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Bihar: सीएम नीतीश कुमार ने समलैंगिकता पर कही बड़ी बात, ‘लड़का-लड़का शादी कर लेंगे तो कोई पैदा कैसे होगा…’

Bihar: CM Nitish said- 'If a boy and a boy get married then how will someone be born...'

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

बिहार के सीएम नीतीश कुमार पटना के मगध महिला कॉलेज में आये थे नये छात्रावास का उद्घाटन करने, लेकिन चर्चा समलैंगिकता की चल निकली और उन्होंने देश-दुनिया में चल निकले नये ‘कल्चर’ पर तगड़ा हमला बोल दिया। उन्होंने बड़ी बेबाकी से कहा- ‘यदि लड़का-लड़का शादी कर लेंगे तो कोई पैदा होगा क्या? अरे, शादी होगी तभी ना बाल-बच्चा होगा, हम या कोई भी यहां पर, मां है, तभी ना पैदा हुए है, क्या मां के बिना पैदा हुए, महिला के बिना पैदा हुए… ‘।

इसके बाद माहौल को हल्का करने के लिए सीएम नीतीश कुमार ने अपने इंजीनियरिंग कॉलेज के दिनों की बातें छात्राओं से शेयर करते हुए लड़कियों से संबंधित एक दिलचस्प कहानी सुनाई। नीतीश कुमार ने कहा, जब वह इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ा करते थे तो उनके कॉलेज में छात्राएं नहीं हुआ करती थीं। यदि कभी कोई महिला कॉलेज में आ जाती थी तो सारे विद्यार्थी उसी को देखने लगते थे। लेकिन अब इंजीनियरिंग कॉलेजों में बहुत परिवर्तन आ गया है, लड़कियां बढ़-चढ़कर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही हैं। लड़कियां अधिक संख्या में इंजीनियरिंग व मेडिकल कॉलेज में पढ़ रही हैं। उनके पास आज अवसरों की कमी नहीं है। नीतीश कुमार के इंजीनियरिंग कॉलेज के दिनों की बातें लड़कियों ने बड़े गौर से सुना और तालियां भी बजाईं।

‘समलैंगिक विवाह’ शब्द कितना उचित?

सीएम नीतीश कुमार ने समलैंगिकता पर जो टिप्पणी की उस पर समाज की दो राय हो सकती है। समाज में बहुत से लोग हैं जो इन संबंधों को नकारते हुए भी इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहते। इन संबंधों को पूर्ण रूप से सामाजिक मान्यता भले न हो, लेकिन इसे संविधान का संरक्षण अवश्य प्राप्त है। समलैंगिक संबंधों पर आपत्ति भले न की जाये, लेकिन एक शब्द ‘समलैंगिक विवाह’ पर तो आपत्ति की जा सकती है। इस रिश्ते को कुछ भी नाम दिया जा सकता है, ‘विवाह’ शब्द इसके लिए कहीं से प्रासंगिक नहीं है। क्योंकि ‘विवाह’ शब्द अपने आप में बहुत व्यापक अर्थ और महत्व रखता है।

‘विवाह’ का शाब्दिक अर्थ है, ‘उद्वह’ अर्थात् ‘वधू को वर के घर ले जाना।’ विवाह को परिभाषित करते हुए लूसी मेयर लिखते हैं, विवाह की परिभाषा यह है कि वह स्त्री-पुरुष का ऐसा योग है, जिससे स्त्री से जन्मा बच्चा माता-पिता की वैध सन्तान माना जाये। इस परिभाषा में विवाह को स्त्री व पुरुष के ऐसे सम्बन्धों के रूप में स्वीकार किया गया है जो सन्तानों को जन्म देते हैं, उन्हें वैध घोषित करते हैं तथा इसके फलस्वरूप माता-पिता एवं बच्चों को समाज में कुछ अधिकार एवं प्रस्थितियां प्राप्त होती हैं।

समाजशास्त्र में भले ही विवाह की निश्चित परिभाषा हो, पर यह समाज हर परिभाषा की भाषा ही बिगाड़ कर रख देता है। समाज में तो भिन्न-भिन्न स्थान और परिस्थिति के हिसाब से विवाह की परिभाषा भी बदल जाती है। संस्कृतियों में भिन्नता होने के कारण समाज में विवाह के स्वरूप में विविधता पाया जाना भी स्वाभाविक है। विवाह प्रत्येक मानव समाज, जिससे कि हम परिचित हैं, की एक जटिल सांस्कृतिक घटना है। यदि विवाह जैसी कोई संस्था समाज में न होती तो संभवतः परिवार का निर्माण ही न होता और न ही तब समाज का कोई विकास होता। विश्व के सभी समाज, चाहे वे सभ्य हों या असभ्य, उन्हें परिवार की जरूरत होती है। परिवार व समाज की निरंतरता बनाये रखने तथा संस्कृतियों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण करने के लिए विवाह अनिवार्य धार्मिक संस्कार है। इस प्रकार समाज का निर्माण करने में विवाह के महत्व की उपेक्षा नहीं की जा सकती। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने समलैंगिकता पर टिप्पणी करते हुए यही समझाने का प्रयास किया है।

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