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Congress की करारी हार से आहत G-23 नेता चाहते हैं ‘परिवर्तन’, ग़ुलाम नबी आजाद के घर मिल बैठेंगे

Hurt by the defeat of Congress, G-23 leaders want 'change'

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

Congress जल रही है, और ‘नीरो’ आइसक्रीम खा रहा है। गुरुवार को पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की मतगणना के वक्त आराम से आइसक्रीम खाते वाले राहुल गांधी को Congress की चिंता भले न हो, लेकिन पार्टी की दुर्गति से विरोधी जी-23 खेमा बहुत आहत है। जी-23 पार्टी में क्रांतिकारी परिवर्तन चाहता है। इस मुद्दे पर जी-23 एक बार फिर मिल रहे हैं ताकि पार्टी की दशा कैसे सुधर सके, इस पर विमर्श कर सकें। जी-23 की यह मुलाकात गुलाम नबी आजाद के घर पर होगी।

केन्द्र की सत्ता में नरेन्द्र मोदी के कदम Congress के लिए शुभ नहीं रहे। 70 वर्षों तक देश पर एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस मई, 2014 से सिमटनी शुरू हो गयी है। पार्टी ने 2014 के बाद से हुए 45 चुनावों में से सिर्फ 5 में जीत हासिल की है, इसी से कांग्रेस की दुर्दशा का अंदाजा लग जाता है। Congress 9 राज्यों से केवल 2 राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ तक सिमट कर रह गयी है। महाराष्ट्र और झारखंड की सत्ता तो सरकारों को समर्थन देने की कीमत पर मिली हुई है। निष्कर्ष यही है कि कांग्रेस इस समय विश्वसनीयता और नेतृत्व के संकट से जूझ रही है। यह संकट नया नहीं है, लेकिन समाधान कुछ भी नहीं है। दिक्कत यह भी है कि Congress इस संकट से ‘उबरना’ भी नहीं चाहती।

पार्टी में सुधार चाहता है जी-23

पांच राज्यों के चुनाव परिणामों पर कांग्रेस G-23 के दिग्गजों को कोई आश्चर्य नहीं है। उनका कहना कि इसका अनुमान तो उन्हें पहले से ही था। लेकिन ये कांग्रेस दिग्गज पार्टी की दुर्दशा से आहत जरूर हैं। कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सदस्य गुलाम नबी आजाद ने कहा, ‘मैं स्तब्ध हूं, राज्य दर राज्य हमारी हार को देखकर मेरा दिल बैठा जा रहा है। मैंने पार्टी को अपनी पूरी जवानी और जीवन दिया है, मुझे यकीन था कि पार्टी का नेतृत्व उन सभी कमजोरियों और कमियों पर ध्यान देगा…’

ऐसा ही कुछ Congress नेता शशि थरूर ने भी कहा, लेकिन उन्होंने नेतृत्व सुधार के लिए अपना आह्वान दोहराया। उन्होंने ट्वीट किया, ‘हम सभी, जो कांग्रेस में विश्वास करते हैं, हाल के विधानसभा चुनावों के परिणामों से आहत हैं। यह भारत के उस विचार की पुष्टि करने का समय है, जिसके लिए कांग्रेस हमेशा खड़ी रही है और राष्ट्र को सकारात्मक एजेंडा देती है। हमें हमारे संगठनात्मक नेतृत्व को इस तरह से सुधारना है, जो उन विचारों को फिर से जीवंत करे। यदि हमें सफल होना है तो परिवर्तन करना ही होगा।

निशाने पर नहीं पड़ रहे कांग्रेस के दांव

पांच राज्यों के ही चुनावों का विश्लेषण कर लें तो पता चल जायेगा कि कमजोर नेतृत्व के दांव भी कमजोर साबित हो रहे हैं। पंजाब में बुजुर्ग नेताओं की जगह युवा नेताओं को तरजीह दी, कैप्टन अमरिन्दर सिंह को दरकिनार किया, बयानबीर नवजोत सिंह सिद्ध को प्रदेश अध्यक्ष बनाया, सिद्धू के खड़े किये विवादों पर आंखें बंद रखीं, दिग्गज कांग्रेस नेताओं की जगह एक कमजोर नेता को सीएम की कुर्सी पर बैठाया, पंजाब के मुद्दों को दरकिनार कर व्यर्थ का दलित कार्ड खेला। कांग्रेस का अगर कोई भी एक दांव भी सटीक बैठ जाता तब भी माना जा सकता था कि उसने सही सोचा। उत्तर प्रदेश में महिलाओं को तरजीह देना एक अच्छी सोच थी, लेकिन यह तब और भी ज्यादा सही होता जब राष्ट्रीय महासचिव यूपी में खुद महिलाओं की प्रेरणा स्रोत बनतीं, खुद चुनाव लड़ने के लिए तैयार होतीं तो नतीजों पर कुछ असर जरूर पड़ा।इसके बाद उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में जहां कांग्रेस की भाजपा से बराबरी की टक्कर में थी, वहां भी उसने हथियार डाल दिये। कांग्रेस तो सबसे हास्यास्पद गोवा में हो गयी, जहां टीएमसी और आप का कोई जनाधार नहीं था, वहां उन्हें भी सीटें निकालने का अवसर दे दिया।

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