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चार मास के पाताल वास के बाद वैकुण्ठधाम लौटे श्रीहरि, मांगलिक कार्य शुरू, फिर बजेंगी शहनाइयां

After four months of Hades, Shrihari returned to Vaikunthdham, now shehnais will ring again

न्यूज डेस्क/ समाचार प्लस – झारखंड-बिहार

आज देवोत्थान एकादशी है। दीपावली के बाद कार्तिक, शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवोत्थान एकादशी कहते हैं। क्योंकि इसी दिन श्रीहरि यानी भगवान विष्णु चार मास अपने भक्त राजा बलि के यहां पाताल में वास के बाद अपने वैकुण्ठ धाम लौटते हैं। देवोत्थान एकादशी को देवउठान एकादशी या ‘प्रबोधिनी एकादशी’ भी कहा जाता है। भगवान विष्णु का देवशयन काल आषाढ़, शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि से शुरू होकर कार्तिक, शुक्ल पक्ष की एकादशी तक चलता है। विष्णु जी के शयन काल के चार मासों में विवाहादि मांगलिक कार्यों का आयोजन करना निषेध रहता है। फिर से विवाहादि तथा अन्य मांगलिक कार्य आरम्भ हो जायेंगे।

प्रतीकात्मक है देवोत्थान

स्वामी नित्यानंद सरस्वती के अनुसार चार महीने तक देव का सोना और जागना प्रतीकात्मक है। इसका मूल भाव है, वर्षा के दिनों में सूर्य की स्थिति और ऋतु प्रभाव के कारण चार महीना सामान्य गतिविधियां रुक (सो) जाती हैं। वैदिक वांग्मय के अनुसार सूर्य सबसे बड़े देवता हैं। उन्हें जगत् की आत्मा भी कहा गया है। हरि, विष्णु, इंद्र आदि नाम सूर्य के पर्याय हैं। वर्षा काल में अधिकांश समय सूर्य देवता बादलों में छिपे रहते हैं। इसलिए कहा जाता है वर्षा काल के चार महीनों में हरि सो जाते हैं। फिर जब वर्षा काल समाप्त हो जाता है तो वह जाग उठते हैं। भारतीय संस्कृति में इन चार महीनों में आहार-विहार में कई सावधानियां रखी जाती हैं, इसका भी संबंध वर्षाकाल से है। क्योंकि वर्षा के दिनों में प्रकृति परिवर्तनों के दौर से गुजरती है, मौसमी बीमारियों और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता इस वजह से अक्सर गड़बड़ाती रहती है। यही कारण है कि इस काल में कई चीजों को निषिद्ध कर दिया जाता है।

पौराणिक कथा

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार असुरों के राजा बलि पराक्रम, दान, सत्यवादिता के लिए विख्यात थे। राजा बलि भगवान विष्णु के प्रबल शत्रु हिरण्यकश्यपु के प्रपौत्र, भक्त प्रह्लाद के पौत्र और विरोचन के पुत्र हैं। इंद्र ने जब छल से विरोचन का वध कर दिया तब कुपित होकर बलि ने देवताओं के साथ भीषण युद्ध छेड़ दिया और तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली। इसके बाद बलि की दृष्टि इंद्र के सिंहासन पर केंद्रित हो गई। जिसे प्राप्त करने के लिए उसने सौ यज्ञों का संकल्प लिया। बलि ने 99 यज्ञ निर्विघ्न संपन्न भी कर लिए। सौवें यज्ञ से देवताओं में हड़कंप मच गया। क्योंकि यदि बलि ने यह यज्ञ पूरा कर लेते तो देव लोक पर असुरों का राज हो जाता। तब परिस्थितियों को भांपते हुए भगवान विष्णु ने वामन बटुक का वेश धारण किया और बलि की यज्ञशाला में पहुंचे।

भगवान विष्णु का वामन रूप असुरों के गुरु शुक्राचार्य से छिपा नहीं रहता है। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य बलि को सावधान भी किया। फिर भी राजा बलि ने भगवान को मुंह मांगा दान देने का संकल्प ले लिया। श्रीहरि ने राजा बलि से तीन पग स्थान मांगा। 2 पग में भूमंडल और वायुमंडल उन्होंने नाप लिया। श्रीहरि फिर पूछा- तीसरा पग कहां रखूं? इस पर बलि ने तीसरा पग अपने सिर पर रखने के लिए कहा। विष्णु भगवान ने तीसरा पग बलि के शीश पर रखा और उसे पाताल भेज दिया तथा वहां का शासक घोषित कर दिया। इसके बाद राजा बलि की भक्ति और उसके समर्पण से प्रसन्न होकर प्रभु ने वर मांगने के लिए कहा तब बलि ने भगवान से अपने साथ पाताल में बसने का आग्रह कर दिया। वचनबद्ध भगवान इसके बाद पाताल में ही बस गए।

भगवान विष्णु के पाताल लोक में वास करने से देवता गण परेशान हो गये। तब सबने माता लक्ष्मी से श्रीहरि को पाताल से देवलोक लाने की प्रार्थना की। मां लक्ष्मी ने ब्राह्मणी का वेश बनाकर राजा बलि के दरबार में जा पहुंचीं। राजा बलि ने उनसे इच्छित वस्तु मांगने का आग्रह किया तो उन्होंने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधकर वचनबद्ध कर लिया तथा भेंट में श्रीहरि को मांग लिया। वचन में बंध चुके राजा बलि ने भगवान विष्णु को पाताल लोक में रहने के वचन से मुक्त किया। फलस्वरूप श्री हरि विष्णु वैकुंठ को लौट आए। श्रीहरि चार मास राजा बलि के आवास पर रहे यही काल देवशयन काल कहलाया। भगवान विष्णु के वापस वैकुण्ठ धाम लौटना ही देवोत्थान है।

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