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Farm Laws repeal: भीड़तंत्र ऊंचा या लोकतंत्र?

Farm Laws repeal

Farm Laws repeal: लोकतंत्र की मूल भावना है- बहुमत. लेकिन जब चंद लोगों का लाभ (स्वार्थ) हावी हो जाये और देश को उसके आगे झुकना पड़ जाये तो फिर काहे का लोकतंत्र. केंद्र सरकार द्वारा कृषि बिल की वापसी की घोषणा करने के बाद देश के कुछ वर्ग ख़ुशी ज़ाहिर कर रहे हैं. यह सोचने वाली बात है कि बिल वापसी की घोषणा पर ख़ुशी जताना एक तरह से किसानों की ‘बर्बादी का जश्न’ मनाने जैसा है. प्रधानमंत्री मोदी द्वारा तीन कृषि बिल लाये जाने की घोषणा की गई थी, उसके बाद से ही पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों द्वारा इसका विरोध प्रदर्शन शुरू हो चुका था. पंजाब में अमरिंदर सिंह (Amarinder Singh) की सरकार के समर्थन से आंदोलन के नाम पर मोबाइल टावरों पर हमले हुए, रेल की पटरियों पर धरने शुरू किये गये. कृषि कानून के नाम पर किया जा रहा आंदोलन यहीं तक नहीं रुका, दिल्ली के कुछ इलाकों के सड़कों पर कब्ज़ा किया गया.आंदोलन में शामिल लोगों ने एक मज़दूर लखबीर सिंह का हाथ काटकर उसे बेरहमी से मारा, कुछ लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म किया, एक ग्रामीण को ज़िंदा जलाया। इन सारी घटनाओं के अलावा 26 जनवरी को लाल किले पर चढ़ाई कर देश को शर्मिंदा किया. इन सारी घटनाओं से यह स्पष्ट है कि आंदोलन करने वाले वर्ग कृषि कानून के नाम पर देश को तोड़ने का काम कर रहे थे.

सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कानूनों को वापस लेना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण

कृषि कानून वापस लेने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) द्वारा यह कहा गया कि कृषि कानून सरकार इसलिए लेकर आई थी कि किसानों की मदद के लिए बाजार खोले जा सकें. जब कानून पेश किया गया तो शुरुआत में सभी खुश थे, लेकिन कुछ महीनों के बाद इसका विरोध शुरू हो गया. हरियाणा, उत्तर प्रदेश (पश्चिमी) और पंजाब के कुछ किसानों को छोड़कर बाकी के सारे किसान खुश थे. कृषि कानूनों का उद्देश्य यही था कि कृषि और इससे जुड़े बुनियादी ढांचे में ज्यादा से ज्यादा निवेश लाए जाएं. सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त किए गए पैनल की प्रतिक्रिया सामने आई और पैनल के सदस्यों का कहना है कि सरकार का तीन कृषि कानून को इस तरह से वापस लेने का फैसला बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, साथ ही इससे विरोध प्रदर्शन के समाप्त होने की संभावना नहीं है.

सालों पहले कांग्रेस बिल लाने के लिए राज़ी थी, तो अब क्यों कर रही ढोंग

आज से 9 साल पहले यूपीए सरकार ने “Agricultural Produce Inter State Trade and Commerce (Development and Regulation) Bill 2012” तैयार किया था. लेकिन सरकार इस बिल पर आगे नहीं बढ़ पाई थी. इससे स्पष्ट होता है कि कांग्रेस भी सालों पहले किसानों के लिए यही बिल लेकर आ रही थी. बाद में इस पर कई प्रदेश कांग्रेस सरकारों ने भी काम किया. लेकिन आज जब मोदी सरकार वापस से किसानों के लिए उन्हीं बिलों को वापस लाना चाह रही थी तो कांग्रेस ने एकदम से अपना रुख बदलकर इसे किसान विरोधी ठहराना शुरू कर दिया. कांग्रेस के ऐसा करने पर कृषि विशेषज्ञ भी सवाल उठा रहे हैं. वे कह रहे हैं कि जब तक कांग्रेस खुद इन बिलों पर काम कर रही थी, तब तक यह बिल किसानों के हित में था. वहीं अब जब मोदी सरकार उन्हीं बिलों पर वापस से कदम आगे बढ़ाने लगी तो ये बिल किसान विरोधी हो गए हैं?

क्या कृषि कानून वापस लेने की घोषणा मजबूरी में की गई?

प्रधानमंत्री द्वारा दिया गया भावुक बयान, जिसमें उन्होनें कहा कि “शायद हमारी तपस्या में कोई कमी रही होगी, जिस कारण दीये के प्रकाश जैसा सत्य हम कुछ किसानों को समझा नहीं पाएं”, से यह साफ़ स्पष्ट होता है कि कृषि कानून की वापसी की घोषणा मजबूरी में की गई. लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रधानमंत्री ने यह बयान किसके सामने दिया? उस भीड़तंत्र के सामने, जो आंदोलन की आड़ में देश विरोधी कार्य कर के लोकतंत्र को कमज़ोर करते चले गए.

यह बिल लोकसभा और राज्यसभा से पास होकर संसद से पास हुआ था, उसके बाद केंद्र सरकार ने इसे वापस ले लिया, ऐसा करने से यह स्पष्ट होता है कि लोकतंत्र में सही फैसला लेना और उन्हें लागू करना बहुत कठिन है. हालांकि, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा के किसानों को छोड़कर बाकी के 26 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेश के किसान इस बिल के समर्थन में थे. लेकिन देश के मुट्ठी भर किसानों के वजह से यह बिल देश में लागू नहीं हो सका. इन बिलों को वापस लेना यह साफ़ संकेत देता है कि भीड़तंत्र के आगे लोकतंत्र कुछ नहीं है. अगर यही स्थिति रही तो कोई भी बिल या कानून संसद में पेश होगा, और पास होकर जब कानून बनेगा, और उससे पहले अगर कुछ प्रतिशत लोगों को वह बिल मंजूर नहीं होगा, उन्हें पसंद नहीं आएगा तो ज़ाहिर है कि लोग सड़कों पर उतर कर उसका विरोध करेंगे और शायद तब भी देश उस भीड़तंत्र के आगे झुक जाए, हमारी संसद उनके आगे झुक जाए, तब यही सवाल हर देशवासी के मन में खड़ा होगा कि क्या भीड़तंत्र लोकतंत्र से बड़ा है?

यह भी पढ़ें: अमेरिका में लोकतंत्र पर चर्चा: वर्चुअल समिट में भारत को मिला न्योता मगर चीन दरकिनार

 

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