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Amarnath: मौत पर भारी आस्था! बड़े हादसों से भी नहीं रुकी अमरनाथ यात्रा

Amarnath: Great faith in death! Amarnath Yatra did not stop even due to major accidents

1969 और 1996 में हो चुके हैं दो बड़े हादसे

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

शुक्रवार को अमरनाथ गुफा के बाहर बादल फटने की घटना से 16 लोगों की मौत हो गयी। करीब 45 लोग हादसे के बाद से लापता हैं। जिस समय यह हादसा हुआ था उस समय अमरनाथ गुफा के आसपास करीब  15000 अमरनाथ यात्री मौजूद थे। इससे हादसे की संभावित वीभत्सता का अंदाजा लगाया जा सकता है, लेकिन शुक्र है हादसा ज्यादा बड़ा नहीं हुआ। हादसे में जो नुकसान हुआ उसके लिए वहां किये जाने वाले सुरक्षा इंतजामों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि सुरक्षा इंतजाम किये जाने की अपनी एक सीमा है, जबकि प्रकृति के विनाश की सीमा अनन्त है। पिछले कुछ वर्षों से अमरनाथ यात्रा को लेकर सरकारें ज्यादा सचेत रहती हैं और सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम के बीच ही यह यात्रा होती है। क्योंकि अमरनाथ यात्रा में हरपल दो खतरे साथ चलते हैं, एक प्रकृति के कहर का खतरा और दूसरा आतंकी वारदातों का भय। इसके बावजूद अमरनाथ  यात्रा का सफलतापूर्वक सम्पन्न कराना सरकारों की बड़ी कामयाबी होती है।

बढ़े हैं प्राकृतिक आपदा के खतरे

पर्वतीय क्षेत्रों में बादल फटने की घटना का हो जाना स्वाभाविक प्राकृतिक घटना है, लेकिन देश-दुनिया में बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग ने इन खतरों को और बढ़ा दिया है। अमरनाथ गुफा के बाहर या अमनराथ यात्रा के मार्ग में बादल फटने की घटना की चपेट में श्रद्धालु पहले भी आये हैं और इन घटनाओं में कई जानें भी गई हैं। अमरनाथ ही नहीं, चार धाम यात्रा के दौरान भी तीर्थयात्रियों को ऐसे हादसों का शिकार होना पड़ता है। देखा जाये तो हर साल औसतन 100 के करीब श्रद्धालु प्राकृतिक हादसों में जानें गंवा देते हैं। अमरनाथ यात्रा के ज्ञात इतिहास में दो हादस बड़े माने जाते हैं जिनमें 400 श्रद्धालु प्रकृति के कोप का शिकार हो चुके हैं।

1969 और 1996 में भी हुए थे प्राकृतिक हादसे

अमरनाथ यात्रा कब आरंभ हुई थी इसके बारे में दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता, हो सकता है वैष्णो देवी यात्रा की तरह यह भी पहले स्थानीय लोगों तक ही सीमित रही हो और इन यात्राओं का राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीकरण बाद में हुआ हो। लेकिन जब से इस यात्रा की ओर विशेष ध्यान गया है तब से ज्ञात हादसों में 1969  और 1996 के दो हादसों को सबसे बड़ा प्राकृतिक हादसा कहा जायेगा। 1969 में बादल फटने की घटना में 100 के करीब श्रद्धालुओं की मौत हुई थी। जबकि 1996 के दूसरे प्राकृतिक हादसे में 300 लोगों की मौत हुई थी। यह घटना वैसे तो है प्राकृतिक लेकिन इस घटना के होने के लिए मनुष्य ज्यादा जिम्मेदार था। सच कहा जाये तो उस वर्ष लाखों लोगों को बंदइंतजामी के बीच मौत के मुंह में धकेल दिया गया था। दरअसल, आतंकी ढांचे को चुनौती देने के के लिए राष्ट्रीय एकता के नाम पर करीब एक लाख भूखे-नंगे लोगों को राज्य सरकार ने यात्रा में धकेल दिया था। जो बर्फबारी में फंस गये और इनमें से 300 लोगों की मौत हो गयी। हो सकता है ये आंकड़े और भी ज्यादा हो सकते हैं।

हर साल बढ़ती अमरनाथ श्रद्धालुओं की संख्या

हर साल अमरनाथ यात्रियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। मौजूदा रिकार्ड देखें तो वर्ष 1987 में 50 हजार के करीब श्रद्धालु अमरनाथ यात्रा में शामिल हुए थे और आतंकवाद के चरमोत्कर्ष के दिनों में वर्ष 1990 में यह संख्या घटकर 4800 तक सिमट गई थी। लेकिन जब से इसे एकता और अखंडता की यात्रा के रूप में प्रचारित किया जाने लगा तो तबसे इसमें अब 3 से 5 लाख के करीब श्रद्धालु शामिल होने लगे हैं।

2010 में भी गुफा के पास फटा था बादल

जानकारी के अनुसार साल 2010 में भी गुफा के पास बादल फटा था, लेकिन तब भी कोई नुकसान नहीं हुआ था। वर्ष 2021 में 28 जुलाई को गुफा के पास बादल फटने से तीन लोग इसमें फंस गए जिन्हें बचा लिया गया था। इसमें कोई जानी नुकसान नहीं हुआ था। इस बार बादल फटने से बड़ा नुकसान हुआ है। वर्ष 2015 में बालटाल आधार शिविर के पास बादल फटने से काफी नुकसान हुआ था। इस दौरान लंगरों के अस्थायी ढांचे ध्वस्त हो गए थे और दो बच्चों समेत तीन श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी।

क्या है बादल फटना?

बादल फटना बारिश का वीभत्स रूप है। प्राकृतिक कारणों से इसमें ऐसा होता है कि कुछ मिनट में बादलों का सारा पानी धरती पर आ जाता है और सैलाब का रूप ले लेता है। बारिश की रफ्तार इतनी तीव्र होती है कि 100 मिलीमीटर या उससे अधिक की बारिश एक घंटे में हो जाती है। ऐसी बारिश उस स्थान पर भारी तबाही मचा देती है। हिमालयी क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाएं ज्यादा होती हैं। उत्तराखंड से बादल फटने की खबरें अक्सर आती रहती हैं।

बादल फटने के दो कारण हैं। पहला कारण है- जब बादल भारी मात्रा में आर्द्रता यानी पानी लेकर आसमान में चलते हैं और उनकी राह में जब कोई बाधा (पर्वत) आ जाती है, तब वह अचानक फट पड़ते हैं। तब एक सीमित इलाके में लाखों लीटर पानी काफी तेजी से एक साथ पृथ्वी पर आ गिरता है, जिसके कारण उस क्षेत्र में तेज बहाव वाली बाढ़ आ जाती है। भारत में हर साल मॉनसून के समय नमी को लिए हुए बादल उत्तर की ओर बढ़ते हैं, लिहाजा हिमालय पर्वत एक बड़े अवरोधक के रूप में सामने पड़ता है।

दूसरा कारण है- जब गर्म हवा का झोंका नमी लिए हुए बादल से टकरा जाते हैं तब भी उसके फटने की आशंका बढ़ जाती है। उदाहरण के तौर पर 26 जुलाई 2005 को मुंबई में बादल फटे थे, तब वहां बादल किसी ठोस वस्‍तु से नहीं, बल्कि गर्म हवा से टकराये थे।

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