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Destruction in Uttarakhand: बादल फटना प्राकृतिक घटना, पर्वतीय क्षेत्रों में तबाही मानव दखल का नतीजा

Destruction in Uttarakhand

न्यू डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

दक्षिण भारत के केरल में भारी तबाही के बाद उत्तर भारत का एक और राज्य उत्तराखंड भारी बारिश के कारण भारी तबाही झेल रहा है। उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र में मूसलधार बारिश होने से 47 या उससे अधिक लोगों की मौत की खबर है। भारी बारिश ने यहां भारी तबाही मचाई है। कई मकान भी ढह गये। जन-हानि के साथ भारी धन-हानि हुई है। मौसम विभाग तो यह भी कह रहा है कि बुधवार को भी प्रदेश के कई इलाकों में भारी बारिश के आसार बने हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी फोन पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से बात की और स्थिति का जायजा लिया तथा हरसंभव सहायता का आश्वासन दिया। सेना उत्तराखंड के प्रभावित इलाकों में जोर-शोर से राहत कार्य कर रही है।

पहाड़ी इलाके क्यों झेलते हैं भारी बारिश की भारी तबाही?

उत्तराखंड ही नहीं, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर जैसे पहाड़ी इलाकों को बार-बार भारी बारिश की तबाही लगातार झेलनी पड़ती है। ये राज्य भारी बारिश की जो तबाही झेलते हैं, इसे आमतौर पर क्लाउडबर्स्ट यानी बदल फटने की घटना कहा जाता है। बादल फटने की घटनाएं प्राकृतिक घटनाएं हैं, हालांकि इनकी भविष्यवाणी करना कठिन है।

मौसम विज्ञान के अनुसार जब बादल भारी मात्रा में आर्द्रता यानी पानी लेकर आसमान में चलते हैं और उनकी राह में कोई बाधा आ जाती है, तब वह अचानक फट पड़ते हैं। इस स्थिति में एक सीमित इलाके में कई लाख लीटर पानी एक साथ पृथ्वी पर आ गिरता है, जिसके कारण उस क्षेत्र में तेज बहाव वाली बाढ़ आ जाती है। इस पानी के रास्ते में आने वाली हर वस्तु क्षतिग्रस्‍त हो जाती है। भारत में हिमालय पर्वत एक बड़े अवरोधक के रूप में सामने पड़ता है, इसलिए इसके आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में बादल फटने की घटनाएं ज्यादा होती हैं।

बादल फटने की घटना का दूसरा कारण है, गर्म हवा। गर्म हवा के झोंकों से बादलों के फट पड़ने की आशंका बढ़ जाती है। जब बादल किसी गर्म हवा क्षेत्र से गुजरते हैं तब अचानक आये तापमान में अंतर से ये बादल फट पड़ते हैं। उदाहरण के तौर पर 26 जुलाई 2005 को मुंबई में बादल फटे थे, तब वहां बादल किसी ठोस वस्‍तु से नहीं, बल्कि गर्म हवा से टकराये थे।

बादल फटने पर 100 मिलीमीटर प्रति घंटे की दर से पानी बरस जाता है। इस दौरान इतना पानी बरसता है कि क्षेत्र में बाढ़ जैसे हालात पैदा हो जाते हैं। बादल फटने की घटनाएं ज्यादातर समुद्र तल से 1,000-2,500 मीटर की ऊंचाई पर होती हैं।

पहाड़ों पर ही क्‍यों ज्‍यादा बादल फटते हैं?

पानी से भरे बादल जब हवा के साथ आगे बढ़ते हैं तो पहाड़ों के बीच फंस जाते हैं। पहाड़ों की ऊंचाई इसे आगे नहीं बढ़ने देती है। पहाड़ों के बीच फंसते ही बादल पानी के रूप में परिवर्तित होकर बरसने लगते हैं। बादलों की डेंसिटी बहुत ज्यादा होने से बहुत तेज बारिश होती है। कुछ ही मिनट में 2 सेंटीमीटर से ज्यादा बारिश हो जाती है।

तबाही के लिए मानव ही जिम्मवार!

इस बात को इस तरह समझें! जब भी कहीं कोई आतंकी घटना होती है तब कोई न कोई आतंकी संगठन उन घटनाओं की जिम्मेवारी लेता है। लेकिन विडम्बना देखिये, पर्वतीय क्षेत्रों में बार-बार विनाश की घटनाएं हो रही हैं, उसके विनाश की चर्चा खूब होती है। लेकिन बार-बार विनाश की घटनाएं क्यों हो रही हैं, उसकी चर्चा बिल्कुल नहीं होती। आखिर इसकी चर्चा क्यों हो, क्योंकि जवाबदेह तो खुद मानव है। और मानव अपनी गलती क्यों स्वीकार करेगा?

मानव स्वभाव से धर्मप्रिय है। अपना धर्म सबको प्रिय होता है, लेकिन धर्म जो शिक्षाएं देते हैं, उस पर मानव को अमल करना नहीं आता। हम सभी टीवी पर कई सीरियल देखते हैं। टीवी सीरियलों में धार्मिक सीरियल भी होते हैं। इन्हीं धार्मिक सीरियलों पर अगर किसी ने गौर किया होगा तो यह बात जरूर जेहन में होगी कि भगवान शिव कैलाश पर्वत वासी हैं। मगर उन्होंने कैलाश पर्वत पर स्थायी घर बनाने का हमेशा विरोध किया। रावण ने कैलाश पर्वत पर कई बार भगवान शिव के लिए घर बनाने का प्रयास किया। लेकिन शिवजी कभी भी इसके लिए तैयार नहीं हुए। रावण ने जिस सोने की लंका का निर्माण किया था, वह दरअसल भगवान शिव के लिए किया था। बाद में रावण ने शिवजी से उसे अपने लिए मांग लिया।

इस कहानी का तात्पर्य यही है कि भगवान शिव पर्वतीय क्षेत्रों में अस्थायी आवास बनाने के विरोधी थे। लेकिन यह शिक्षा मानव की समझ में नहीं आयी। इसे सिर्फ कहानी मान कर भूल गया। इनसान भूल सकता है, प्रकृति नहीं। क्योंकि सारे नियम तो उसी के बनाये हुए हैं। जिस बादल फटने की घटना का जिक्र ऊपर किया गया है, वह तो प्राकृतिक है। इनसान वहां रहे या न हे ये प्राकृतिक घटनाएं वहां होती ही रहेंगी। उस प्राकृतिक विभीषिका को झेलना है या नहीं, यह तो इनसान को सोचना है। और इनसान ने नहीं सोचा…। इनसान इन पर्वतों पर रहेगा तो ये पर्वत उन्हें यहां चैन से रहने नहीं देंगे।

सामान्य-सा उदाहरण हम अपने आसपास का भी ले सकते हैं। बढ़ती हुई आबादी का बोझ इतना हो गया है कि लोग जहां-तहां घर बना लेते हैं। घर बनाते समय यह नहीं सोचते कि जहां वे घर बना रहे हैं, वहां उन्हें कौन-कौन सी परेशानियां झेलनी पड़ सकती हैं। बरसात का मौसम आता है और जब उनके घरों में पानी घुस जाता है तब उन्हें अपनी गलती का असहास थोड़ा कम, लेकिन दूसरों (सरकार) को कोसना ज्यादा होता है। ऐसा ही इन पर्वतीय इलाकों के साथ है। मानव ने रहने के लिए बस्तियां भी बनायीं और छोटी ही नहीं, बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को पर्वतों के सीने पर लाद दिया। पानी को रोकने के लिए बड़े-बड़े डैम बना लिये हैं। बिजली उत्पादन के लिए विद्युत परियोजनाएं यहां स्थापित कर दी गयी है। अब पर्वत मानवों की भूलों का बोझ सहन नहीं कर पा रहे हैं तब चीखें मानवों की ही चीखें निकलने लगी हैं। मानव अब दोष दे तो किसे? भूल करते-करते मानव इतनी दूर निकल गया है कि उसके लिए वापस लौटना मुश्किल हो गया है। अब इन त्रासदियों के बीच रहना इनसान की नियती बन चुकी है।

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