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बार-बार नेतृत्व परिवर्तन से Congress – BJP को उम्मीद! जानें कितना सफल रहा है यह फॉर्मूला

इन दिनों कांग्रेस (Congress) और भाजपा(BJP) शासित राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर चौतरफा असंतोष, उठापटक और गुटबाजी बढ़ी हुई है। दोनों दलों ने पार्टी के अंदर बढ़ रही इस तरह की चुनौतियों से निबटने के लिए हाई कमान की बैठकें तेज कर दी हैं, मगर राज्यों में जारी संकट सुलझने का नाम ही नहीं ले रही है। कर्नाटक की राजनीति में जारी उथल-पुथल इसका ताजा उदाहरण है, कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने आज यानी सोमवार को विधानसभा में इस्तीफा देने का एलान कर दिया, उसके बाद राजभवन पहुंच कर राज्यपाल थावरचंद गहलोत को अपना इस्तीफा सौंप दिया।

येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा ऐसे समय दिया है, जब आज कर्नाटक की भाजपा सरकार के दो साल पूरे हुए हैं। ऐसे में हर किसी की नजर इस बात पर है कि अब भाजपा राज्य की कमान किसे सौंपेगी। वहीं नई दिल्ली में कर्नाटक के नए सीएम को लेकर बैठक हो रही है।कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की रेस में प्रहलाद जोशी, बीएल संतोष, लक्ष्मण सवदी और मुरुगेश निरानी का नाम शामिल हैं।

उत्तराखंड में भाजपा को चार महीने में तीन-तीन मुख्यमंत्री बदलने पड़े

उत्तराखंड में सबसे पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत को पार्टी के अंतर्विरोधों के कारण भाजपा (BJP) हाईकमान को हटाना पड़ा। उसके बाद लाए गए तीरथ सिंह रावत को केवल 115 दिनों के अंदर संवैधानिक बाध्यता के नाम पर हटा दिया गया। अब पार्टी ने युवा चेहरे पुष्कर सिंह धामी पर दांव लगाया है। पार्टी को उम्मीद है कि इस निर्विवादित चेहरे के सामने आने से उसे उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों में जीत हासिल हो सकेगी।

असम में भी बीजेपी ने चेहरा बदल की सफलता अर्जित

पूर्वोत्तर में पहली भगवा सरकार बनवाने वाले सर्वानंद सोनोवाल को हटाकर हेमंत बिस्वा सरमा को असम का नया मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी ने सही फैसला लिया। हालांकि पार्टी के भीतर ही यह सवाल उठता रहा है कि पुराने चेहरे और पार्टी के स्थापित नेताओं को दरकिनार कर ऐसे नेता के हाथ में राज्य की कमान सौंपना कहां तक उचित है।

बीजेपी को हो चुका है एमपी व गुजरात में मुख्यमंत्री बदलने का फायदा

मुख्यमंत्री बदल कर चुनाव मैदान में उतरने का दांव भाजपा दिल्ली, उत्तर प्रदेश व कर्नाटक में भी आजमा चुकी है, लेकिन उसे चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि मध्य प्रदेश में उमा भारती के बाद बाबूलाल गौर फिर गौर की जगह शिवराज सिंह चौहान को और गुजरात में केशुभाई पटेल को हटा कर नरेंद्र मोदी को सीएम बनाने से पार्टी को फायदा भी मिला था।

राजस्‍थान में भी कांग्रेस सरकार के भीतर जोर आजमाइश

राजस्थान में सचिन पायलट और उनके समर्थकों को कांग्रेस (Congress) पार्टी नेतृत्व सरकार व संगठन में उचित प्रतिनिधित्व दिए जाने के पक्ष में है मगर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अभी तक तैयार नहीं हुए हैं। दिलचस्प यह भी है कि गहलोत हाईकमान के निकट हैं मगर सूबे की सियासत में अपनी बादशाहत कायम रखने की रणनीति के तहत वे सचिन पायलट प्रकरण में नरमी नहीं बरत रहे।

गुजरात में कांग्रेस की खटपट बढ़ा रही सियासी चुनौती

गुजरात कांग्रेस (Congress) में भी नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर खींचतान लंबे समय से चल रही है। भरत सोलंकी एक बार फिर सूबे की कमान थामने के लिए प्रबल दावेदार के रूप में पेशबंदी कर रहे हैं तो शक्ति सिंह गोहिल, अर्जुन मोडवाडिया से लेकर सिद्धार्थ पटेल भी इस रस्साकशी में शामिल हैं। इस अंदरूनी खींचतान के कारण ही गुजरात कांग्रेस का बदलाव अटका हुआ है। पंजाब में जहां अगले साल के शुरू में चुनाव होने हैं, वहीं गुजरात में अगले साल के अंत में चुनाव हैं और कांग्रेस की खटपट उसकी सियासी चुनौती बढ़ा रही है।

हरियाणा में भी जारी है खींचतान

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र ¨सह हुड्डा के समर्थक 21 विधायकों ने कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल से मुलाकात कर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सैलजा को हटाने का दबाव बढ़ा दिया है। प्रदेश अध्यक्ष सैलजा कांग्रेस हाईकमान की करीबी हैं और सोनिया गांधी से उनकी निजी निकटता सार्वजनिक है। इसके बावजूद भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने जिस तरह सैलजा को हटाने के लिए पार्टी में खुले विद्रोह की स्थिति पैदा की है, उससे साफ है कि सूबे में अपनी सियासी पकड़ के दम पर वे अब कांग्रेस संगठन पर भी कब्जा जमाना चाहते हैं।

सिद्धू की ताजपोशी कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए झटका

पंजाब में कैप्टन अमरिंदर और सिद्धू के झगड़े का अंतिम समाधान कांग्रेस ने काफी मशक्कत के बाद सुलझा लिया है, पंजाब कांग्रेस में दबदबे को लेकर पिछले कई महीने से चल रहे सत्ता संघर्ष में फिलहाल नवजोत सिंह सिद्धू ने बाजी मारी ली है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें सूबे का नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। चुनावों से पहले सिद्धू की पंजाब में हुई इस ताजपोशी को कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए झटका माना जा रहा है।सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चाओं के बाद सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस मामले में खुलकर नाराजगी जताई थी और कहा था कि चुनावों से पहले ऐसे किसी फेरबदल से पार्टी को राज्य में नुकसान होगा।

यह भी पढ़ें : Bihar Vidhan Mandal Monsoon Session: सदन में आने से लगता है डर! विपक्ष के कई विधायक हेलमेट पहन कर पहुंचे

 

 

 

 

 

 

 

 

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