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पुण्यतिथि विशेष: दलितों की आवाज थे Dr. Bhimrao Ambedkar, किया था छुआछूत का विरोध

Bhimrao Ambedkar Death Anniversary

Bhimrao Ambedkar Death Anniversary: भारत के संविधान निर्माता भीमराव रामजी अंबडेकर (Dr. Bhimrao Ambedkar) की आज, यानी 6 दिसंबर को 65वीं पुण्यतिथि है. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी गरीब, दलित, पिछड़े वर्ग के उत्थान और जातिवाद को खत्म करने में अर्पित की थी. भारतीय राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री, और समाजसुधारक अंबेडकर का जीवन संघर्षों से भरा रहा. प्रतिष्ठित विद्वान होने के बावजूद बाबा साहेब ने दुनिया के कई देशों से मिले नौकरी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया. उनका कहना था कि वह सबसे पहले एक भारतीय हैं, फिर उनका पूरा जीवन देश के गरीबों और पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए न्योछावर है और उनका उद्देश्य समाज में समानता का भाव लाना है.

समान भाव से हो समाज का विकास

बाबासाहब ने जीवन भर छुआछूत का विरोध किया. उन्होंने दलित समाज के सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिए विभिन्न योगदान दिए. बाबा साहेब का कहना था कि राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अंतर भुलाकर उनमें सामाजिक भ्रातृत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाए. आज समाज में यह भेद ख़त्म होता दिख रहा है. इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमें 2019 के महाकुंभ के दौरान देखने को मिला जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनुसूचित जाति के लोगों के पैर धोकर पूरे विश्व को भारत की नयी तस्वीर दिखायी. बाबा साहेब ने हमें संविधान दिया, और जब लोगों ने भारत का संविधान पढ़ा तो यह जाना कि भारत का संविधान दुनिया के श्रेष्ठ संविधानों में से एक है.

बचपन में जब बाबा साहेब का हुआ छुआछूत से सामना

बाबासाहेब को बचपन से ही ऊंच -नीच, छुआछूत से जूझना पड़ा था. विद्यालय से लेकर नौकरी करने तक उनके साथ भेदभाव होता रहा. इस भेदभाव के बाद भी वह रुके नहीं और उन्होंने छुआछूत का समूल नाश करने की ठान ली. उनके अनुसार जनजाति एवं दलित के लिए देश में एक अलग चुनाव प्रणाली होनी चाहिए. देशभर में घूम-घूम कर उन्होंने दलितों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई और लोगों को जागरूक किया. बाबासाहब ने अपने पूरे जीवन छुआछूत का विरोध किया. उन्होंने दलित समाज के लिए कई सरहानीय कार्य किए. उनका कहना था, “आप स्वयं को अस्पृश्य न मानें अपना घर साफ रखें और घिनौने रीति-रिवाजों को छोड़ दें. हमारे पास यह आजादी इसलिए है ताकि हम उन चीजों को सुधार सकें जो सामाजिक व्यवस्था, असमानता, भेद-भाव और अन्य चीजों से भरी हैं जो हमारे मौलिक अधिकारों की विरोधी हैं. राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अंतर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातृत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाए.

जब बाबा साहेब ने अपनाया बौद्ध धर्म

बाबा साहेब का बचपन अत्यंत संस्कारी एवं धार्मिक माहौल में बीता था. इस वजह से उन्हें श्रेष्ठ संस्कार मिले. उनके अनुसार वह एक ऐसे धर्म को मानना चाहते थे जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाए. वर्ष 1950 में वह एक बौद्धिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका गए जहां वह बौद्ध धर्म से अत्यधिक प्रभावित हुए और भारत लौटने के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक भी लिखी थी.

इसके बाद उन्होंने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया. वर्ष 1955 में उन्होंने भारतीय बौद्ध महासभा की स्थापना की और 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने एक आम सभा आयोजित की जिसमें उनके पांच लाख समर्थकों ने बौद्ध धर्म अपनाया. कुछ समय के बाद 6 दिसंबर, 1956 को उनका निधन हो गया. उनका अंतिम संस्कार बौद्ध धर्म की रीति के अनुसार किया गया. वर्ष 1990 में मरणोपरांत उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

Bhimrao Ambedkar Death Anniversary

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