी जाकर नहीं आती, बुढ़ापा आकर नहीं जाता’, युवा पीढ़ी काे रहे ख्याल

अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस आज की युवा पीढ़ी को संदेश देने का दिन

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

आज हम अपने बुजुर्गों के साथ जो व्यवहार कर रहे हैं, एक दिन वह व्यवहार हमारे साथ भी होना है, शायद यही संदेश है ‘बुजुर्ग दिवस’ मनाने का। यह संदेश सिर्फ भारत के लिए ही नहीं है, यह संदेश पूरे विश्व के लिए है। क्योंकि बुजुर्गों के  प्रति एक जैसा व्यवहार भारत ही नहीं पूरे विश्व की किया जाता है। इसीलिए हर वर्ष ‘अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस’ पूरे विश्व में मनाये जाने का यही उद्देश्य है। यह दिन प्रत्येक परिवार के वृद्धजनों को समर्पित है। पहली बार ‘अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस’ 1 अक्टूबर, 1991 को मनाया गया था। उद्देश्य अपने वरिष्ठ नागरिकों का सम्मान करना, उनके सम्बन्ध में चिंतन करना तथा उनकी मूलभूत सुविधाओं का ध्यान रखना, आदि है।

बुजुर्जों के लिए भारत ने 2007 में पारित किया विधेयक

भारत में 2007 में ‘माता-पिता एवं वरिष्‍ठ नागरिक भरण-पोषण विधेयक’ संसद में पारित किया गया। इसमें माता-पिता के भरण-पोषण, वृद्धाश्रमों की स्‍थापना, चिकित्‍सा सुविधा की व्‍यवस्‍था और वरिष्‍ठ नागरिकों के जीवन और सं‍पत्ति की सुरक्षा का प्रावधान किया गया है।

वरिष्‍ठ नागरिकों का सम्मान और चिंता जरूरी

अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस पर अपने वरिष्‍ठ नागरिकों का सम्मान करना एवं उनके सम्बन्ध में चिंतन करना आवश्यक है। आज का वृद्ध समाज अत्यधिक कुंठा ग्रस्त है और सामान्यत: इस बात से सर्वाधिक दु:खी है कि जीवन का विशद अनुभव होने के बावजूद कोई उनकी राय न तो लेना चाहता है और न ही उनकी राय को महत्व ही देता है। इस प्रकार अपने को समाज में एक तरह से  निष्प्रयोज्य समझे जाने के कारण हमारा वृद्ध समाज सर्वाधिक दु:खी रहता है। वृद्ध समाज को इस दुःख और संत्रास से छुटकारा दिलाना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। इस दिशा में ठोस प्रयास किये जाने की बहुत आवश्यकता है।

संयुक्त राष्ट्र ने लिया 1990 में निर्णय, 1991 में शुरुआत

संयुक्त राष्ट्र ने विश्व में बुजुर्गों के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार और अन्याय को समाप्त करने के लिए और लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए 14 दिसम्बर, 1990 को यह निर्णय लिया कि हर साल ‘1 अक्टूबर’ को ‘अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस’ के रूप में मनाकर हम बुजुर्गों को उनका सही स्थान दिलाने की कोशिश करेंगे। 1 अक्टूबर, 1991 को पहली बार ‘अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस’ मनाया गया, जिसके बाद से इसे हर साल इसी दिन मनाया जाता है। वर्ष 1999 को अंतर्राष्ट्रीय बुजुर्ग-वर्ष के रूप में भी मनाया गया था।

1990 से पहले भी की जाती रही है बुजुर्गों की वैश्विक चिंता

1990 से पहले 1982 में ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ ने “वृद्धावस्था को सुखी बनाइए” जैसा नारा दिया गया और “सबके लिए स्वास्थ्य” का अभियान प्रारम्भ किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1 अक्तूबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध-दिवस’ के रूप में घोषित किया हुआ है और इस रूप में विश्वभर में इसका आयोजन भी किया जाता है। इन सब बातों का उद्देश्य यही है, वृद्ध व्यक्तियों के प्रति लोगों में सम्मान और संवेदना के भाव जागें और उनके स्वास्थ्य तथा आर्थिक समस्याओं के समाधान पर विशेष ध्यान दिया जाये। वृद्धावस्था की बीमारियों के लिए अनेक औषधियों का आविष्कार किया गया और अनेक स्थानों पर अस्पतालों में उनके लिए विशेष व्यवस्था की गयी। लगभग सभी पश्चिमी देशों में आर्थिक समस्या से जूझते वृद्धों के लिए पर्याप्त पेंशन की व्यवस्था की गयी है, जिससे उनका खर्च आराम से चल जाता है।

बुजुर्गों की समस्या आर्थिक संकट से ज्यादा अकेलापन

बुजुर्गों के सामने सामान्यत: आर्थिक संकट नहीं होता, उनके सामने स्वास्थ्य के अतिरिक्त मुख्य समस्या अकेलेपन की है। वयस्क होने पर बच्चे अलग रहने लगते हैं और केवल सप्ताहान्त या अन्य विशेष अवसरों पर ही वे उनसे मिलने आते हैं। कभी-कभी उनसे मिले महीने या वर्ष भी गुजर जाते हैं। बीमारी के समय उन्हें सांत्वना देने वाला सामान्यत: उनका कोई भी अपना उनके पास नहीं होता।

बुजुर्ग दिवस मनाने की आवश्यकता क्यों?
  • संयुक्त परिवार के बिखराव के बाद भारत ही नहीं, विश्व में बुजुर्गों की हालत दयनीय हुई है।
  • कई कारणों से करोड़ों बजुर्गों को अकेले रहना पड़ रहा है।
  • लोगों की अपने बुजुर्गों के प्रति उन्हें बोझ समझने की मानसिकता।
  • आज की युवा पीढ़ी अपने में ही व्यस्त है। वह अपने बुजुर्गों से कुछ भी सीखना नहीं चाहती है। संवाद रखने में भी हीनता महसूस करती है। जबकि युवा पीढ़ी यह भूल जाती है कि यही उनका भी कल का भविष्य है। कहीं यह पढ़ने का अवसर मिला था- ‘जवानी जाकर नहीं आती, बुढ़ापा आकर नहीं जाता’।
  • युवा पीढ़ी यह नहीं समझती है कि एक दिन वे भी बुजुर्ग हो जाएंगे तब उनके व्यवहार को देखकर उनके बच्चे भी उनकी अवहेलना ही करेंगे। हम अपने बच्चों को कौन-सी प्रेरणा दे रहे हैं?
  • अपनी शिक्षा और धन के मद में तथाकथित आधुनिक पीढ़ी अपने बुजुर्गों को वृद्धाश्रम में छोड़ देती है या उन्हें वृद्धाश्रम में जाने के लिए मजबूर कर देती है। आजादी का जीवन जीने की इच्छा रखने वाली इस पीढ़ी को लगता है कि ये बुजुर्ग उनकी आजादी में बाधक हैं।
  • हां, यह जरूर देखा जाता है कि यदि किसी वृद्ध को अच्‍छी खासी पेंशन मिल रही है तो उसकी घर में थोड़ी या बहुत इज्जत होती है। उसका ध्यान दिया जाता है।

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