उर्दू शायरी की दुनिया से एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। मशहूर शायर, आधुनिक गजल के बेमिसाल उस्ताद और पद्मश्री से सम्मानित डॉ. बशीर बद्र का लंबी बीमारी के बाद गुरुवार को निधन हो गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्य, कला और उर्दू अदब से जुड़े लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। दुनिया भर में फैले उनके चाहने वाले इस खबर से गमगीन हैं।

डॉ. बशीर बद्र ने अपनी शायरी के जरिए मोहब्बत, जुदाई, अकेलेपन और जिंदगी के छोटे-छोटे दर्द को बेहद खूबसूरती से बयान किया। उनके शेर आम लोगों की जिंदगी से जुड़े होते थे, इसलिए हर उम्र और हर तबके के लोग उनसे खुद को जोड़ पाते थे।

उनका मशहूर शेर –
“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से…”
आज भी लोगों की जुबान पर रहता है। उनकी ग़ज़लों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे मुश्किल अल्फाज़ के बजाय आसान भाषा में गहरी बातें कह जाते थे। यही वजह रही कि उनकी शायरी सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि आम लोगों के दिलों में बस गई।

अयोध्या से शुरू हुआ शायरी का सफर

डॉ. बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को उत्तर प्रदेश के अयोध्या में हुआ था। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीए, एमए और पीएचडी की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के बाद उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लेक्चरर के रूप में की।

बाद में वे मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के प्रमुख और लेक्चरर रहे, जहां उन्होंने लगभग 17 वर्षों तक शिक्षण कार्य किया। वे उर्दू, फारसी, हिंदी और अंग्रेजी भाषा पर शानदार पकड़ रखते थे।

कहा जाता है कि उन्होंने महज सात साल की उम्र से शायरी लिखना शुरू कर दिया था। बचपन से शुरू हुआ यह सफर उन्हें उर्दू अदब की सबसे बड़ी हस्तियों में शामिल कर गया।

आधुनिक उर्दू गजल के सबसे लोकप्रिय शायर

बशीर बद्र को आधुनिक उर्दू गजल का सबसे लोकप्रिय और आसान भाषा में लिखने वाला शायर माना जाता है। उन्होंने उर्दू शायरी को सिर्फ साहित्यिक हलकों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि आम पाठकों तक पहुंचाया।

उनकी ग़ज़लों में जिंदगी की सच्चाई, रिश्तों की गर्माहट और इंसानी एहसासों की गहराई साफ दिखाई देती थी। यही वजह थी कि उनकी शायरी युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक हर किसी के दिल को छू जाती थी।

किस बीमारी से जूझ रहे थे बशीर बद्र?

मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र लंबे समय से उम्र संबंधी बीमारियों और याददाश्त से जुड़ी समस्या डिमेंशिया से जूझ रहे थे। पिछले कई वर्षों से उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी और वे सार्वजनिक कार्यक्रमों से भी दूर हो गए थे।

भोपाल में इलाज के दौरान लंबी बीमारी की वजह से उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद साहित्य जगत में शोक की लहर है और सोशल मीडिया पर लोग उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहे हैं।

हमेशा जिंदा रहेंगी बशीर बद्र की गजलें

डॉ. बशीर बद्र भले ही अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनकी शायरी हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी। उनकी गजलें आने वाली पीढ़ियों को भी मोहब्बत, इंसानियत और जिंदगी के एहसास सिखाती रहेंगी।

उर्दू अदब की दुनिया में उनका जाना एक ऐसा नुकसान माना जा रहा है, जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो पाएगी।