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Bihar Politics: ‘सांप’ को लालू ने किया माफ, तो नीतीश ने तोड़ा ‘फिर कभी साथ नहीं आयेंगे’ का वादा

Bihar: Lalu forgives 'snake', Nitish breaks promise of 'never coming together'

Bihar Politics: थूक कर चाटना वैसे ‘वीभत्स रस’ है, लेकिन राजनीति में इसे ‘शृंगार रस’ की गरिमा हासिल है। इसीलिए जनादेश चाहे कुछ भी कहे, राजनीति अपनी राह चलती रहती है। जनता अपना वोट डालने तक ही राजनीति में प्रत्यक्ष भूमिका में होती है, इसके बाद सारा कुछ नेताओं की नीयत पर होता है। चाहे महाराष्ट्र का उदाहरण हो या अब की बार की बिहार की घटना, ये सभी इसी बात का उदाहरण हैं कि जनता के लिए बनायी जाने वाली सरकार, सरकार बनने के बाद जनता को अपनी जूती ही समझती है।

आपने आईपीएल मैच देखे होंगे। अलग-अलग साल टीमों में खिलाड़ियों की अदला-बदली होती रहती है। क्योंकि ये बाजार का हिस्सा हैं, इनकी नीलामी होती है, जो इन्हें खरीदता है, उनकी टीम से ये खेलते हैं। यहां खिलाड़ी खरीदे जाते हैं, लेकिन राजनीति में नेता अपने आप को बेचते हैं। जनता के लिए नहीं, ‘अपने लिए’।

‘राजनीति में कोई भी स्थायी मित्र या शत्रु नहीं’ की तर्ज पर जदयू का राजद से दिल मिल गया है। कांग्रेस समेत कुछ और पार्टियों के साथ मिलकर नयी सरकार भी बन गयी है। क्या 2020 के चुनाव में जनता ने यही चाहा था? नीतीश के जदयू ने भाजपा के साथ मिलकर बड़ी मुश्किलों से बिहार के लिए जनादेश हासिल किया था। भाजपा की सीटें ज्यादा आयी थीं, लेकिन वह जानती थी कि अगर उसने अपना मुख्यमंत्री दिया तो नीतीश पलटी मार जायेंगे। इसलिए उन्होंने नीतीश को ही मुख्यमंत्री बनाकर सरकार में शामिल रही। तगड़ा जनसमर्थन तो राजद और कांग्रेस गठबंधन को भी मिला था। नीतीश ने आज जब भाजपा से नाता तोड़ लिया यह तो ठीक है। इसके बाद तो मौका राजद को मिलना चाहिए था सरकार बनाने का। नीतीश खुद तो कुर्सी से चिपके रहे और बैठे-बिठाये राजद-कांग्रेस-वामदलों के हाथ में ‘लड्डू’ थमा कर जनता को ठेंगा दिखा दिया।

देश में बिहार और झारखंड ऐसे दो प्रदेश हैं जहां राजनीतिक ड्रामेबाजी के पूरे स्कोप हैं। 22 साल का होने जा रहे झारखंड में अब तक एक ही बार पूर्णकालिक एक सरकार रघुवर दास के नेतृत्व में बनी है। उसके पहले भी बनती-बिगड़ती रही है और वर्तमान की हेमंत सोरेन की सरकार आधा कार्यकाल पूरा करने के बाद भी अस्थिरता में घिरी हुई है। बिहार के नीतीश कुमार भी पिछले 22 सालों में 8 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं, इससे भी बिहार की राजनीतिक अस्थिरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

नीतीश कुमार 2017 में भी महागठबंधन छोड़कर NDA में शामिल हुए थे। उस समय राजद सुप्रीम लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार ने एक दूसरे पर खूब  जहर उगले थे। लेकिन कहा न, राजनीति में थूक कर चाटना परम्परा बन गयी है। तब लालू यादव ने नीतीश की तुलना आस्तीन के सांप से करते हुए भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा पलटूराम कहा था। इसके जवाब में नीतीश कुमार ने साफ तौर पर कहा था कि फिर से राजद के साथ आने का अब कोई प्रश्न ही नहीं उठता। नीतीश ने उस समय कहा था, हम रहें या मिट्टी में मिल जाएं, आप लोगों के साथ अब कोई समझौता नहीं होगा। असंभव… अब ये संभव ही नहीं है।

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