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Dhanbad: मिलिये मुद्रा मैन अमरेन्द्र आनन्द से, कुषाण से लेकर आधुनिक काल के सिक्कों का अनमोल संग्रह

अमरेन्द्र आनन्द के पास कुषाण से लेकर आधुनिक काल के सिक्कों का अनमोल संग्रह

धनबाद से कुंदन सिंह/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

आज हम आपको एक ऐसे शख्स से मिलाने जा रहे हैं जिसने देश में चले कौड़ी से लेकर क्रेडिट कार्ड तक के सफ़र को काफी नजदीक से देखा और समझा है। इनके कलेक्शन में कुषाण युग, चोल वंश, ख़िलजी या मौर्य वंश सभी काल के सिक्के और करेंसी मौजूद हैं और अब वह अपने इस शौक को देश को समर्पित करना चाहते है। वैसे तो इस दुनिया में कई तरह शौकीन हैं, लेकिन ऐसे शौकीन कम ही हैं जिनके शौक को देखने और जानने के बाद गर्व महसूस किया जा सके।

आज हम आपको एक ऐसे ही शौकीन और उनके शौक से रु-ब-रु करवाने जा रहे हैं जिसे देखने के बाद आप उन पर गर्व महसूस किये बिना नहीं रह पाएंगे। LIC में डेवलपमेंट ऑफिसर के पद से रिटायर अमरेंद्र आनंद पिछले पांच दशकों से पुराने करेंसी और सिक्के इकट्ठा कर रहे हैं। आज उनके कलेक्शन में देश में चली अब तक की हर प्रकार की करेंसी के साथ-साथ पहली शताब्दी से लेकर आज तक के सैकड़ों प्रकार के सिक्के शामिल है।

18 फाइलों में करीने से सजा रखा है अपना संग्रह

कोयलांचल धनबाद स्थित कुसुम विहार स्थित अपने घर के एक विशेष संग्रहालय में अपने हाथ से ही बनायी 18 फाइलों में उन्होंने अपने संग्रह को बड़े ही सलीके और जतन से सहेज रखा है। उनके संरक्षित संग्रह में दुर्लभ सिक्के, मुद्रा, त्रुटि पूर्ण नोट्स, चेक, हुकुमनामा और फैंसी नोट्स शामिल हैं। आनंद के पास कुषाण युग, ख़िलजी काल, चोल, उज्जैन और विजयनगर राज्यों के सिक्के सुरक्षित हैं। मौर्य, मगध और दिल्ली सल्तनत से पञ्च चिह्नित सिक्के भी उनके संग्रहालय में मौजूद हैं। सेवानिवृत्त आनंद के पास विशेष सिक्के हैं, जिन्हें मंदिर टोकन कहा जाता है। इसके अलावा संग्रहालय में समकालीन त्रुटि सिक्के भी हैं। इनके संग्रह में मुद्रा नोटों में एक अना पेपर पैसा और जूनागढ़ के 1000 रुपये के नोट शामिल हैं। आनंद ने दुर्लभ हाथ से बने तिब्बती नोटों को भी काफी जतन से संग्रह कर रखा है।

तीन बार बंद किये गये 1000 के नोट

इसके अलावा उन्होंने 1000 रुपये के तीनों संस्करणों को दिखलाते हुए कहा कि अब तक के चले तीनों प्रकार के 1000 रुपये के नोट सबसे खास हैं, क्योंकि तीनों बार यह नोट ब्लैक मनी रखने वालों की वजह से रद्द किये गये। अमरेंद्र बताते हैं कि देश के बाजार में अब तक तीन बार 1000 रुपये के नये नोट आ चुके हैं और हर बार सरकार द्वारा इसे बंद भी किया गया। वह कहते हैं कि पहली बार अंग्रेजों द्वारा 1938 में हजार रुपये के नोट लॉन्च किये गये थे। इसे 1946 में वापस ले लिया गया था। दूसरी बार 1954 से 1978 तक के लिए हजार के नोट चलाये गये थे और तीसरी बार 2000 से 2016 तक यह नोट चलाये गये। लेकिन हर बार कालेधन पर लगाम लगाने के लिए इन नोटों को बंद कर दिया गया।

कागजी मुद्रा में 1 रुपये की शुरुआत

कागजी मुद्रा में 1 रुपये की शुरुआत का इतिहास बतलाते हुए आनंद कहते हैं कि 30 नवम्बर, 1917 में हुए प्रथम विश्व युद्ध के समय धातु की कमी के चलते सिक्के की काफी किल्लत हो गई। तब ब्रिटिश सरकार द्वारा ₹1 की कागजी मुद्रा की छपाई का निर्णय लिया गया। हस्तनिर्मित कागज जिसमें GRI एवं स्टार वाटर मार्क होता था, इसमें एक तरफ ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया’ ‘I promise To pay The Beare’. जॉर्ज 5 वाले प्रचलित सिक्के की फोटो एवं दूसरी ओर छपाई वर्ष के साथ सिक्के की फोटो तथा 9 भाषाओं में ₹1 लिखा होता था। यह 25-25 नोटों के सुंदर बुकलेट में होता था। यह ब्रिटेन से छपकर आता था। वहीं 1 रुपये की दूसरी इश्यु 24 जुलाई, 1940 को हस्तनिर्मित कागज पर भारत के नासिक प्रेस से छापी गयी। जबकि आजाद भारत में 12 अगस्त, 1949 को पुणे ₹1 का सिक्का छापा गया जिसमें अशोकस्तंभ का चिह्न बना हुआ था। वहीं छपाई मूल्य बढ़ने के चलते मार्च, 1994 से इसकी छपाई बंद कर दी गई थी। पुनः 2015 एवं 2016 में पुणे में इसे छापा गया।

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