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आस्था या सिस्टम, कौन भारी! भक्तों को चाहिए मंदिर और रेलवे चाह रहा विकास!

Faith or System, Who Is Heavy! Devotees want temple and railway development

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

देवी-देवताओं की भूमि भारत में क्या भगवान पर आफत आ गयी है। धनबाद में हनुमान जी को जहां उन्हें दर-बदर करने की तैयारी है, वहीं छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में उनका पानी बंद किया जा रहा है। ऐसी ही स्थिति रांची में भी है। रांची रेलवे स्टेशन दुर्गा पूजा समिति और रेलवे प्रशासन आमने-सामने आ चुके हैं। रेलवे अपनी जमीन डेवलपमेंट के नाम पर खाली करवाना चाहती है। वही पूजा समिति के लोग दुर्गापूजा के लिए एक स्थाई जगह की मांग कर रहे हैं।

पहले चर्चा धनबाद की कर लें। धनबाद के बेकारबांध क्षेत्र में एक हनुमान मंदिर है। ईस्ट सेन्ट्रल रेलवे प्रशासन ने हनुमान जी को मंदिर खाली करने का नोटिस थमा दिया। नोटिस में हनुमान जी का नाम लिखा है। नोटिस में लिखा है- ‘आपका मंदिर रेलवे की जमीन पर है। वहां अवैध कब्जा किया गया है। नोटिस मिलने के 10 दिनों के अंदर मंदिर हटा लें और जमीन खाली कर दें। नहीं तो आपके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।’ इसे गलती कहें या कुछ और उस पर नोटिस हनुमान जी का ही नाम लिखा गया है। बाद में सीनियर सेक्शन इंजीनियर धनबाद रेल मंडल ने इसे मानवीय भूल बताते हुए कहा कि नोटिस पर गलती से हनुमान जी का नाम लिख दिया गया है। इसे सुधार किया जाएगा। धनबाद जैसा ही एक मामला छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में भी सामने आया है जहां पानी के टैक्स के लिए हनुमान जी को नोटिस दिया गया है।

अब बात करते हैं रांची की। रांची रेलवे स्टेशन के निकट रेलवे की जमीन पर बना हनुमान मंदिर रेलवे प्रशासन हटाना चाह रहा है। वहीं रेलवे स्टेशन पर ही वर्षों से दुर्गापूजा होती आ रही है। रेलवे अब नहीं चाहता कि उसकी जमीन पर दुर्गा पूजा हो। पूजा समिति के अध्यक्ष मुनचुन राय कहते हैं कि हमलोग हर तरह से रेलवे कों सहयोग करने कों तैयार हैं। बस रेल प्रशासन एक जगह निर्धारित कर दे, हम वहीं पर दुर्गापूजा किया करेंगे। रांची दुर्गा पूजा महानगर अध्यक्ष अशोक चौधरी ने कहा कि अगर रेलवे के द्वारा कोई कार्रवाई की जाती है तो सड़क पर समिति को उतरना पड़ेगा। जबकि बीजेपी महानगर अध्यक्ष केके गुप्ता ने कहा कि इस ढांचे कों गिराने में कोई आपत्ति नहीं, बस हम डीआरएम से  पूजा की चिह्नित जमीन कों लिखित तौर पर मांग रहे है।

धार्मिक मामलों का क्या है समाधान!

धार्मिक मामले, खास कर भारत में, काफी संवेदनशील हो जाते हैं। कही-कहीं तो लोग सूझ-बूझ का परिचय देकर परिस्थितियों को स्वीकार कर लेते हैं, कहीं-कहीं स्थिति विस्फोटक हो जाती है। धनबाद की स्थिति तो विस्फोटक हो सकती है, क्योंकि वहां के लोग इस बात पर अड़े हुए हैं कि वे 70 सालों से वहां पूजा करते आ रहे हैं। यानी देश आजाद होने के बाद यह मंदिर वहां अस्तित्व में आया था। उस समय तो रेलवे का आज की तरह विस्तार भी नहीं हुआ था। रेलवे के विकास के लिए जब सर्वे हो रहा होगा तब क्या इस मंदिर के वहां होने पर किसी का ध्यान नहीं गया था? स्थानीय लोगों द्वारा इसे नजरअंदाज किया गया या चूक रेलवे के द्वारा की गयी? गलती चाहे किसी की भी हो, अब तो बात खमियाजा भुगतने पर आ गयी है। वह भी खमियाजा कौन भुगते, जनता या रेलवे? रांची में तो लोग समझदारी का परिचय दे रहे हैं, यहां के स्थायी मंदिर के लिए नहीं, बल्कि पूजा के लिए वैकल्पिक जगह की मांग कर रहे हैं। अब रेलवे से समझदारी की उम्मीद की जा रही है ताकि समस्या का आसानी से स्थायी निकारण हो सके।

पहले भी हटाये गये हैं धर्मस्थल

देश की आबादी जिस प्रकार बढ़ रही है, उनकी आवश्यकताएं जिस प्रकार बढ़ रही हैं तो ऐसे में रेलवे ही नहीं, अन्य क्षेत्रों में भी विकास की कई योजनाओं की जरूरत पड़ती रहती है। यह विकास का क्रम तो सदैव जारी रहेगा। धर्म के प्रति आस्था रखना कोई अपराध नहीं है। धर्म हमारे लिए जरूरी है तो हमें हर पल विकास भी चाहिए। इसले रास्ते भी तो इन्हीं के बीच से बनाने पड़ेंगे। भारत में धार्मिक स्थल बनाते समय इस बात का कतई ध्यान नहीं दिया जाता कि शहर की प्लानिंग क्या है। धर्मस्थल कहां बनाया जाये जिससे कभी असहूलियत न हो। साथ ही आगे की विकास योजनाओं में कोई परेशानी नहीं आये।

आज देशभर में सड़क और रेल सेवाओं में जिस तरह का काम चल रहा है, उसमें एक नहीं कई बार गांवों-शहरों के घरों पर तो बुलडोजर चले ही हैं, धर्मस्थलों को हटाया भी गया है और उन्हें शिफ्ट भी किया गया है। जब भी धर्मस्थलों को हटाने की बात आती है, हमारी आत्मा आहत हो जाती है, होनी भी चाहिए। पेड़-पौधों में भी तो हमारे देवी-देवताओं का वास है, उन्हें जब हम अपने ही हाथों से नष्ट कर देते हैं, पीड़ा तब भी हो तब समझा जा सकता है कि हम अपने सच्चे धार्मिक हैं। यह भी याद रखना चाहिए, हमारे घरों में भी मंदिर बनते हैं। हम अपने घरों में कई बार तोड़-फोड़ करते हैं, घर के मंदिरों को भी अपने हाथों से हटाते हैं। यह भी हमारे विकास का ही एक रूप है।

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