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‘रक्षा बंधन’ ऐसा भी: भैया मेरे राजनीति के बंधन को निभाना, भैया मेरे इस गठबंधन को न भूल जाना

भैया मेरे राजनीति के बंधन को निभाना, भैया मेरे इस गठबंधन को न भूल जाना

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

भाई-बहन के प्यार का त्यौहार है रक्षाबंधन। छोटे से रक्षासूत्र से भाई-बहन का रिश्ता अटूट बंधन में बंधा होता है। सुरक्षा की ‘डोर’ में भाई-बहन के रिश्ते मजबूती से जुड़े होते हैं। रक्षाबंधन के पीछे सामाजिक सुरक्षा की भावना होती है। बहन रक्षा सूत्र बांध कर खुद के लिए सुरक्षा का एक आश्वासन चाहती है। ऐसे ही आश्वासनों की परिपाटी राजनीति में भी चल पड़ी है। आपने ध्यान दिया होगा, राजनीति में भी ‘रक्षा’बंधन बहुत काम आता है। राजनीतिक दलों को बांधे रखने में भी यह बंधन बड़े काम की चीज बन गया है। पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक सुरक्षा के लिए यह ‘रक्षा’बंधन (गठबंधन) बहुत जरूरी हो गया है। अधिकांश राज्यों में ‘भाई-बहन’ की तरह जुड़ा बंधन राजनीतिक सुरक्षा का नया मंत्र बन गया है।

अभी कल की ही बात है, 20 अगस्त को सोनिया गांधी ने राजीव गांधी की जयंती तो मनायी, लेकिन राजनीतिक भला कहां छूटने वाली थी। उन्होंने सभी विपक्षी दलों को एक नसीहत दे डाली कि एक साथ मिलकर लड़ने के सिवाय उनके पास और कोई विकल्प नहीं है। इस मौके पर झारखंड के मुखिया हेमंत सोरेन ने भी माना- केन्द्र को घेरने के लिए विपक्षी एकता को और मजबूत करने की जरूरत है। यही नहीं, जब भी कोई चुनाव नजर आता है, तो भाजपा सबको डराने लगती है, फिर बिना मौसम शुरू हो जाता है ‘रक्षा’बंधन। आज कोई भी पार्टी अपने बूते पर सत्ता तक पहुंचने का दम्भ नहीं भर सकती। लेकिन सत्ता सुख हर पार्टी चाहती है। इसका सरल और टिकाऊ उपाय है – ‘रक्षा बंधन’ यानी गठबंधन।

झारखंड में सुदेश महतो को चाहिए भाजपा का बंधन

सुदेश महतो अपनी राजनीतिक उपलब्धियों की जब भी समीक्षा करते होंगे, विधानसभा चुनाव 2019 उन्हें डराने लगता होगा। जब से झारखंड बना है वह तब से किसी न किसी राजनीतिक खेमे से जुड़कर सत्ता की मलाई चाटते रहे हैं, लेकिन 2019 के चुनाव में एक भूल कर बैठे। चुनाव के बाद उन्होंने अपनी भूल जरूर सुधारी, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। सुदेश महतो बहुत अच्छी तरह समझ चुके होंगे कि उन्हें राजनीतिक सुरक्षा चाहिए तो भाजपा का ‘रक्षा’बंधन जरूरी है। सबको पता है, सुदेश ने इस चुनाव में भाजपा को ‘रक्षा’बंधन नहीं बांधा तो उसका नतीजा भी अच्छी तरह उन्हें समझ आ गया। भाजपा से सीटों पर बात नहीं बनने के कारण, 2019 के विधानसभा चुनाव में आजसू ने झारखंड के लगभग सभी सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन हाथ आयी दो सीटें। सारे तामझाम और हेकड़ी एक ही झटके में गायब। इस बार, हर बार खेमा बदल कर सत्ता सुख लेने वाले सुदेश के पास इतनी भी सीटें नहीं थीं कि भाजपा के विरोधियों से जा मिलें। घूम-फिर कर वापस भाजपा के साथ आ गये। सुदेश ने अगर यह राजनीतिक भूल नहीं की होती तो आज वह राज्य में सत्ता सुख ले रहे होते, इसकी सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने भाजपा के वोट काटकर उसकी सीटें तो कम की हीं, और फायदा उन्हें भी कुछ नहीं हुआ। यानी ‘माया मिली न राम’ वाली कहावत उन पर सिद्ध हो गयी।

झारखंड में झामुमो कांग्रेस के बड़े भैया

एक के बाद एक राज्यों से कांग्रेस की बत्ती गुल होती जा रही है। मगर कांग्रेस को अपना अस्तित्व भी तो बचाना है। लिहाजा उसके लिए भी काम आ रहा वही ‘रक्षा’बंधन। इसी ‘रक्षा’बंधन का ही कमाल है कि झारखंड में 2019 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 16 सीटें जीत पायी। अकेले के बूते कितनी जीत  पाती, राम जाने। कांग्रेस की यह जीत वाकई उसका अपना कमाल नहीं था, इसमें कांग्रेस के बड़े भाई की भूमिका में रहे झामुमो से मिली ‘सुरक्षा’ से कांग्रेस झारखंड में अपनी इज्जत बचाने में कामयाब हुई। इस चुनाव में झामुमो-कांग्रेस-राजद का गठबंधन था। राजद भी एक सीट जीतने में सफल रही। झारखंड में राजद का एक सीट जीतना भी उसका अपना कमाल नहीं था। गठबंधन ने उसकी जीत आसान बनायी।

बिहार में जदयू का बड़े भैया भाजपा

नीतीश कुमार आज बिहार के मुख्यमंत्री हैं। बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के बाद नीतीश कुमार ने सातवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। इससे पहले तक नीतीश जिस शान से बिहार की राजगद्दी सम्भालते रहे थे, इस बार स्थिति वैसी नहीं थी। एक तो नीतीश का घटता कद, ऊपर से मुख्यमंत्री पद का मोह। नीतीश के पास भाजपा के साथ जाने के अलावा कोई चारा नहीं था। अगर गलती से वह राजद के साथ चले जाते और राजद की सीटें जदयू से ज्यादा होतीं, जैसा कि हुआ भी, तब तो सत्ता तो हाथ आ जाती, लेकिन मुख्यमंत्री पद…।

नीतीश कभी राजद के सहारे तो कभी भाजपा के सहारे मुख्यमंत्री बनते रहे हैं। इस बार वह भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बने हैं। मगर हर बार की परिस्थिति से इस बार की परिस्थिति अलग रही। इस बार भाजपा से कम सीटें लेने के बाद भी बिहार के मुखिया बने हैं। यह भी राजनीतिक विवशता है। भाजपा अच्छी तरह जानती है कि अगर नीतीश मुख्यमंत्री नहीं होंगे तो उसके हाथ से एक और राज्य की सत्ता निकल जायेगी। और भाजपा ऐसा नहीं चाहेगी। उसके सामने महाराष्ट्र का उदाहरण भी तो है। वहां शिवसेना के साथ मिलकर बहुमत के साथ जीत के बाद भी सत्ता से दूर है। लिहाजा नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री बने रहना भाजपा के लिए भी ‘रक्षा’बंधन का काम कर रहा। दूसरी ओर नीतीश कुमार अपनी घटती लोकप्रियता के कारण कोई और रिस्क लेना नहीं चाहेंगे।

बिहार में भी कांग्रेस का एक बड़ा भैया

जिस विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर नीतीश कुमार आज बिहार के मुख्यमंत्री हैं। उसी चुनाव में राजद ने भाजपा से भी ज्यादा सीटें जीती थीं। कांटे की टक्कर में राजद सत्ता के नजदीक तो पहुंची, लेकिन…। इस चुनाव में भाजपा ने 74 सीटें जीती थीं, लेकिन राजद 75 सीटों के साथ सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी बनी थी। इस चुनाव में अन्य दलों के साथ राजद का कांग्रेस के साथ गठबंधन था। राजद की प्रचंड जीत का फायदा कांग्रेस को भी मिला। कांग्रेस ने 19 सीटें जीती और सत्ता के लगभग करीब भी पहुंच गयी थी। बिहार में कांग्रेस की स्थिति बिलकुल झारखंड वाली ही है। किसी न किसी पार्टी का ‘रक्षा’बंधन उसे चाहिए ही। भाजपा के साथ वह जा नहीं सकती, लिहाजा झारखंड में झामुमो के साथ गठजोड़ कर सत्ता सुख ले रही है।

वर्तमान राजनीति की विवशता है ‘रक्षा’बंधन

भारतीय समाज में रक्षाबंधन का उद्देश्य बिल्कुल शुद्ध है। लेकिन राजनीति में ऐसा नहीं कहा जाता। राजनीतिक ‘रक्षा’बंधन (गठबंधन) विभिन्न राजनीतिक दलों के द्वारा एक आम राजनीतिक एजेंडे को लेकर होता है। जिसका अंतिम ध्येय सत्ता सुख लेना होता है। यह गठबंधन चुनावों से पहले भी होता है और चुनाव के परिणाम के बाद सत्ता तक पहुंचने के लिए कई ‘जोड़ों’ के मिलाने के लिए ‘रक्षा’बंधन की जरूरत होती है।

भारतीय लोकतंत्र संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। जहां जमीनी सच्चाई देश को गठबंधन की राजनीति की ओर धकेल रही है। पिछले दशक से लगभग हर चुनाव के बाद किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण विभिन्न दलों से मिली-जुली सरकार केन्द्र व राज्यों में निर्मित हुई है। भारत में आज कोई भी राजनीतिक दल वैचारिकता के धरातल पर ईमानदार नहीं है। इसके अतिरिक्त सामाजिक और क्षेत्रीय आधार पर विकास की गैर बराबरी भी भारत में छोटे-छोटे राजनीतिक दलों के अस्तित्व में आने और उनके दिन-प्रति-दिन मजबूत होने का प्रमुख कारण बनती जा रही है।

गठबंधन की शुरुआत 1977 में

देश में राजनीतिक रूप से 1977 का वर्ष बहुत ही बदलाव वाला था। इस वर्ष देश को पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार मिली। तब मोरारजी देसाई ने पहले गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। भले ही यह सरकार बहुमत से इंदिरा गांधी को हराकर बनायी गयी थी, फिर भी आपसी खींचतान के चलते यह सरकार ज्यादा नहीं चल पायी और जल्दी ही चुनाव हुए। इन चुनावों में इंदिरा गांधी भारी बहुमत से जीतकर एक बार फिर प्रधानमंत्री बनीं। लेकिन देश में महागठबंधन बनाकर चुनाव लड़ने का एक रास्ता बन गया जिसके आधार पर बाद में देश में कई सरकारें गिरायी और बनायी गयीं।

यह भी देखें: PM मोदी VS मनमोहन सिंह: किनके कार्यकाल में देश में बढ़ी महंगाई? जानें

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