समाचार प्लस
Breaking अंतरराष्ट्रीय देश फीचर्ड न्यूज़ स्लाइडर

World Mental Health Day: कोरोना ने बढ़ा दी है समस्या, पहले से ज्यादा सचेत रहने की जरूरत

कोरोना ने बढ़ा दी है मानसिक स्वास्थ्य की समस्या ज्यादा सचेत रहने की जरूरत

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

आज ‘विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस’ है। कोरोना महामारी काल में इस दिवस की आवश्यकता को और भी गहरे रूप से समझा जा सकता है। वैसे तो मानसिक स्वास्थ्य खुद ही एक बीमारी है, लेकिन कोरोना ने इसे और बढ़ाया है। कोरोना महामारी ने लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला है। इसी को ध्यान में रखकर इस साल ‘वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे; की थीम ‘सभी के लिए मानसिक स्वास्थ्य’ रखा गया है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य, जो लोग मानसिक दिक्कतों से गुजर रहे हैं उनके बीच जागरूकता फैलाना है। ताकि लोग अपनी मानसिक परेशानियों के प्रति जागरूक हों और समय पर डॉक्टर्स की सलाह ले सकें। क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य समस्या वाले लोगों की देखभाल की निरंतर जरूरत होती है।

मानसिक बीमारी पर नजर रखने वाले ‘वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेंटल हेल्थ’ का कहना है कि कम आय वालों तक मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुंच पाती हैं, उन तक कैसे सेवाएं पहुंच सकें इसका प्रयास किया जा रहा है। ‘सभी के लिए मानसिक स्वास्थ्य’ थीम रखने का उसका उद्देश्य भी यही है। फेडरेशन के अनुसार, 75% से 95% मानसिक डिसऑर्डर वाले लोग निम्न और मध्यम आय वाले हैं। मानसिक रोग से ग्रस्त बहुत से लोगों को वह इलाज नहीं मिलता, जिसके वे हकदार हैं।

क्या कहता है विश्व स्वास्थ्य संगठन?

मानसिक स्वास्थ्य के सम्बंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि दुनिया भर में करीब 28 करोड़ लोग डिप्रेशन से पीड़ित हैं। यहां तक कि बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं। दुनिया के 5 बच्चों में से करीब 1 को मानसिक डिसऑर्डर है। भारत के संबंध में ‘द ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी के 1990-2017’ के अध्ययन के अनुसार, भारत में 197.3 मिलियन लोग विभिन्न मानसिक डिसऑर्डर से पीड़ित थे। जो कि 7 भारतीयों में से 1 का अनुपात है। भारत में कुल बीमारी का बोझ 1990 में 2.5% से बढ़कर 2017 में 4.7% हो गया।

नेशनल सर्वे में भारत की क्या है स्थिति?

साल 2015-16 में हुए एक नेशनल सर्वे के अनुसार, भारत में हर 8 में एक व्यक्ति यानी करीब 17.5 करोड़ लोग, किसी एक तरह की मानसिक बीमारी से प्रभावित हैं। इनमें से 2.5 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो गंभीर बीमारी से प्रभावित हैं, जिन्हें मनोचिकित्सक द्वारा नियमित इलाज की जरूरत है और बाकी बचे 15 करोड़ लोगों को, जिन्हें गंभीर मानसिक बीमारी नहीं है, उन्हें भी मजबूत और सुचारू आम स्वास्थ्य सेवाओं से फायदा मिल सकता है। परिवार और स्वास्थ्य मंत्रालय के सर्वे में भी कहा गया है कि भारत में हर 12 में से एक बुजुर्ग व्यक्ति में डिप्रेशन के लक्षण हैं।

मानसिक स्वास्थ्य का लचर बुनियादी ढांचा

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की सबसे बड़ी दिक्कत यहां का बुनियादी स्वास्थ्य ढांचा काफी लचर है। 2018 में लोकसभा में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार, भारत में 20,250 की जरूरत के मुकाबले सिर्फ 898 मनोवैज्ञानिक हैं। इसके अलावा, देश में 3,000 की आवश्यकता के मुकाबले मात्र 1,500 मनोरोग नर्स हैं। अगर हम मानसिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे पर नजर डालें तो भारत में सामान्य अस्पतालों में मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रति 1 लाख पर 0.560 बिस्तर हैं जबकि अमेरिका में 11.143 हैं। इसी तरह, मानसिक अस्पतालों में प्रति 1 लाख पर 1.426 बिस्तर हैं जबकि अमेरिका में 18.660 बिस्तर हैं।

सरकारों को भी लेनी होगी जिम्मेदारी

कोरोना महामारी के बाद तो मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत बढ़ गयी है। समय है जब राज्य सरकारें मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करें और इनके लिए सरकारी बजट आबंटन बढ़ायें। ऐसी नीतियां बनायी जायें, जिनसे मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता लोगों के करीब बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से पहुंचें।

यह भी पढ़ें: पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कदीर खान नहीं रहे, भोपाल में हुआ था जन्म

Related posts

Bank Holidays: आज से लगातार 5 दिन बंद रहेंगे बैंक, फटाफट निपटा लें अपने काम, देखें लिस्ट

Manoj Singh

Parliament Winter Session: सरकार पर हमला बोलने के लिए विपक्ष की भी है पूरी तैयारी

Pramod Kumar

जेएसएलपीएस एवं डिजिटल ग्रीन के बीच MOU, तकनीक आधारित कृषि से जुड़ेंगी 20 हजार आदिवासी महिलाएं

Pramod Kumar