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सीएम ने किया धुमकुड़िया भवन का शिलान्यास, बोले- विकास के दौर में भी ऊंचाइयों पर नहीं पहुंच पाया आदिवासी समाज

Dhumkudiya Bhawan

झारखंड के आदिवासी समुदाय के लोगों को झारखंड के सीएम ने एक बड़ी सौगात दी है. दिन प्रतिदिन अपना अस्तित्व खो रहे आदिवासियों के संस्कृति को जीवित रखने के प्रयास में धुमकुड़िया भवन(Dhumkudiya Bhawan) का शिलान्यास मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन द्वारा किया गया. दो दशक के बाद आदिवासी समाज के लिए ये दिन ऐतिहासिक रहा.

गौरतलब है कि राजधानी रांची के करमटोली में करीब 1.50 करोड़ की लागत से केंद्रीय धुमकुड़िया भवन(Dhumkudiya Bhawan) का निर्माण किया जाना है. जिसका भूमि पूजन आदिवासी परंपरा के अनुरूप राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के द्वारा किया गया. इस अवसर पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को प्रतीक चिन्ह के रूप में भगवान बिरसा मुंडा की तस्वीर दी गई.

इस मौके पर लोगों को संबोधित करते हुए सीएम ने कहा कि “धुमकुड़िया भवन(Dhumkudiya Bhawan) की आधारशिला रखी गयी है. आदिवासी समाज इस विकास के दौर में भी ऊंचाइयों पर नहीं पहुंच पाया है. कई राज्य अपनी समाज संस्कृति और सभ्यता के साथ देश के अग्रणी राज्यों में गिने जाते हैं. आज उसी लक्ष्य तक समुदाय को पहुंचाने का हमारे मंत्री चंपई सोरेन के विभाग के द्वारा यह पहल की गई है”.
भूमि पूजन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के अलावा मंत्री चम्पई सोरेन, रांची के सांसद संजय सेठ, नगर विधायक सी पी सिंह, विधायक बंधु तिर्की, मेयर आशा लकड़ा और पूर्व सांसद सुबोधकांत सहाय मौजूद रहे.


क्या है धुमकुड़िया?

धुमकुड़िया का अर्थ उराँव समाज में सर्वव्यापक है. इसे युवा गृह एवं युवतीगृह कह कर इसे सीमित नहीं कर सकते हैं. कुड़ुख भाषा (उराँव ) में युवा गृह को जोंख एड़पा, एवं महिलाओं की ईकाई को पेल्लो एड़पा यानी युवतीगृह कहते हैं. क्योंकि धुमकुड़िया में युवक-युवतियों के द्वारा प्रशासनिक, शैक्षणिक, एवं धार्मिक रिति-रिवाज कार्य सम्पादन होता है, इसीलिए जोंख़ एड़पा (युवकों का घर) और पेल्लो एड़पा (युवतियों का घर) कहा जाता है.

धुमकुड़िया आदिवासी समाज का ह्रदय है, धुमकुड़िया के कार्यक्रम में गावों में हरेक व्यक्ति की चाहे वह लड़का हो या लड़की, चरित्र निर्माण, व्यवहारिक ज्ञान और परम्परा का गौरव रखने की शिक्षा देने के लिए पूरा स्थान है. गाँव के अन्दर बालक बालिकाओं के समूह को धर्म, नीति, कर्तव्य पालन, अनुशासन, सहयोग, एकता आदि आदि के विषय में शिक्षा देने, उन्हें पूर्ण रूप से सहयोग करना तथा उनकी देख-भाल करने का पूरा दायित्व धुमकुड़िया का है.

कहां पाया जाता है धुमकुड़िया ?

धुमकुड़िया आदिवासी समुदाय के बीच समस्त भारत में आदि धर्म (प्रकृति पूजक) मानने वालों के गावों में पाया जाता है. लेकिन इसका स्वरूप झारखण्ड के आदिवासी ग्रामीण क्षेत्र में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है.

कैसा होता है धुमकुड़िया घर?

जिस गाँव में भी धुमकुड़िया घर है, वह एक हॉल के समान लम्बा और चौड़ा होता है. इसकी लम्बाई-चौड़ाई उस गांव की जनसंख्या के अनुरूप ही बनाई जाती है. घर के सजावट में युवक-युवतियों का विशेष योगदान रहता है. गांव के सार्वजनिक सामानों मान्दर, नगाड़ा, घंटा, झंडा और श्रृंगार के समान जौसी चीजें इसी घर में रखे जाते हैं.

क्या धुमकुड़िया बदल गया है?

धुमकुड़िया का स्वरूप आज बदले हुए रूप में दिखाई देता है. आज से एक सौ वर्ष पहले धुमकुड़िया जैसा था, अब वैसा नहीं है, लेकिन धुमकुड़िया के कार्य प्रणाली में अबतक कोई बदलाव नहीं आया है. यहां लोग पहले की तरह ही आज भी कार्य कर रहे हैं. वर्तमान समय में धुमकुड़िया घर कहीं-कहीं पर दिखाई दे रहा है.

अधिकांश गांवों में अब घर नहीं है. जहां थे वह घर भी धंस गये हैं. पर घर धंसने या गिरने से संस्था समाप्त नहीं हुई है. सिर्फ नामकरण में अन्तर-परिवर्तन हुआ है. अनेक ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में भी उरांव समुदाय के बीच सरना नवयुवक संघ, अनेक नामों से चल रहा है. युवा क्लब संस्था जैसे संस्थान धुमकुड़िया का ही टूटा हुआ रूप है.

कहा जाता है कि आदिवासी समाज सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक मामलों की योजनाएं धुमकुड़िया और पड़हा संस्था के द्वारा ही बनाया जाता है. जिन योजनाओं को पड़हा संगठन और धुमकुड़िया घर में तैयार किया जाता है, उनको अखड़ा में ही कार्य रूप दिया जाता है. इसी कारण धुमकुड़िया और अखड़ा का आदिवासी जीवन से घनिष्ठ संबंध है. प्रत्येक गांव में धुमकुड़िया घर होते हैं.

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