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Cyrus Mistry funeral: न जलाकर, न दफना कर…पारसी समुदाय में आसमान को शव सौंप ऐसे होता है अंतिम संस्कार

image source : social media

Cyrus Mistry funeral: टाटा संस के पूर्व चेयरमैन सायरस मिस्त्री (Cyrus Mistry) का रविवार को एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया। यदि मिस्त्री की अंतिम क्रिया की बात करें तो हजारों साल पहले पर्शिया (ईरान) से भारत आये पारसी समुदाय में शव को न तो हिंदू धर्म की तरह जलाया जाता है और न ही मुस्लिम या ईसाई धर्मावलंबियों की तरह दफनाया जाता है। सायरस पारसी समुदाय से आते हैं। लेकिन उनका अंतिम संस्कार पारसी परंपरा के अनुसार नहीं किया गया।

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पारसी समुदाय की मान्यता 

इन सब से अलग, पारसी धर्म की मान्यता के अनुसार अग्नि, जल और धरती तीनों ही पवित्र होते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शव को जलाने से अग्नि तत्व अपवित्र हो जाता है, इसे नदी में प्रवाहित करने से जल तत्व और दफनाने से पृथ्वी तत्व प्रदूषित होता है। इसलिए इस धर्म में मृत्यु के बाद शव को आसमान को सौंप देने का प्रावधान है। कहा जाता है कि पारसी परंपरा में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया काफी जटिल होती है। हिंदू धर्म में शव को अग्नि या जल को सौंपा जाता है, मुस्लिम और ईसाई समुदाय में शव को दफन कर दिया जाता है, लेकिन पारसी समुदाय में ऐसा नहीं होता है।

…इसलिए आसमान को सौंप दिया जाता है शव 

पारसी समुदाय में अंतिम संस्कार का तरीका बिल्कुल ही अलग होता है। पारसी लोग अग्नि को देवता मानते हैं। इसी तरह जल और धरती को भी पवित्र मानते हैं। जबकि शव को अपवित्र माना जाता है। ऐसे में उनका मानना है कि शव को जलाने, प्रवाहित करने या दफन करने से अग्नि, जल या धरती अपवित्र हो जाती है। ऐसा करने से ईश्वर की संरचना प्रदूषित होती है। इसलिए पारसी समुदाय में शव को आसमान को सौंप दिया जाता है।

क्या है “दखमा” या Tower of Silence 

पारसी लोग शव आसमान को सौंपने के लिए टावर ऑफ साइलेंस (tower of silence) बनाते हैं, जिसे दखमा (Dakhma) भी कहा जाता है। ये एक बड़ा सा गोलाकार कढ़ाई की तरह कुआं बना होता है। इसमें शव को सूरज की रोशनी में पारसी लोग ले जाकर छोड़ देते हैं। जिसे बाद में गिद्ध, चील, कौए खा जाते हैं। दुनियाभर में पारसी समुदाय से जुड़े लोगों की आबादी करीब डेढ़ लाख है। इनमें से ज्यादातर मुंबई में रहते हैं। यही कारण है कि मुंबई के बाहरी इलाके में टावर ऑफ साइलेंस बनाया गया है।

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सायरस मिस्त्री के लिए इसलिए बदली परंपरा

दरअसल दखमा में रखे शव को ज्यादातर गिद्ध ही खाते हैं। पिछले कुछ सालों में गिद्धों की संख्या तेजी से घट गई है। अब ज्यादा गिद्ध नहीं दिखते हैं। पारसी समुदाय के लिए यही चिंता का विषय है। अब पारसी लोगों को इस पद्धति से अंतिम संस्कार करने में कठिनाई  आ रही है। क्योंकि, शव को खाने के लिए गिद्ध नहीं पहुंचते तो यह सड़ जाता है। इसके चलते दूर-दूर तक बदबू फैल जाती है और बीमारी फैलने का भी डर होता है।

विद्युत शवदाहगृह में हुआ अंतिम संस्कार

दुनिया की बढ़ती रफ्तार के साथ पारसी समुदाय के लोगों को अंतिम संस्कार के लिए एक नई परेशानी का सामना भी करना पड़ रहा है। कोरोनाकाल के दौरान भी ये मुद्दा उठा था। उस दौरान भी पारसी धर्म गुरु चाहते थे कि इसी पद्धति से शवों का अंतिम संस्कार किया जाए, लेकिन ये कोविड नियमों के अनुरूप नहीं था। विशेषज्ञों ने इसके लिए तर्क दिया कि इस तरह से संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाएगा। पक्षियों में भी संक्रमण फैल सकता है। ऐसे में यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा। अब बहुत पारसी समुदाय के बहुत से लोग विद्युत शवदाहगृह में अंतिम संस्कार करा रहे हैं। सायरस मिस्त्री का अंतिम संस्कार भी विद्युत शवदाहगृह में ही हुआ।

अब शवों को जलाकर अंतिम संस्कार भी कर रहे हैं पारसी 

पिछले कुछ सालों में कुछ पारसी लोग अपने रिवाज को छोड़कर शवों को जलाकर अंतिम संस्कार भी कर रहे हैं। ये लोग शवों को अब टावर ऑफ साइलेंस के ऊपर नहीं रखते हैं बल्कि हिंदू श्मशान घाट या विद्युत शवदाह गृह में ले जाते हैं।

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