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Cable Bridge Accident:  मोरबी हो या त्रिकूट, कहानी एक जैसी, केवल जान से खिलवाड़

Cable Bridge Accident: Morbi or Trikoot, story is same, only messing with life

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

गुजरात के मोरबी में रविवार शाम जिस केबल पुल हादसे ने 134 जिंदगियां लील लीं, सही बात यह है कि ब्रिज ने नहीं, बल्कि लापरवाही ने लीली हैं ये जिंदगियां। मोरबी नगर समिति के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एस.वी. जाला अगर कहते हैं कि बिना फिटनेस सर्टिफिकेट के पुल को जनता के लिए खोला गया था, तो इसे लापरवारी नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे। जाला ने जो कहा उसे ही सुन लीजिए- “लंबे समय तक यह पुल जनता के लिए बंद रहा। सात महीने पहले, एक निजी कंपनी को नवीनीकरण और रखरखाव के लिए अनुबंध दिया गया था, और निजी कंपनी द्वारा 26 अक्टूबर (गुजराती नव वर्ष दिवस) पर जनता के लिए पुल को फिर से खोल दिया गया था। नगर पालिका ने फिटनेस प्रमाणपत्र जारी नहीं किया है।‘

जाला ने तो यहां तक दावा किया कि ऐसा भी हो सकता है कि कंपनी को इंजीनियरिंग कंपनी से फिटनेस सर्टिफिकेट मिल भी गया हो, लेकिन उसे आज तक नगर पालिका को जमा नहीं किया गया। देखा जाये तो यहां से नगर पालिका, ठेका कंपनी और सर्टिफेकेट फिटनेस जारी करने वाली कंपनी सभी सीधी-सीधे आरोपों के घेरे में आ जाते हैं। नगर पालिका इसलिए जिम्मेवार है, क्या उसे पता नहीं था कि झूलता पुल खोल दिया गया है? जबकि उसके पास फिटनेस सर्टिफिकेट जमा कराया ही नहीं गया था। ठेका कंपनी इसलिए जिम्मेदार है, क्योंकि फिकटेस सर्टिफिकेट अगर नहीं मिला तो कैसे उसने झूला पुल खोल दिया। फिटनेस कंपनी इसलिए जिम्मेदार है कि सर्टिफिकेट दिये बगैर पुल खोल दिये जाने की जानकारी तो उसे भी होगी। लेकिन इन सभी के मुंह छुपा लेने से इतनी सारी जिंदगियां वापस  तो नहीं आ जायेंगी? अभी तो हादसा हुआ ही है, अभी तो कई और लोगों की लापरवाहियां सामने आनी बाकी हैं। कोई भी यह कह कर नहीं बच सकता कि झूला पुल अगर सुरक्षित नही था, उस पर जरूरत से ज्यादा लोग चढ़े हुए थे।

सबसे बड़ी दिक्कत लापरवाहियों से सबक नहीं लेना

सरकारें हों या स्थानीय प्रशासन लापरवाहियां होती रहती हैं, दुर्घटनाएं होती रहती हैं, लोग जानें गंवाते रहते हैं, लेकिन कोई सबक नहीं लेता। अभी इसी साल झारखंड के देवघर के त्रिकूट पर्वत पर रोपवे में कई जिन्दगियां फंस गयी थीं। कई लोगों को सेना ने रेस्क्यू करके तो बचा लिया, लेकिन 3 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। वह भी किसलिए, सिर्फ और सिर्फ लापरवाही की वजह से। इस रोपवे का भी ठीका जिस कम्पनी को दिया गया था उसने भी लापरवाही की, जरूरत से ज्यादा लोगों को ट्रॉली में बिठाया। प्रशासन की लापरवाही तो थी है। उस हादसे के तीन हफ्ते पहले ही सरकार समर्थित एक एजेंसी ने 1,770 मीटर लंबे इस रोपवे का सेफ्टी ऑडिट किया था और उसमें करीब 24 खामियां बताई थीं। ऑडिट रिपोर्ट में बताया गया था कि लोहे की रस्सी और उसके जोड़ों या “स्प्लिसिंग भागों” पर नजर रखने की जरूरत है। यानी रिपोर्ट के अनुसार रोपवे असुरक्षित था। फिर भी रोपवे को चालू रखा गया, और हादसा हो गया।

यह बात जितनी सच है कि हादसे पूरी तरह रुक जायें ऐसा सम्भव नहीं है, लेकिन यह भी सच ही कि हमारा प्रयास उन पर अंकुश लगा जरूर सकता है। अगर लापरवाही होती है तो उसके पीछे होता है, मनुष्य का स्वार्थ। अगर ऐसा नहीं होता तो 100 व्यक्तियों की क्षमता वाले पुल पर 400 लोग कैसे होते। अगर स्वार्थ नहीं होता तो 15 रुपये का टिकट 17 रुपये में क्यों बेचा जाता, अगर स्वार्थ नहीं होता तो पुल की फिटनेस को लेकर ढेर सारी बातों को नजरअंदाज कैसे किया जाता।

यह भी पढ़ें:  Morbi bridge collapse VIDEO: क्या लालच ने ले ली सैकड़ों जान? 4 दिन पहले बगैर फिटनेस सर्टिफिकेट खोला झूलता पुल

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