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Gyanvapi: तो क्या मंदिर में नमाज पढ़ते हैं मुसलमान? क्या इस्लाम देता है इसकी इजाजत?

Gyanvapi: Do Muslims offer Namaz in the temple? Does Islam allow it?

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

ज्ञानवापी विवाद 1991 में तब शुरू हुआ जब स्थानीय पुजारियों के एक समूह ने ज्ञानवापी परिसर में पूजा करने की अनुमति मांगी थी। पुजारियों का दावा था कि मस्जिद का निर्माण 17वीं शताब्दी में औरंगजेब के शासनकाल में काशी विश्वनाथ मंदिर के एक ध्वस्त हिस्से पर किया गया है। इसके बाद 2019 में याचिकाकर्ताओं द्वारा ज्ञानवापी परिसर के पुरातात्विक सर्वेक्षण की मांग के बाद मामले ने फिर तूल पकड़ा है।

ज्ञानवापी में शिवलिंग मिलने की बात कही जा रही है। विश्व हिन्दू परिषद ने इसे असली मंदिर का शिवलिंग और बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक बताया है। अदालत के आदेश के बाद ज्ञानवापी में सर्वे और वीडियोग्राफी के बाद जो तथ्य लीक होकर बाहर आये हैं, वे भी इस परिसर को हिन्दू धर्म स्थल ही साबित करते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इतने लम्बे वर्षों से वहां नमाज कैसे अदा की जा रही थी? क्या यह नमाज जायज है? वहां शिवलिंग के पाया जाने पर यह बात आसानी से कही जा सकता है कि मूर्तियों की पूजा न करना इस्लाम का एक मूलभूत पहलू है। इस्लाम में मूर्ति पूजा को बुरा माना जाता है। इसे नरसंहार से भी बदतर कहा गया है। भले ही मंदिर के हिस्से को तोड़ कर मस्जिद खड़ी की गयी है, लेकिन जिस परिसर में शिवलिंग मौजूद हो उसमें नमाज़ पढ़ना कहीं से भी उचित नहीं लगता। शायद इसीलिए मुस्लिम पक्ष शिवलिंग को शिवलिंग मानने से इनकार कर रहा है और उसे फव्वारा बता रहा है। लेकिन मुस्लिम पक्ष इस बात को क्यों भूल जा रहा है कि हिन्दू को पूजा करने के लिए किसी देवी-देवता की मूर्ति का होना आवश्यक नहीं है। वह तो किसी पिंड में ही देवी-देवताओं को निरूपित कर देता है। अगर ऐसे में अगर हिन्दू यह मान रहे हैं कि वह शिवलिंग है तो वह शिवलिंग ही है। अब मुसलमान यह बतायें कि क्या वह हिन्दुओं के शिवलिंग के सामने नमाज पढ़ना चाहेंगे? यह तो हुई एक बात, सामने शिवलिंग की, चारों तरफ देवी-देवतों की आकृतियां, घंटे, दीये, सांप, त्रिशूल, डमरू, फूल-पत्तियां भी तो हैं और इनके बीच सैकड़ों वर्षों से नमाज चल रही है। जब इस विवाद ने एक नया रूप ले लिया तो और भी ज्यादा नमाजी नमाज पढ़ने आ गये।

ज्ञानवापी में नमाज उचित नहीं!

सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने एक चौंकाने वाला तथ्य उजागर किया था। उन्होंने कहा कि इस्लामी रीति-रिवाजों में कहा गया है कि उस संरचना को ही मस्जिद कहा जाना चाहिए, जिसकी पहली ईंट मस्जिद के नाम पर रखी जाये। यह बात मुस्लिम समाज को समझनी चाहिए। एक मुसलमान के लिए इस्लाम में क्या सही है या गलत है, इस पर ढेरों बातें कही गयी हैं। एक हिन्दू मूर्ति के सामने बैठ कर आराधना करे, सही है। एक हिन्दू मंदिर में बैठकर आराधना करे, सही है। एक हिन्दू बिना किसी मूर्ति के किसी कमरे में भी बैठकर आराधना करे, सही है। एक हिन्दू खुले मैदान में बैठकर, चट्टान पर बैठकर, पहाड़ों पर बैठकर आराधना करे ये सब उचित है, लेकिन क्या यह जायज है कि एक मुसलमान शिवलिंग के सामने नमाज पढ़े? क्या इसकी इजाजत इस्लाम देता है? हिन्दू बहुदेववादी है, उसकी आराधना पद्धति अनेक धाराओं में चलती हैं। इस्लाम तो एक धारा में चलने वाला, एक धर्मग्रथ के, एक नियम को लेकर चलने वाला धर्म है। फिर ज्ञानवापी में आराधना को लेकर ढेर सारी धाराएं क्यों बहाने लग गयी है? इतना के बाद भी यह सब उचित है तो फिर कुफ्र और काफिरी की क्या परिभाषा है?

कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें न चाहते हुए भी निगलना पड़ता है। एक सबसे बड़ा सत्य यह है कि विश्व की अधिकांश संस्कृतियां भले भी बाद में अस्तित्व में आयी हों, लेकिन जिन जगहों पर ये संस्कृतियां उपजी हैं, अधिकांश या तमाम जगहों का संबंध शिव से है। हेमकूट (हिन्दूकुश), सरवन (एशिया माइनर), ईरान का जाट प्रान्त, ईरान का हिरात (हर राष्ट्र), अरब का उमा प्रान्त, अफ्रीका का सूडान (शिवदान) अनेकों नाम लिए जा सकते हैं, जहां शिव और शिवलिंग के प्रमाण मिलते रहे हैं और आज भी मिलते हैं। ज्ञानवापी में भी शिव ने अपना रूप दिखा ही दिया। संक्षेप में यही कहा जायेगा कि पृथ्वी के बहुत बड़े भूखंड पर शिव विराजमान हैं। मुसलमान ही बतायें, अब वे कहां जायेंगे?

काशी विश्वनाथ को तोड़ने की कहानी

सन 1194-1197 के आसपास कुतुबुद्दीन ऐबक ने काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने की कोशिश की। हालांकि मंदिर पूरी तरह से नहीं तोड़ पाए। इस मंदिर को तोड़ने का ये पहला प्रयास था। 1230 में इल्तुत्मिश ने काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था। इल्तुतमिश के मंदिर बनवाने के बाद 200 साल तक काशी विश्वनाथ मंदिर सुरक्षित रहा। सन 1447 में जौनपुर के शासक महमूद शाह शर्की ने एक बार फिर काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने का प्रयास किया। शाहजहां ने 1632 में काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़ने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाया। 1669 में औरंगजेब ने फिर इस कोशिश की दोहराया और विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने में कामयाब हो गया। मंदिर तोड़कर मंदिर के अवशेषों से ही ज्ञानवापी मस्जिद को बनाया गया।

अहिल्याबाई ने कराया पुनर्निर्माण

इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने 1776-78 में विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निमाण कराया। मंदिर का निर्माण हुआ तो औरंगज़ेब द्वारा बनाई गई मस्जिद के ठीक बगल में। विश्वनाथ मंदिर का जो स्वरूप आज देखा जाता है, उसके बारे में कहा जाता है कि वह अहिल्याबाई होल्कर द्वारा बनवाया गया मंदिर है।

एक महत्वपूर्ण तथ्य

वाराणसी के रहने वाले इतिहासकार राकेश पांडेय कहते हैं- “कई किताबों में ये भी लिखा मिलता है कि रज़िया मस्जिद के बगल में बना मंदिर ही असली काशी विश्वनाथ मंदिर है, बल्कि वह नहीं, जिसे हम आज देखते हैं।”

इस इलाके का भौगोलिक और वैज्ञानिक अध्ययन करने वाले प्रोफेसर राणा पीबी सिंह कहते हैं- “जब हम मैग्नेटिक फोर्स और ऊंचाइयों का अध्ययन करते हैं, तो प्राचीन विश्वनाथ मंदिर की लोकेशन वर्तमान मंदिर के इलाके में नहीं मिलती है. लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि इन्हीं मानकों के आधार पर प्राचीन विश्वनाथ मंदिर की लोकेशन कहीं न कहीं बनारस के विशेश्वरगंज मोहल्ले के आसपास हो सकती है।”

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