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Congress पार्टी में ‘आपातकाल’ लागू, नेतृत्व को अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं, पार्टी में ‘लोकतंत्र’ खत्म

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न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

कांग्रेस के नेतृत्व और नेता भाजपा की जितनी चाहे आलोचना कर लें, उनपर जितने चाहे हमले कर लें, पार्टी को मंजूर है, लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व को अपनी आलोचना सुनना मंजूर नहीं। चाहे उनकी गलतियों की वजह से पार्टी रसातल में चली जाये, कोई भी उनकी गलतियां नहीं गिना सकता। कांग्रेस को देश के अंदर लोकतंत्र चाहिए, लेकिन पार्टी के अंदर नहीं। ऐसा इसलिए समझा जा रहा है, क्योंकि पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने वालों के लिए अब फॉर्म में यह शपथनामा देना होगा कि ‘चाहे कुछ भी हो जाये’, सार्वजनिक मंचों से पार्टी की आलोचना नहीं करेंगे।

अपने ही नेताओं के निशाने पर है पार्टी नेतृत्व

2019 लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से कांग्रेस (Congress) नेतृत्व अंदरूनी स्तर पर अपने ही नेताओं की आलोचना झेल रहा है। खासकर जी-23 समूह (G-23 Group) ने तो कांग्रेस आलाकमान को ही निशाने पर ले रखा है। इस उपाय को इसी का काट समझा जा रहा है। अब पार्टी की प्राथमिक सदस्यता लेने वालों को हलफनामा देना होगा कि वह सार्वजनिक मंचों पर कभी भी पार्टी की नीतियों एवं कार्यक्रमों की आलोचना नहीं करेंगे। पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी भाजपा पर हमला करते हुए अपनी पार्टी के लोकतांत्रिक स्वरूप का बखान तो करते हैं, लेकिन ऐसा दूसरों को समझाने के लिए है, खुद के लिए नहीं।

नये सदस्यता फॉर्म में नया शपथनामा

नये सदस्यों को कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण करते समय अपनी वचनबद्धता स्पष्ट करनी होगी। कांग्रेस के नये मेंबरशिप फॉर्म में लिखा है, ‘मैं धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और लोकतंत्र के सिद्धांतों को बढ़ावा देने के लिए सदस्यता लेता हूं। मैं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, खुले तौर पर या किसी तरह से पार्टी मंचों के अलावा, पार्टी की स्वीकृत नीतियों और कार्यक्रमों की आलोचना नहीं करूंगा।’ इसके अलावा कुछ शर्तें भी नये सदस्यता फॉर्म में दी गयी हैं।

क्यों मंजूर नहीं है आलोचना?

एक तो कांग्रेस जी-23 नेताओं की बार-बार की आलोचना से परेशान है। जी-23 संगठनात्मक ढांचे पर सवाल उठाते हुए अध्यक्ष समेत अन्य पदों पर चुनाव कराने की लगातार मांग करता आ रहा है। यही बात पार्टी नेतृत्व को चुभ जा रही है कि चुनाव की स्थिति में उनके ‘परिवारवाद’ की रक्षा कैसे हो पायेगी। पार्टी नेता कपिल सिब्बल का बयान भी काबिले गौर है कि ‘पार्टी के नेता इस बात से अनजान हैं कि पार्टी में कौन निर्णय ले रहा है, क्योंकि यहां तो कोई अध्यक्ष है ही नहीं।’ गुलाम नबी आजाद पहले भी अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक आहूत करने और सीडब्ल्यूसी सदस्यों, केंद्रीय चुनाव समिति (सीईसी) के सदस्यों और संसदीय बोर्ड चुनावों के लिए चुनाव की मांग कर चुके हैं। मगर कांग्रेस नेतृत्व कान में तेल डाले बैठा है।

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