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Amazing: संविधान मौन हुआ तो भारतीय संस्कार बना मार्गदर्शक, जज ने पेश की अद्भुत मिसाल

If the constitution was silent, then the Indian culture became the guide, the judge set a wonderful example

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

भारतीय संस्कारों में कही गयी बातें व्यर्थ नहीं है, यह न्यायालय भी मानने लगा है। जोधपुर हाई कोर्ट ने भारतीय संस्कारों को सामने रखकर एक ऐसी मिसाल प्रस्तुत की है, जिसकी जितनी प्रशंसा की जाये कम है। राजस्थान की एक महिला ने जोधपुर हाई कोर्ट से संतान उत्पत्ति के लिए पति की पैरोल की इजाजत मांगी थी। महिला ने दलील दी थी कि वह मां बनना चाहती है, लेकिन उसका पति जेल में बंद है। इसलिए उसके मां बनने के अधिकार को ध्यान में रख कुछ दिनों के लिए उसके पति को पैरोल पर रिहा किया जाये। और जोधपुर हाई कोर्ट ने महिला के पति को परोल दे भी दी। जिस महिला ने अपने पति के लिए पैरोस मांगा था उसका पति भीलवाड़ा जिले के रबारियों का ढाणी निवासी फरवरी 2019 से अजमेर जेल में उम्रकैद की सजा काट रहा है। शादी के वक्त ही नंदलाल नामक इस शख्स यह सजा हो गयी थी। जिस कारण महिला मां नहीं बन पायी। महिला ने कलेक्टर से पति के पैरोल की गुहार लगा चुकी थी,, लेकिन कलेक्टर ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। तब महिला ने हाई कोर्ट का रुख किया।

हाई कोर्ट द्वारा महिला की दलील स्वीकार कर उसके पति को 15 दिनों की पैरोल पर छोड़ने का आदेश दिया गया है। देखने में यह एक सामान्य का फैसला लग सकता है। लेकिन फैसले को जज ने जिस बात को आधार बनाया वह भारतीय संस्कृति पर गर्व करने का विषय है। जज संदीप मेहता व फरजंद अली की खंडपीठ ने कहा कि वैसे तो संतान उत्पत्ति के लिए परोल से जुड़ा कोई साफ नियम नहीं है, लेकिन वंश के संरक्षण के लिए संतान उत्पत्ति जरूरी है। कोर्ट ने ऋग्वेद और वैदिल काल के उदाहरण को सामने रखकर संतान उत्पत्ति को एक मौलिक अधिकार बताते हुए महिला की शादीशुदा जिंदगी से संबंधित यौन और भावनात्मक जरूरतों की रक्षा’ के लिए 15 दिनों की पैरोल इजाजत दी। कोर्ट ने यह भी कहा कि धार्मिक आधार पर हिंदू संस्कृति में गर्भधान 16 संस्कारों में से एक है, ऐसे में इस आधार पर भी अनुमति दी जा सकती है।

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