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Govardhan Puja: गाय अपने जीवनकाल में 410440 मनुष्यों का पेट भरती है

Govardhan

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

आज गोवर्द्धन पूजा है। गोवर्द्धन पूजा के साथ एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है, लेकिन इस पूजा का तात्पर्य गायों का सम्मान करना है। हिन्दू धर्म में गाय का प्राचीन काल से महत्व है। हिन्दू धर्म में गाय के महत्व के कुछ आध्यात्मिक, धार्मिक और चिकित्सीय कारण भी रहे हैं। इन्हीं आधारों पर जानने का प्रयास करते हैं की गायों की अनोखी विशेषताएं क्या हैं।

गायों की सामान्य विशिष्टताएं
  • स्वामी दयानन्द सरस्वती के अनुसार, एक गाय से उसके पूरे जीवनकाल में 4,10,440 मनुष्यों का एक समय का भोजन का प्रबंध हो सकता है, जबकि उसका मांस सिर्फ 80 मांसाहारियों का पेट भर सकता है।
  • गाय एकमात्र पशु ऐसे है जिसका सब कुछ सभी की सेवा में काम आता है। गाय का दूध, दूध से निकला घी, दही, छाछ, मक्खन आदि सभी बहुत ही उपयोगी है। इसके अलावा मूत्र, गोबर भी कई काम आते हैं। गायों के मरने के बाद उसका चर्म फुटवियर के काम तो आता है। गोरोचन पूजा में तो काम आता ही है, इसका कई रोगों में औषधीय उपयोग होता है।
  • पंचगव्य का निर्माण गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर द्वारा किया जाता है। पंचगव्य कई रोगों में लाभदायक है। पंचगव्य द्वारा शरीर की रोग निरोधक क्षमता को बढ़ाकर रोगों को दूर किया जाता है।
  • पंचगव्य के कैंसरनाशक प्रभावों पर यूएस से पेटेंट भारत ने प्राप्त किए हैं। 6 पेटेंट अभी तक गौमूत्र के अनेक प्रभावों पर प्राप्त किए जा चुके हैं।
  • हरित क्रांति से पहले खेतों को गाय के गोबर में गौमूत्र, नीम, धतूरा, आक आदि के पत्तों को मिलाकर बनाए गए कीटनाशक द्वारा किसी भी प्रकार के कीड़ों से बचाया जाता था।
गायें पौराणिक काल से पूजनीय
  • गुरु वशिष्ठ ने गाय के कुल का विस्तार किया और उन्होंने गाय की नई प्रजातियों को भी बनाया, तब गाय की 8 या 10 नस्लें ही थीं जिनका नाम कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदनी, भौमा आदि था।
  • भगवान श्रीकृष्ण ने गाय के महत्व को बढ़ाने के लिए गाय पूजा और गौशालाओं के निर्माण की नये सिरे से नींव रखी थी। भगवान बालकृष्ण ने गायें चराने का कार्य गोपाष्टमी से प्रारंभ किया था।
विज्ञान की नजर में गायें
  • वैज्ञानिक शोधों से पता चला है कि गाय में जितनी सकारात्मक ऊर्जा होती है उतनी किसी अन्य प्राणी में नहीं।
  • गाय की पीठ पर रीढ़ की हड्डी में स्थित सूर्यकेतु स्नायु हानिकारक विकिरण को रोककर वातावरण को स्वच्छ बनाता है। यह पर्यावरण के लिए लाभदायक है।-
  • गाय की रीढ़ में स्थित सूर्यकेतु नाड़ी सर्वरोगनाशक, सर्वविषनाशक होती है।
  • सूर्यकेतु नाड़ी सूर्य के संपर्क में आने पर स्वर्ण का उत्पादन करती है। गाय के शरीर से उत्पन्न यह सोना गाय के दूध, मूत्र व गोबर में मिलता है। यह स्वर्ण दूध या मूत्र पीने से शरीर में जाता है और गोबर के माध्यम से खेतों में। कई रोगियों को स्वर्ण भस्म दिया जाता है।
  • वैज्ञानिक कहते हैं कि गाय एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो ऑक्सीजन ग्रहण करता है और ऑक्सीजन ही छोड़ता है, ‍जबकि मनुष्य सहित सभी प्राणी ऑक्सीजन लेते और कार्बन डाई ऑक्साइड छोड़ते हैं। पेड़-पौधे इसका ठीक उल्टा करते हैं।-
  • देशी गाय के एक ग्राम गोबर में कम से कम 300 करोड़ जीवाणु होते हैं।
  • रूस में गाय के घी से हवन पर वैज्ञानिक प्रयोग किए गए हैं।
  • एक तोला (10 ग्राम) गाय के घी से यज्ञ करने पर एक टन ऑक्सीजन बनती है।
  • गायों को अगर विष दे दिया जाये तो इससे उसकी मृत्यु तो होती ही है, लेकिन जब तक वह जीवित रहती है तब तक उस विष का असर उसके दूध या गोबर तक नहीं पहुंच पाता है, क्योंकि वह भगवान शिव की तरह उस विष को अपने गले में रोक लेती है।
आधुनिक काल में गौवंश रक्षा के प्रयास
  • पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह ने अपने शासनकाल के दौरान राज्य में गौहत्या पर मृत्युदंड का कानून बनाया था।
  • रामचंद्र ‘बीर’ ने 70 दिनों तक गौहत्या पर रोक लगवाने के लिए अनशन किया था।
  • गौवंशीय पशु अधिनियम 1995 के अंतर्गत 10 वर्ष तक का कारावास और 10,000 रुपए तक का जुर्माना है।
मुस्लिम शासकों और अंग्रेजों की गौ-नीति
  • एक जानकारी के अनुसार मुस्लिम शासन के समय गौवध अपवादस्वरूप ही होता था। अधिकांश शासकों ने अपने शासन को मजबूत बनाने और हिन्दुओं में लोकप्रिय होने के लिए गौवध पर प्रतिबंध लगाए थे।
  • इतिहास के पन्नों में जिक्र मिलता है कि मुगल शासक औरंगजेब ने कुरान और हदीश के आदेशों के अनुसार गौवंश की रक्षा के लिए प्रयास किये। गौ हत्या को रोकने के लिए दक्षिण भारत में अधिकारी भी नियुक्त किये थे।
  • अंग्रेजों ने भारत में गौवध को बढ़ावा दिया। अपने इस कुकर्म पर पर्दा डालने के लिए उन्होंने मुस्लिम कसाइयों की नियुक्ति बूचड़खानों में की थी।

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