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Happy Birthday: शिबू सोरेन और बाबूलाल मरांडी – झारखंड के निर्माण और राजनीति को समर्पित दो पुरोधा

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

झारखंड के दो दिग्गज नेता शिबू सोरेन और बाबूलाल मरांडी आज अपना जन्मदिन मना रहे हैं। चूंकि समय कोरोना महामारी का है, इसलिए दोनों दिग्गज अपना जन्मदिन सादगी से मनायेंगे। शिबू सोरेन और बाबूलाल मरांडी झारखंड की राजनीति में बहुत गहरी दखल रखने वाले नेता हैं। दोनों ही कई बार सांसद रह चुके हैं, दोनों केन्द्रीय मंत्री रह चुके है और दोनों झारखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। सबसे बड़ी बात यह कि दोनों आदिवासियों की बात करने वाले नेता हैं। झारखंड का जब भी इतिहास लिखा जायेगा, इन दोनों नेताओं के बिना वह अधूरा होगा।

शिबू सोरेन

झारखंड अलग राज्य के आन्दोलन के शीर्ष नेताओं में शिबू सोरेन का नाम अग्रणी है। बिहार से अलग कर झारखंड राज्य बनाने में शिबू सोरेन का अमूल्य योगदान रहा है। शिबू सोरेन ने झारखंडियों के उत्थान में अपना जीवन समर्पित कर दिया है। झारखंड अलग राज्य तो उनका सपना था ही। महाजनी प्रथा और सूदखोरी को खत्म करने का भी अभियान उन्होंने छेड़ा था। दिशोम गुरु के नाम से विख्यात शिबू सोरेन ने झारखंड और आदिवासियों के लिए वर्षों जंगलों की खाक छानी है और कई बार जेल गये हैं। फिलहाल वह राज्यसभा के सदस्य हैं।

शिबू सोरेन के राजनीतिक जीवन में कुछ दाग भी लगे। यह दाग चिरूडीह कांड के रूप में लगा था जिसमें 11 लोगों की हत्या हुई थी। इसी सिलसिले में जब गिरफ्तारी वारंट हुआ था तब उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल से 24 जुलाई 2004 को इस्तीफा देना पड़ा था। शिबू झारखंड के दुमका लोकसभा सीट से छह बार सांसद चुने गये हैं।

शिबू पहली बार 1977 में लोकसभा के लिये चुनाव में खड़े हुए, परन्तु पराजित हुए। 1980 में वह लोकसभा चुनाव जीते। इसके बाद क्रमश: 1986, 1989, 1991, 1996 में भी चुनाव जीते। 10 अप्रैल 2002 से 2 जून 2002 तक वे राज्यसभा के सदस्य रहे। 2004 में वे दुमका से लोकसभा के लिये चुने गये। सन 2005 में झारखंड विधानसभा चुनावों के पश्चात वह झारखंड के मुख्यमंत्री बने, परंतु बहुमत साबित न कर सकने के कारण कुछ दिनो के पश्चात ही उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा।

बाबूलाल मरांडी

बाबूलाल मरांडी को झारखंड का पहला मुख्यमंत्री बनने का सौभाग्य प्राप्त है। बाबूलाल झारखंड के भाजपा के प्रमुख नेताओं में हैं। हालांकि बीच में उन्होंने भाजपा से नाराज होकर अलग राजनीतिक मुकाम बना लिया था, लेकिन राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद फिर भाजपा में वापस आ गये हैं। बाबूलाल मरांडी का संघ परिवार से पुराना रिश्ता रहा है। झारखंड क्षेत्र के विश्‍व हिन्‍दू परिषद का संगठन सचिव भी रह चुके हैं।

उन्होंने अपना राजनीतिक क्षेत्र दुमका को बनाया था। 1983 में वह दुमका जाकर सन्थाल परगना डिवीजन में कार्य करने लगे। 1991 में बाबूलाल भाजपा के टिकट पर दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए। 1996 में वे फिर शिबू सोरेन से हारे। इसके बाद भाजपा ने 1998 में उन्हें विधानसभा चुनाव के दौरान झारखण्ड बीजेपी का अध्‍यक्ष बनाया। पार्टी ने उनके नेतृत्‍व में झारखण्ड क्षेत्र की 14 लोकसभा सीटों में से 12 पर कब्‍जा किया। 1998 के चुनाव में उन्होंने शिबू सोरेन को सन्थाल से हराकर चुनाव जीता था, जिसके बाद एनडीए की सरकार में बिहार के 4 सांसदों को कैबिनेट में जगह दी गई। इनमें से एक बाबूलाल मरांडी थे। 2000 में बिहार से अलग होकर झारखण्ड राज्‍य बनने के बाद एनडीए के नेतृत्‍व में बाबूलाल मरांडी ने राज्‍य की पहली सरकार बनाई।

बाबूलाल ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में राज्‍य को बेहतर तरीके से विकसित करने का कार्य किया। राज्‍य की सड़कें, औद्योगिक क्षेत्र तथा रांची को ग्रेटर रांची बना सकते थे। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने कई सराहनीय कदम उठाये। झारखण्ड राज्य विकास की ओर अग्रसित हो रहा था। तभी राजनीतिक घटनाचक्र में फंस कर जदयू के हस्‍तक्षेप के बाद सत्ता अर्जुन मुंडा को सत्ता सौंपनी पड़ी।

इसके बाद उन्‍होंने राज्‍य में एनडीए को विस्‍तार देने का कार्य किया। 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्‍होंने कोडरमा सीट से चुनाव जीता, जबकि अन्‍य उम्‍मीदवार हार गए। मराण्डी ने 2006 में कोडरमा सीट सहित बीजेपी की सदस्‍यता से भी इस्तीफा देकर ‘झारखण्ड विकास मोर्चा’ नाम से नई राजनीतिक दल बनाया।

यह भी पढ़ें: पूरा झारखंड मानव तस्करों का पड़ाव है, रोक लगाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है

 

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