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स्वतंत्रता के 75 साल : क्यों बिगड़ रहे हैं पड़ोसी देशों के साथ भारत के रिश्ते?

स्वतंत्रता के 75 साल : क्यों बिगड़ रहे हैं पड़ोसी देशों के साथ भारत के रिश्ते?

भारत और पाकिस्तान को आज़ादी एक साथ ही मिली थी. भारत, ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा उपनिवेश था. 15 अगस्त 1947 को हिंदुस्तान पर हुकूमते ब्रतानिया ख़त्म हो गई.लेकिन देखा जाए तो भारत और पाकिस्तान का इतिहास एक है. सांस्कृतिक विरासत साझी है. मगर दोनों के बीच इतना अविश्वास है, इतनी कड़वाहट है, कि, वो एक-दूसरे को अपना प्रतिद्वंदी नहीं, दुश्मन मानते हैं.

आज़ादी के बाद पिछले सत्तर सालों में भारत और पाकिस्तान के बीच तीन बार जंग हो चुकी है. वैसे कुछ लोग कहते हैं कि चार युद्ध हुए हैं. मगर आख़िरी बार 1999 में जब दोनों देशों की फौजें लड़ी थीं, तो जंग का औपचारिक एलान नहीं हुआ था.

हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच जारी तनातनी, दुनिया की सबसे लंबे वक़्त तक चलने वाली सामरिक समस्या कही जा सकती है. इसी तनातनी का नतीजा है कि दोनों देशो ने एटमी हथियार विकसित किए. यानी आज की तारीख़ में भारत और पाकिस्तान के बीच जो विवाद है, उसे इलाक़ाई तनातनी कहकर अनदेखा नहीं किया जा सकता. इस तनातनी से बाक़ी दुनिया के लिए भी बड़ा ख़तरा पैदा होने का डर है.

पाकिस्तान को एक और बंटवारे के दर्द से गुज़रना पड़ा

महीनों की क़वायद और तनातनी के बाद 1947 में भारत-पाकिस्तान के बीच जो सरहदें तय हुईं, वो एक पीढ़ी भी नहीं चल सकीं. आज़ादी के 25 सालों के भीतर ही पाकिस्तान को एक और बंटवारे के दर्द से गुज़रना पड़ा. जब अंग्रेज़ों ने देश का बंटवारा किया था, तो पाकिस्तान के दो टुकड़े थे. पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच दो हज़ार किलोमीटर का फ़ासला था. 1971 में पूर्वी पाकिस्तान, पश्चिमी पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश के रूप में नया देश बन गया. बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई में भारत ने भी अपनी फौज की मदद दी थी.

बहुत पेचीदा है कश्मीर का विवाद

बंटवारे के बाद जो मुद्दे अनसुलझे रह गए थे उनमें कश्मीर का मसला भी था. हिमालय की वादियों में स्थित रियासत-ए-कश्मीर की ज़्यादातर आबादी मुस्लिम थी. लेकिन कश्मीर के राजा हिंदू थे. कश्मीर के राजा ने अपनी रियासत को भारत में विलय करने का फ़ैसला किया. नतीजा ये हुआ कि बंटवारे के कुछ महीनों के भीतर ही, भारत और पाकिस्तान की सेनाएं, कश्मीर के मोर्चे पर आमने-सामने थीं. आज भी कश्मीर का मसला अनसुलझा है.कश्मीर का विवाद बहुत पेचीदा है. बहुत से कश्मीरी आज़ादी चाहते हैं. वहीं कुछ पाकिस्तान के साथ रहना चाहते हैं, तो, कुछ भारत को ही अपना देश मानते हैं. हिंद- पाक के दरमियान तल्ख़ी की सबसे बड़ी वजह कश्मीर ही है.

चरमपंथ को बढ़ावा देने का आरोप

भारत, पाकिस्तान पर आरोप लगाता है कि वो चरमपंथी संगठनों को मदद देता है. इन चरमपंथियों ने भारत में कई चरमपंथी हमले किए हैं. वहीं पाकिस्तान आरोप लगाता है कि भारत, उसके बलोचिस्तान सूबे में बग़ावत को बढ़ावा देता है.

दोनों ही देशों के नेता एक दूसरे से मिलते हैं, बात करते रहे हैं. कई बार रिश्तों में जमी बर्फ़ पिघली भी, और लगा कि दोनों अब दोनों देश मिलकर रिश्तों की नई इबारत लिखेंगे. लेकिन कोई न कोई ऐसा मसला खड़ा हो जाता है कि ताल्लुक़ फिर बिगड़ गए.

सीमाओं को परिभाषित करने के साथ ही उनका सीमांकन और परिसीमन किये जाने की आवश्यकता है ताकि आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के भय को दूर किया जा सके और संबंधों को मज़बूत किया जा सके।

चीन
भारत और चीन दोनों ने लगभग एक-साथ साम्राज्यवादी शासन से मुक्ति पाई। भारत ने जहां सच्चे अर्थों में लोकतंत्र के मूल्यों को खुद में समाहित किया, तो वहीं चीन ने छद्म लोकतंत्र को अपनाया। भारत चीन सबंधों की इस गाथा में अनेक स्याह मोड़ आए। हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे से लेकर वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध से होते हुए दोनों देशों के संबंध आज इस दौर में हैं कि भारत व चीन विभिन्न मंचों पर एक-दूसरे की मुखालफत करते नज़र आते हैं।

भारत व चीन सीमा विवाद के कारण आपस में उलझे हुए हैं

ऐसे समय में जब विश्व व्यवस्था को वैश्विक महामारी से निपटने के लिये आपसी सहयोग, समन्वय एवं सहभागिता की आवश्यकता है, विश्व व्यवस्था के दो बड़े राष्ट्र भारत व चीन सीमा विवाद के कारण आपस में उलझे हुए हैं। हालिया विवाद का केंद्र अक्साई चिन में स्थित गालवन घाटी (Galwan Valley) है, जिसको लेकर दोनो देशों की सेनाएं आमने-सामने आ गईं हैं। जहां भारत का आरोप है कि गालवन घाटी के किनारे चीनी सेना अवैध रूप से टेंट लगाकर सैनिकों की संख्या में वृद्धि कर रही है, तो वहीं दूसरी ओर चीन का आरोप है कि भारत गालवन घाटी के पास रक्षा संबंधी अवैध निर्माण कर रहा है। इस घटना से पूर्व उत्तरी सिक्किम के नाथू ला सेक्टर में भी भारतीय व चीनी सैनिकों की झड़प हुई थी।

आपसी संबंधों को और बेहतर बनाया जा सकता है

उपरोक्त घटनाएं भारत-चीन के मध्य सीमा विवाद का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं, जो दोनों देशों के बीच रक्षा व सुरक्षा संबंधों की जटिलता को प्रदर्शित करते हैं। दोनों देशों के बीच संबंधों को व्यापक दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है। विश्व में चीन तथा भारत ऐसे देश है जिनकी जनसंख्या एक अरब से अधिक है तथा ये दोनों देश राष्ट्रीय कायाकल्प के ऐतिहासिक मिशन के साथ ही विकासशील देशों की सामूहिक उत्थान प्रक्रिया को गति देने में महत्त्वपूर्ण प्रेरक की भूमिका निभा सकते हैं।भारत और चीन के बीच की समस्याओं को अल्पावधि में हल किया जाना कठिन है, लेकिन मौजूदा रणनीतिक अंतर को न्यूनतम करने, मतभेदों को कम करने और यथास्थिति बनाए रखने जैसे उपायों से समय के साथ आपसी संबंधों को और बेहतर बनाया जा सकता है।

नेपाल के साथ भारत के संबंधों में आई है खटास

नेपाल, भारत का एक महत्त्वपूर्ण पड़ोसी है और सदियों से चले आ रहे भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक संबंधों के कारण वह हमारी विदेश नीति में भी विशेष महत्त्व रखता है।हाल ही में भारत के लिये स्थिति उस समय असहज हो गई जब कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिये भारत द्वारा लिपुलेख-धाराचूला मार्ग के उद्घाटन करने के बाद नेपाल ने इसे एकतरफा गतिविधि बताते हुए आपत्ति जताई। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने यह दावा किया कि महाकाली नदी के पूर्व का क्षेत्र नेपाल की सीमा में आता है। विदित है कि नेपाल ने आधिकारिक रूप से नवीन मानचित्र जारी किया गया, जो उत्तराखंड के कालापानी (Kalapani) लिंपियाधुरा (Limpiyadhura) और लिपुलेख (Lipulekh) को अपने संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा मानता है। निश्चित रूप से नेपाल की इस प्रकार की प्रतिक्रिया ने भारत को अचंभित कर दिया है। इतना ही नहीं नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली (K.P. Sharma Oli) ने नेपाल में कोरोना वायरस के प्रसार में भारत को दोष देकर दोनों देशों के बीच संबंधों को तनावपूर्ण कर दिया है।

ज़रूरत से ज्यादा  महत्वाकांक्षी बन गया है नेपाल

वस्तुतः इसे ‘चीनी जादू’ कहा जाए या नेपाल की कूटनीतिक चाल कि पिछले कुछ वर्षों से लगातार भारत को परेशान करने की कोशिश हो रही है। भारत इन सभी कोशिशों को नेपाल की चीन से बढ़ती नजदीकी के रूप में देख रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराने रिश्ते पर ‘चीनी चाल’ भारी पड़ रही है? या फिर यह मान लिया जाए कि हालिया दिनों में नेपाल ज़रूरत से ज्यादा महत्वाकांक्षी बन गया है और भारत उसकी आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा।

भारत बांग्ला देश संबंध, महाद्वीप का सबसे जटिल द्विपक्षीय रिश्ता

साल 1971 में बांग्लादेश को आज़ादी मिली थी. इसमें भारतीय सेना की अहम भूमिका थी. उस समय बांग्लादेश में पाकिस्तान की सेना ने भारतीय सेना के जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण किया था और उसके बाद ही आज़ाद बांग्लादेश अस्तित्व में आया था. भारत और बांग्लादेश का संबंध संभवतः इस महाद्वीप का सबसे जटिल द्विपक्षीय रिश्ता है। 1971 में बांग्लादेश की आजादी में भूमिका निभाने के बावजूद वहां यह माना जाता है कि भारत पाकिस्तान के खिलाफ अपना हित साध रहा है। 1972 में शांति एवं दोस्ती की संधि पर हस्ताक्षर करने के बावजूद दोनों देशों ने अपने संबंधों को बेहतर बनाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। नतीजतन दशकों पुराने भूमि, जल, अवैध प्रवास और सीमा सुरक्षा से संबंधित मुद्दे अब भी लटके पड़े हैं।

भारत श्रीलंका

आज का हमारा पड़ोसी देश श्रीलंका अतीत काल से कभी विशाल भारत का ही एक भाग हुआ करता था।आज अतीत के उन भूले-बिसरे खंडों में झांकने की आवश्यकता नहीं। आज श्रीलंका भी भारत के समान ही एक प्रभुसत्ता संपन्न स्वतंत्र देश है। उसका अपना स्वतंत्र संविधान और अपनी ही स्वतंत्र शासन व्यवस्था है। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अतीत काल से ही श्रीलंका और भारत निकट संबंधी रहे हैं।आज के सन्दर्भ में जब से श्रीलंका की बागडोर नए शासकों के हाथ में आई है तब से भारत-श्रीलंका के सम्बन्धों को मात्र औपचारिक कह कर सामान्य स्तर पर सामान्य ही कह सकते हैं। दोनों में किसी प्रकार का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विवाद भी नहीं है। सामान्यतया दोनों राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे का विरोध भी नहीं करते। पहले की तरह पाकिस्तान या चीन के दबाव में आकर आज का श्रीलंका भारत का नाहक विरोधक या बदनाम करने वाली बातें भी नहीं उछालता रहता। भारत भी कई प्रकार से आर्थिक एवं योजनाएं पूर्ण करने में उसकी यथासाध्य सहायता भी करता रहता है। ऐसी दशा में सम्बन्धों में प्रगाढ़ता तो नहीं कही जा सकती, हां , सामान्यतः मानवीय दृष्टि रखने की बात अवश्य मानी जा सकती है।

यह भी पढ़ें : US Survey in ‘Dawn’: 43% हिन्दू मानते हैं 1947 का बंटवारा हिन्दुओं-मुसलमानों के लिए सही

 

 

 

 

 

 

 

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