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Friendship day: दोस्ती और दुश्मनी का Cocktail है ‘Politics’

Friendship day: दोस्ती और दुश्मनी का Cocktail है 'Politics'

राजनीति में कब कौन किसका दुश्मन बन जाए और कब दुश्मन का ही हाथ थाम ले, कहा नहीं जा सकता। यहां न तो कोई किसी का स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन। कल तक जो गलबहियां कर रहे थे, वही आज एक दूसरे को कोस रहे हैं। कल एक दूसरे को हर एक मंच पर गालियां दे रहे थे वे आज दोस्ती की पींगे बढ़ा रहे हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जब राजनेता दोस्त बने फिर दुश्मन और फिर से दोस्त बने हैं।

वैसे तो हर रिश्ते से खास रिश्ता होता है दोस्ती का रिश्ता। इस रिश्ते की कोई ना अबतक व्याख्या कर सका ना ही कर सकेगा। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की जोड़ी ने अपने अथक परिश्रम से देश के सामने एक ऐसा राजनीतिक विकल्प रखा जिसका परिणाम आज सबके सामने है। वर्तमान राजनीति के जय और वीरू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का रिश्ता बहुत पुराना है। ये पिछले 30 साल से एक-दूसरे का साथ दे रहे हैं।

राजनीति अपनी जगह है और रिश्ते अपनी जगह। नीतीश कुमार और लालू यादव की अच्छी दोस्ती है। दोनों  ने एक साथ छात्र राजनीति में कदम रखा और दोनों ने साठ के दशक के आखिर में पटना में एक साथ अपने पैर जमाए।

अमर सिंह को कभी अमिताभ बच्चन के सबसे पक्के दोस्तों में गिना जाता था। हालांकि बाद में दोनों के बीच कुछ मतभेद हो गए।

स्वस्थ प्रजातांत्रिक प्रणाली के लिए  मित्रता है वरदान

वैचारिक भिन्नता के कारण राजनेताओं की दोस्ती में आती कडुवाहट आम जन को शत्रुता के रूप में नजर आती है, परन्तु व्यवहार में इनके रिश्ते सामान्य रहते हैं। हम झारखंड का ही उदाहरण लें, जहां विपक्ष में बैठी भाजपा सदन में सरकार की किसी नीति से असहमत होकर शोरगुल कर सदन की कार्यवाही चलने नहीं देती, लेकिन जब पक्ष –प्रतिपक्ष के नेता बाहर एक दूसरे से मिलते हैं तो उनका अंदाज काफी दोस्ताना होता है। उदहारण के तौर पर हेमंत सोरेन सरकार के खिलाफ बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष किसी नीति के विरोध में आग उगलते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि उनके बीच शत्रुता कायम हो गई। उनकी पारस्परिक मित्रता कायम रहती है। यदि सदन में किसी संवेदनशील मुद्दे पर पक्ष विपक्ष की मित्रता कायम रहे तो स्वस्थ प्रजातांत्रिक प्रणाली कायम करने की ओर कदम बढ़ाए जा सकते हैं।

आ सकती है राजनीति में शुचिता

केंद्र हो या राज्य, पक्ष विपक्ष के नेताओं की बीच वैचारिक भिन्नता हो सकती है, लेकिन उनका आपसी व्यवहार मित्रवत ही होता है। यदि राजनीति में शुचिता की बात की जाए तो मित्रता संसदीय लोकतान्त्रिक प्रणाली के लिए हितकर साबित हो सकती है। आज लोकसभा हो या राज्यसभा, हम देखते हैं कि दोनों के सत्र काफी हंगामेदार होते हैं, जहां आवेश में आकर सदस्य अमर्यादित आचरण पर उतर आते हैं, इससे सदन का कार्य तो बाधित होता ही है, देश की छवि को भी नुकसान पहुंचता है। इस तरह की गतिरोध की समस्याओं का निवारण मित्रवत राजनीतिक व्यवहार से संभव है ।

दुनिया के कई रिश्तों से इतर दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता है जो अपने पार्टनर में लिंग, धर्म और जाति के बंधनों में नहीं देखता। इस  फ्रेंडशिप डे को हर कोई दिल खोलकर मनाता है। यही बात राजनीतिक मतभेदों और मनभेदों  को दूर करने के लिए भी है, जहां  दोस्ती ही सबसे महत्त्वपूर्ण रिश्ता निभा सकती है।

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