रांची। असम में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक सरगर्मी तेज होती नजर आ रही है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के अध्यक्ष और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की असम में सक्रियता ने सियासी चर्चाओं को नया मोड़ दे दिया है। उनके हालिया दौरे को आदिवासी और चाय बागान समुदाय के बीच राजनीतिक पकड़ मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
तिनसुकिया में आदिवासी महासभा को किया संबोधित
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन एक फरवरी को असम के तिनसुकिया जिले पहुंचे, जहां उन्होंने ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ असम द्वारा आयोजित आदिवासी महासभा को संबोधित किया। इस कार्यक्रम में करीब 30 हजार से अधिक लोगों की मौजूदगी रही।
सभा के दौरान आदिवासी एकता, पहचान और अधिकारों को लेकर खुलकर बात की गई, जिससे कार्यक्रम केवल सामाजिक नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश का मंच भी बन गया।
आदिवासियों से एकजुट होकर मतदान की अपील
अपने संबोधन में हेमंत सोरेन ने आदिवासी समुदाय से एकजुट होकर मतदान करने की अपील की। उन्होंने कहा कि यदि आदिवासी संगठित हो जाएं, तो असम की राजनीति की दिशा बदल सकती है।
उन्होंने झारखंड मॉडल का उदाहरण देते हुए कहा कि राजनीतिक सशक्तिकरण से आदिवासी परिवारों को कल्याणकारी योजनाएं, वित्तीय सहायता और सामाजिक सुरक्षा मिल सकती है।
चाय बागान मजदूरों की मजदूरी पर उठाए सवाल
हेमंत सोरेन ने असम के चाय बागान मजदूरों की स्थिति को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि वैश्विक चाय उद्योग आदिवासी श्रम पर निर्भर है, लेकिन इसके बावजूद मजदूरों को आज भी न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल पा रही है।
उन्होंने बताया कि जहां अन्य राज्यों में चाय मजदूरों को 400 से 500 रुपये प्रतिदिन मजदूरी मिलती है, वहीं असम में यह अब भी करीब 250 रुपये तक सीमित है।
पहले भी असम गया था JMM का प्रतिनिधिमंडल
झामुमो की यह पहल अचानक नहीं है। जनवरी महीने में झामुमो का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल असम दौरे पर गया था, जिसमें जनजातीय कार्य मंत्री चमरा लिंडा, सांसद विजय हांसदा और विधायक एमटी राजा व भूषण तिर्की शामिल थे।
इस दौरान आदिवासी नेताओं के साथ बंद कमरे में बैठकों में भूमि अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य, चाय बागान मजदूरी और पूर्ण अनुसूचित जनजाति (ST) दर्जे जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई।
35–40 विधानसभा सीटों पर नजर
JMM असम की लगभग 35 से 40 विधानसभा सीटों का आकलन कर रही है, जहां आदिवासी और चाय बागान मजदूर निर्णायक भूमिका में हैं।
असम में आदिवासी आबादी करीब 70 लाख बताई जाती है, लेकिन 2011 की जनगणना के अनुसार केवल 38.8 लाख लोगों को ही अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला है।
भाजपा ने जताई आपत्ति
वहीं, सत्तारूढ़ भाजपा ने झामुमो की मौजूदगी को कमतर बताते हुए कहा है कि असम में JMM की कोई मजबूत सांगठनिक पकड़ नहीं है।
हालांकि झामुमो महासचिव विनोद पांडेय का कहना है कि यह दौरा जमीनी हकीकत समझने के लिए किया गया है और चुनावी फैसले शीर्ष नेतृत्व स्तर पर लिए जाएंगे।
असम की राजनीति में बढ़ सकता है JMM का दखल
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि आदिवासी और चाय बागान समुदाय JMM के साथ लामबंद होता है, तो असम की कई सीटों पर चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।
हेमंत सोरेन की सक्रियता ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि असम की राजनीति में आने वाले दिनों में नया समीकरण देखने को मिल सकता है।