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Hijab: कहीं 100 साल पुराना तो नहीं मुस्लिम महिलाओं का पर्दा? इस्लाम के पहले से है शरीर ढंकने का रिवाज

Hijab: Whether it is 100 years old or not, the veil of Muslim women

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

प्रथा हो या रीतियां परिवर्तन संसार का नियम है। बेहतरी वाले परिवर्तन होने भी चाहिए। लेकिन परेशानी यह है कि बदलावों की लड़ाई समुदायों की जंग में तब्दील हो जाती है। लोग सड़कों पर उतर आते हैं। कर्नाटक के हिजाब विवाद में भी ऐसा ही दिख रहा है। हिजाब के समर्थन और विरोध में लोग सड़कों पर भिड़ रहे हैं।

मंगलवार को कर्नाटक उच्च न्यायालय की विशेष पीठ ने कक्षाओं में हिजाब पहनने की अनुमति देने वाली छात्रों दायर याचिकाओं को गैर इस्लामिक कहते हुए खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि हिजाब पहनना इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। “स्कूल यूनीफॉर्म का निर्धारण संवैधानिक है और छात्र इस पर आपत्ति नहीं कर सकते।” कोर्ट ने छात्रों की ओर से दायर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘क्लास रूम के अंदर कोड ऑफ कंडक्ट जरूरी है, क्लास रूम के बाहर चाहे जो छात्र जो कोई ड्रेस पहने, लेकिन क्लास रूम में स्कूल-कॉलेज के ड्रेस कोड को मान्यता दी जाये। स्कूल और कॉलेज को अपनी ड्रेस कोड तय करने का अधिकार है।’ अदालत ने साथ में यह भी कहा कि सरकार के पास आदेश जारी करने की शक्ति है।

कब से शुरू हुई है हिजाब की परम्परा?

विश्व में अनेक सभ्यताएं है और सबके अपने-अपने परिधान हैं। इस परिधानों पर वहां की जलवायु का गहरा असर है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। आज मुस्लिम महिलाओं के जिस पहनावे की चर्चा हो रही है वह प्राचीन नहीं अति प्राचीन है। शुरुआती दौर में तेज धूप, धूल और बारिश से सिर को बचाने लिनेन के कपड़े का प्रयोग किया जाता था. इसे सिर पर बांधा जाता था। 13वीं शताब्‍दी में लिखे गए प्राचीन एसिरियन लेख में भी इसका जिक्र किया गया है। हालांकि, बाद में इसे धर्म से जोड़ा गया। प्राचीन काल में अरब, ईरान और रोम में महिलाएं (पुरुष भी) जो परिधान पहनती थीं, उन पर वहां के गर्म और अति शुष्क मौसम का असर साफ दिखता है। ऐसा विषम मौसम से बचने के लिए ही इस पहनावे का इस्तेमाल होता था। फिर भी प्राचीन काल में अरब, ईरान और रोम में महिलाएं अपने सिर और चेहरे को ढंक कर रखने की जो परम्परा थी, उसका पालन भी केवल राज परिवार और उच्च वर्ग की महिलाओं तक सीमित था। यह परम्परा उस समय की है जब इस्लाम धर्म अस्तित्व में भी नहीं आया था। 7वीं शताब्दी में जब अरब में इस्लाम धर्म की उत्पत्ति हुई तो ये पहनावा काफी लोकप्रिय हो गया। हालांकि 20वीं शताब्दी तक भी अरब और ईरान जैसे देशों में ही बुर्का और नकाब पहना जाता था जबकि मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों में मुस्लिम महिलाएं स्थानीय पहनावे को ही प्राथमिकता देती थीं। पहनावे को लेकर जो भी ऐतिहास साक्ष्य उपलब्ध है, ऐसा उनके आधार पर कहा जा सकता है। एक पंक्ति में कहा जाये तो मुस्लिम महिलाओं के बुर्के और हिजाब के पहनावे (थोपने) की शुरुआत 100 साल पहले शुरू हुई है।

1920 में तब्लीगी जमात ने चलाया था आंन्दोलन

इस्लामिक संस्था तब्लीगी जमात ने 1920 के दशक में आन्दोलन चलाया था कि भारत की मुस्लिम महिलाओं को बुर्के और हिजाब में रहना चाहिए और मुस्लिम पुरुषों को लम्बी दाढ़ी रखनी चाहिए. और यहीं से धार्मिक कट्टरवाद भारत में अपनी जड़ें और मजबूत करती चली गयी। यह आन्दोलन ही बताता है कि हिजाब महिलाओं पर थोपा गया था। और अगर हिजाब हर महिला के लिए अनिवार्य है तो फिर दाढ़ी रखना भी तो हर मुसलमान के लिए अनिवार्य है, लेकिन इस पर तो कोई आवाज नहीं उठायी जाती।

कुरान में धार्मिक परिधान का जिक्र नहीं

कुरान में महिलाओं और पुरुषों के लिए किसी भी खास तरह के धार्मिक परिधान का ज़िक्र नहीं है। कुरान में केवल ‘लाज’ का ज़िक्र किया गया है। यानी इस बात पर जोर दिया गया है कि महिला और पुरुष दोनों इस तरह के कपड़े पहनें, जो उनकी गरिमा और लाज को बनाकर रखें। लेकिन इस्लाम धर्म के ठेकेदारों और मुस्लिम नेताओं ने समय-समय पर लोगों को इस पर गुमराह करने की कोशिश की है।

मुस्लिम महिलाओं के अनेक पहनावे

हिजाब: एक ऐसा हेडस्कार्फ जो छाती और सिर को ढंकता है, एक प्रकार का घूंघट होता है जिसे कुछ मुस्लिम महिलाएं अपने परिवार के बाहर अजनबियों या पुरुषों की उपस्थिति में पहनती हैं।

नकाब: नकाब एक घूंघट है जो चेहरे को ढंकता है, लेकिन आंखों का क्षेत्र खुला रहता है। आमतौर पर इसे हेडस्कार्फ़ के साथ पहना जाता है। इसे अक्सर मुस्लिम महिलाएं हिजाब के हिस्से के रूप में पहनती हैं।

दुपट्टा: हिजाब को कभी-कभी दुपट्टे की शैली में पहना जाता है, मुख्यतः युवा महिलाओं द्वारा। इसमें पूरी गर्दन को कवर किया जाता है। दुपट्टा शैली अपने चमकीले रंगों और सुंदर कढ़ाई से अलग होती है, जो आमतौर पर पोशाक के साथ मेल खाती है।

बुर्का: बुर्का और नकाब अक्सर भ्रमित होते हैं। नकाब चेहरे को ढंकते हैं, लेकिन आंखों को खुला छोड़ देते हैं, जबकि बुर्का पूरे शरीर को सिर के ऊपर से जमीन तक ढकता है, केवल एक छोटी सी स्क्रीन पहनने वाले को सामने देखने की इजाजत देता है।

शायला: मुस्लिम महिलाओं द्वारा विशेष रूप से ईरान में सिर को ढंकने, घूंघट और शॉल के संयोजन के रूप में पहना जाने वाला एक बड़ा कपड़ा। इराक और कुछ अन्य देशों में फारसी सांस्कृतिक क्षेत्र के साथ-साथ मुख्य रूप से शिया क्षेत्रों में भी, सार्वजनिक स्थानों पर बाहरी वस्त्र या खुले लबादे के रूप में लबादा पहनते हैं।

यह भी पढ़ें: स्कूल-कॉलेजों में हिजाब की इजाजत नहीं, Karnataka High Court में याचिका खारिज

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